Tuesday, May 31, 2022

                       वट सवित्री 

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विधा-कविता   
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सोमवती अमावस्या आई, लेकर एक पहचान,
शनिदेव जयंती उस पर, कहलाती बड़ी महान।
वट सवित्री व्रत लेकर, सोच रहा सारा जहान,
सदियों तक याद रहेगा, गाये सवित्री यशगान।।

सौभाग्यवती औरत करती, इस दिन व्रत तप,
वटवृक्ष की पूजा करती,दिनभर शिव का जप।
पार्वती और वट की पूजा,मन को देती है चैन,
मन को चैन मिले सुनकर, कतई नहीं है गप।।

अल्पायु में विवाह हुआ, सवित्री लगती थी खुश,
नारद ने कथा सुनाई तो,मन को हुआ था दुख।
निश्चय कर लिया पार्वती,बचाऊं पति की जान,
बेशक जान जाये मेरी तो,जमाना हो जा विमुख।

वटवृक्ष की छांव में, सत्यवान सिर पैरों पे रख,
गहरी नींद में सोया था,जैसे विष लिया है चख।
यमराज फिर चलकर आया, लेकर चला प्राण,
सवित्री ने पीछा किया, हृदय करता धक धक।।

दक्षिणी दिशा में चलता गया,पीछा किया नारी,
पतिव्रता सवित्री को देख,यमराज मंशा भी हारी।
कितने प्रयास किये यमराज, पर सवित्री अडिग,
यमराज घबरा गये, सवित्री की छवि लगे प्यारी।

पूछा इरादा यमराज ने, सवित्री को क्या चाहिये,
सत्यवान की जान गई है, अब घर चले जाइये।
हँसी सवित्री खिलखिला, चाहिए मुझको 3 वर,
फिर तो मैं चली जाऊंगी, सीधी अपने ही घर।।

मांगा पहला वर ,सौ पुत्रों की मां बन जाऊंगी,
दूजे वर में मैं अपने, सास-ससुर नेत्र पाऊंगी।
खोया हुआ है राजपाट, तीसरे वर  में दे देना,
देखना फिर मैं तो तुम्हारा पीछा छोड़ जाऊंगी।।

थका हारा सा यमराज, आज हार गया नारी से,
छोड़ी आत्मा सत्यवान की,जैसे मिली उधारी में।
पहुंची सवित्री वटवृक्ष संग,जी उठे थे सत्यवान,
तब से वटवृक्ष और सवित्री कहलाते बड़े महान।

उस दिन से हर नारी, वटवृक्ष पूजा करती आई,
अमावस्या और पूर्णिमा को, पूजा चलती आई।
सवित्री को नमन करते हैं, जग की सारी नारी,
पतिव्रत वो कहलाती रहेगी,सारे जग की प्यारी।।

वटवृक्ष और सवित्री का, नाम रहेगा इस संसार,
सवित्री नाम पर पूजा होगी, मिलता रहेगा प्यार।
सदियों से चली आ रही, सदियों तक रहे जारी,
सवित्री जहां में नाम रहेगा,कहते हैं देवी हमारी।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह

























यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

Sunday, May 29, 2022

  नमक जैसे हो
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विधा-कविता   
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बातों में दम नहीं, करते व्यर्थ की बात,
नशा चढ़ा मिलता, बताते दिन की रात।
नमक जैसे लगते हो, मिठास अति दूर,
ठन ठन गोपाल हो, अच्छे नहीं हालात।।

मौन रहते हो सदा,खोलते नहीं हो राज,
सलीखा काम का नहीं,बिगड़ते हैं काज।
नमक सी बातें करते, नहीं कोई है ज्ञान,
मिलते जुलते हो नहीं, तबियत नौसाज।।

व्यवहार अच्छा नहीं, लौटाते नहीं उधार,
दूर दूर रहते तुमसे ही,कोई करे ना प्यार।
नमकीन चेहरा लगता,जैसे समुद्र कोरल,
पागलपन जिंदगी है, लगे जीना है बेकार।।

किस्मत से खोटे लगते, रखते हाथ पे हाथ,
छोड़ देते सभी तुम्हें, देते नहीं तुम्हारा साथ।
नमक जैसे लगते हो, आता नहीं जन स्वाद,
मात पिता रहित हो, लगते हो ज्यों अनाथ।।

नमक से लगते हो, मधुर स्वर में गाता चल,
समस्याएं आती जरूर, निकलेगा जरूर हल।
हर इंसान से रख दोस्ती,तब बन जाये बात,
यूं ही अगर रहा तो, जिंदगी मिलेगी विफल।।

नमक जैसे लगते हो, शक्कर सा बन जाइये,
गुड़ को खाते अति कम,पेड़ा ही बन जाइये।
जैसे नमक पर मीठा पसंद आता है जन को,
कभी स्वयं हँसना सीखों, औरों को हँसाइये।।

नमक जैसे कभी न बन, मीठा चाहते लोग,
नमक जैसे खाकर, लग जाता है एक रोग।
मीठा भी नमकीन बराबर,दे मन को खुशी,
बराबर सुख दुख में रहो,रहना अगर निरोग।।

नमकीन सी बातें हो, फिर हो मीठा स्वाद,
कड़वी सच नहीं लगती, नहीं रहेगी याद।
हर सुख दुख में रहना,हरदम जन को सम,
जिंदगी हँसकर जी ले, करना नहीं फरियाद।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01








कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400


Friday, May 27, 2022

                    मैं हर सुबह
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विधा-कविता   
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मैं हर सुबह,  शिव के मंदिर जाता हूं,
दो घड़ी बैठ, शिव से दिल लगाता हूं।
मैं निज जीवन को पापों से बचाता हूं
प्रभु भक्ति में लीन,औरों को जगाता हूं।।

मैं हर सुबह, प्रभु से प्रीत लगाता हूं,
सुंदर छवि को, दिल में यूं बसाता हैं।
प्रभु के नाम सेे,आत्मा को जगाता हूं,
इसलिये जग में, ईश्वरभक्त कहाता हूं।।

मैं हर सुबह, गुरुवर को पास पाता हूं,
उस देव को अपने मंदिर में बसाता हूं।
हर कठिन मोड़ पर,गुुरुओं को पाता हूं,
गुुरुजनों के उपकार को, गुनगुनाता हूं।।

हर सुबह, सरस्वती मां गीत गाता हूं,
काव्य रूप लिखूं, पास उन्हें पाता हूं।
कल्पना शक्ति बढ़ जाती,मन मंदिर में,
ऐसे में महाकाव्य भी लिख जाता हूं।।

मैं तो हर सुबह, बाग सैर पर जाता हूं,
शुद्ध हवा को अपने उर में बसाता हूं।
तितली,भंवरे को ,फूलों पर ही पाता हूं,
ऐसे में बागों से मैं,निज दिल लगाता हूंं।।

मैं हर सुबह, दोस्तों से मिल आता हूं,
अपनी पुरानी यादें ताजा कर आता हूं।
सुख दुख की बातों में,ध्यान बंटाता हूं,
दोस्ती में निज ध्यान जमके लगाता हूं।।

मैं हर सुबह, घर में समय बीताता हूं,
पूजा ध्यान में मन को,खूब लगाता हूं।
खुशियां घर की बढ़ जाती जब कभी,
मैं खूब खिल खिलकर ही हँसाता हूं।।

मैं तो हर सुबह, ताजा पानी पीता हूं,
बुरे विचार बोलने से,मुंह सी जाता हूं।
अपने सारे काम निवृत्त,निद्रा आती है,
पूरी रात आराम से निद्रा में सो जाता हूं।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव











मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

Thursday, May 26, 2022

 किनारा नहीं मिलता

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विधा-कविता   
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डूबते जन को कभी,किनारा नहीं मिलता,
रात के अंधेरा में कभी,सूरज नहीं खिलता।
वक्त से डरकर रहना सीख लो ऐ मानव,
ठोकर मारने से कभी, पर्वत नहीं हिलता।।

डूबती सांसों को, कभी सहारा न मिलता,
युद्ध मैदान में तो,कोई प्यारा नहीं मिलता।
पर हिम्मत नहीं हारना अभी से सीख लो,
कांटों के दर्द पर, इक सुंदर फूल खिलता।।

बेरहम दुनिया कहलाती है, नजर दौड़ाना,
कभी परायों के बीच,बेगाना नहीं मिलता।
तोड़ देती है एक झटके के साथ दिल को,
कभी पवन के झोकों से,पत्ता नहीं हिलता।।

बहुत बेदर्द जमाना है, फिर नहीं आना है,
कुछ करना हो कर लो,जग से ही जाना है।
बुरे को अच्छा बताती है यह सारी दुनिया,
बेरुखी को तो हर जन के पास पैमाना है।।

साथ देता है जमाना, जब भाग्य चढ़ता है,
ढूंढे भी नहीं मिलता,जब भाग्य गिरता है।
स्वार्थ से भरी मिलती है यह सारी दुनिया,
बस धन का मारा मारा इंसान यूं फिरता है।।

पाप अहित की सोच रखते हैं लाखो लोग,
बुराई दर्द देना इंसान का बन चुका है रोग।
किसी से प्रीत रखना गुनाह माना जाता है,
चुगली चोरी अहित का खोल बैठे उद्योग।।

स्वर्ग का इस जग में, किनारा नहीं मिलता,
खुशियों से भरा वृक्षों पर फल नहीं लगता।
धर्मनिष्ठ बातों को मानते हैं बहुत कम लोग,
निज पाप कर्मों का कोई हिसाब नहीं रखता।।

डूबते भाग्य का कभी, किनारा नहीं मिलता,
अच्छे किये कर्मों का सदा फल नहीं मिलता।
ठोकर मारकर चलने की आदत बदल डालो,
गिर जाते इंसानियत से तो,सहारा नहीं मिलता।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400