पपीता
हरे और पीले रंग के पपीते मादा पौधे पर लगते हैं और नर पौधे पर महज फूल आते हैं। इसे कारिका पपाया नाम से जाना जाता है। एक खेत में जहां सैकड़ों मादा पपीते लगे हो वहां अधिकतम तीन किमी दायरे में एक नर पौधे का होना जरूरी है। इसमें फाइबर, विटामिन एवं एंटी आक्सीडेंट पाए जाते हैं कोलस्ट्रोल को कम करते हैं,हृदयघात से बचाते हैं। शरीर की इम्यून क्षमता बढ़ाना, भार कम करने में लाभकारी है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है तथा पेट रोगों के लिए लाभकारी है। महिलाओं में माहवारी में लाभप्रद होता है। शूगर की बीमारी में भी लाभकारी माना जाता है। फल एवं पत्तों से निकलने वाला दूध दवाएं बनाने के काम आता है।
हरे और पीले रंग के पपीते मादा पौधे पर लगते हैं और नर पौधे पर महज फूल आते हैं। इसे कारिका पपाया नाम से जाना जाता है। एक खेत में जहां सैकड़ों मादा पपीते लगे हो वहां अधिकतम तीन किमी दायरे में एक नर पौधे का होना जरूरी है। इसमें फाइबर, विटामिन एवं एंटी आक्सीडेंट पाए जाते हैं कोलस्ट्रोल को कम करते हैं,हृदयघात से बचाते हैं। शरीर की इम्यून क्षमता बढ़ाना, भार कम करने में लाभकारी है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है तथा पेट रोगों के लिए लाभकारी है। महिलाओं में माहवारी में लाभप्रद होता है। शूगर की बीमारी में भी लाभकारी माना जाता है। फल एवं पत्तों से निकलने वाला दूध दवाएं बनाने के काम आता है।
बाजरा
इसे पर्ल मिलेट भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम पेनिसेटम ग्लूकम है। इसमें लोहा, प्रोटीन, फाइबर एवं फोलिक अमल आदि मिलते हैं जो मैग्नेशियम की अधिकता के चलते शूगर रोग में कारगर है, रक्त अल्पता को दूर करता है, कोलस्ट्रोल घटाता है ऐसे में हृदय रोग में लाभकारी है। यह आंखों, हड्डियों एवं त्वचा के लिए लाभकारी है वहीं बदहजमी को रोकता है। अभी बाजरा पकने के कगार पर पहुंच गया है। जल्द ही पककर तैयार हो जाएगा। भोजन को अदल खाना चाहिए।
इसे पर्ल मिलेट भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम पेनिसेटम ग्लूकम है। इसमें लोहा, प्रोटीन, फाइबर एवं फोलिक अमल आदि मिलते हैं जो मैग्नेशियम की अधिकता के चलते शूगर रोग में कारगर है, रक्त अल्पता को दूर करता है, कोलस्ट्रोल घटाता है ऐसे में हृदय रोग में लाभकारी है। यह आंखों, हड्डियों एवं त्वचा के लिए लाभकारी है वहीं बदहजमी को रोकता है। अभी बाजरा पकने के कगार पर पहुंच गया है। जल्द ही पककर तैयार हो जाएगा। भोजन को अदल खाना चाहिए।
झोझरु
ग्रामीण क्षेत्र में कभी झोझरु पौधा पर्याप्त मात्रा में मिलता था जिसका वैज्ञानिक नाम टेफरोसिया परपुरिया है। ऊंट इसे चाव से खाता है वहीं इसकी जड़ दांतों की दर्द में काम आती है। ऐसे में बुजुर्ग इसकी जड़ की दांतुन करते थे। मछली मारने का जहर इसी से बनता था। मटर कुल के इस पौधे से अनेकों दवाइयां बनती है जिनमें त्वचा रोग, कोड़, लिवर, हदयघात, गनोरिया, दमा, मूत्र रोगों में काम आता है। इसका अस्तित्व ही खतरे में है। यह बंजर एवं कठोर भूमि पर खड़ा देखा जा सकता है।
ग्रामीण क्षेत्र में कभी झोझरु पौधा पर्याप्त मात्रा में मिलता था जिसका वैज्ञानिक नाम टेफरोसिया परपुरिया है। ऊंट इसे चाव से खाता है वहीं इसकी जड़ दांतों की दर्द में काम आती है। ऐसे में बुजुर्ग इसकी जड़ की दांतुन करते थे। मछली मारने का जहर इसी से बनता था। मटर कुल के इस पौधे से अनेकों दवाइयां बनती है जिनमें त्वचा रोग, कोड़, लिवर, हदयघात, गनोरिया, दमा, मूत्र रोगों में काम आता है। इसका अस्तित्व ही खतरे में है। यह बंजर एवं कठोर भूमि पर खड़ा देखा जा सकता है।


























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