Saturday, January 30, 2021

 

गरीब ढोये जिंदगी का बोझ
कविता
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गरीब ढोये जिंदगी का बोझ,
एक दिन नहीं, वो रोज रोज,
रोटी की करता नित तलाश,
रोटी बने बस उसकी खोज।

सुबह उठता दर्द का सांया,
शाम ढले वो घर पर आया,
बच्चे उसके हैं आश लगाये,
कहते वो पापा रोटी लाया।

फैक्ट्री, उद्योग हो कारखाना,
ईंट भट्ठा हो, या मयखाना,
रोटी खातिर सेवा  करते वो,
लगता चेहरा जाना पहचाना।

गर्मी सर्दी हो या बसंत कहार,
मजदूर मिलते हैं घर से बाहर,
खूब कमाते मिलते हैं दिनभर,
मिलती फिर भी उनको हार।

फटे पुराने वस्त्र मिले तन पर,
खाने को नहीं मिलती है रोटी,
पढ़ाई लिखाई कैसे वो करते,
उनकी है बस किस्मत खोटी।।



जयगान
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जिनका जयगान गूंजता था,
       प्रतिद्वंद्वी कैसे आज हुये।
जिनका नाम दिलों में था,
    वो कैसे आज बेताज हुये।।
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अमीर
विधा-सायली छंद
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अमीर
देते रहते
गरीब को पीर
चलाते हैं
तीर

गरीब
दुखी आज
अमीरों का राज
कैसे करे
नाज

दर्द
जहां में
देते हैं अमीर
बढ़ाते वो
पीर




शहीद
विधा- मुक्तक
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गोली खाते वीर जब, होता जग में नाम।
मातृभूमि को सींचते , देते हैं पैगाम।।
सदा रहेंगे याद वो, अपने देश शहीद,
वीर शहादत से बना, सुंदर भारत धाम।।  
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 मुक्तक
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वीर धीर बलबीर हैं, हनुमत उनका नाम।
भक्तजनों के कष्ट में, मिले सुबह हर शाम।।
सुख दुख तो इंसान में, जीवन के हैं रूप,
करते विपत्ति दूर प्रभु, जन हर्षाना काम।।  
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 दोहा
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शिक्षा देनी चाहिये, शिक्षा जग की शान।
शिक्षा पाकर देश भी, बनता खूब महान।।

शिक्षा भर दे ज्ञान मन, आती जमकर काम।
शिक्षा से विद्वान जन, जग में पाता नाम।।

बासी भोजन भोग से, सेहत को नुकसान।
सादा खाना खाइये, कहता सकल जहान।।
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शिक्षा
दोहा
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शिक्षा देनी चाहिये, शिक्षा जग की शान।
शिक्षा पाकर देश भी, बनता खूब महान।।

शिक्षा भर दे ज्ञान मन, आती जमकर काम।
शिक्षा से विद्वान जन, जग में पाता नाम।।

Friday, January 29, 2021


कविता
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खत्म करो दिन रात तो,
नहीं मिलेगा कोई हल,
शुद्ध पेयजल  कह रहे,
नहीं मिलेगा फिर कल।

जीवन देने वाला अमृत,
कहलाए जीवन का हल,
रोक लो  बहते जल को,
मत बहाओ खुलके नल।

जल बिना तड़प कर मरे,
धरती का हर जीवधारी,
जल से बढ़कर कुछ नहीं,
पुकार कर कहे धरा सारी।

पक्षी भी अब  तड़प रहे,
अब पानी कहां से आए,
जल बिना जीना कठिन,
जीवन कौन अब बचाये।








कलम
विधा- दोहा
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करो कलम सिर दुष्ट का, बोलो जय जय राम।
परहित में जीवन लगा, होगा जग में काम।।

नहीं कलम को तोडऩा, आती लेखन काम।
सुंदर दोहे तुम लिखो, होगा लेखक नाम।।

देख कलम की मार को, दुश्मन रोते आज।
अच्छा लेखन जो करे, कभी नहीं हो हार।।

सदा कलम जन पास हो, लेखन सदा विचार।
देश प्रेम के लेख से, उपजे जन मन प्यार।।

Wednesday, January 27, 2021


 अतीत यादें, सपने
विधा-कविता
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अतीत की यादें बहुत सताती,
कभी आती हैं कभी वो जाती,
सपने कभी-कभी ये दिखाकर,
अपनी सारी बातें हमें बताती।

अतीत की यादें कभी कभी तो,
बहुत दुख दर्द जन को दे जाती,
यादों और सपनों को दूर रखना,
दिल को अति सताती तड़पाती।

यादें कभी कभी तो इंसान का,
मन बहुत प्रसन्न कर जाती हैं,
इसलिये यादें दिल में संजोना,
बुरे वक्त पड़े बहुत काम आती।।
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सजना/सजनी
विधा-कहमुकरी
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रजनी बोली सुन कमली,
साजन मेरा बहुत खराब,
खाता पीता कुछ भी नहीं,
बस पीता जमकर शराब।

बर्तन भांडे सब बेच दिये,
खाने को नहीं मिले रोटी,
बहुत बुरे घर दिन आये,
किस्मत मेरी होती खोटी।

कमली बोली, सुन रजनी,
मेरे साजन बहुत ईमानदार,
अपने पैसे दिन कमाये है,
फिर ले आया है वो कार।

जीवन मेरा बहुत सुखी है,
घर में सब हैं मोटर कार,
हाथ में  सोने की घड़ी है,
गले पड़ा सोने का हार है।

ओस










विधा-मुक्तक  दोहा मुक्तक मात्राएं 13,11
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ओस पड़ी जब घास पर, चमके मोती रूप।
चांदी जैसी चमकती , हो आकर्षित भूप।।
सर्दी का जब माह हो, धुंध बहुत है आम,
सूरज किरणों से सजे, ओस सुंदर अनूप।।

फसल खड़ी हो जब बड़ी, पड़े ओस तब आम।
धुंध देखने को मिले, सुबह दोपहर शाम।।
अपनी फसलें देखकर, प्रसन्न मिले किसान,
अच्छी पैदावार से, बनते बिगड़े काम।।
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जरा सुनो
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आज का विषय-
गणतंत्र की गरिमा पर प्रहार, किसानों की यही हार।
अन्नदाता जो लड़ रहे, खोता जाये उनका आधार।।

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-
दोहा

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सोच सोच खुश हो रहे, मेहनत होता नाम।
जितना गुड़ डालो कभी, उतना मीठा काम।।
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-
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सोच सोच खुश हो रहे, मेहनत होता नाम।
जितना गुड़ डालो कभी, मीठा मिलता काम।।
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धीरज
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धीरज धारण कीजिये, बिगड़ रहे हो काम।
सहज पके मीठा बने, जग में होगा नाम।।
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कटी फटी पोशाक से, दुखिया सम हालात।
फैशन के इस दौर में, मिली यही सौगात।।

देखा दर्द गरीब का, आया दाता याद।
खाने को वो तरसते, कौन सुने फरियाद।।

आज गणतंत्र कह रहा, शुरू हुआ संविधान।
देशभक्तों की भूमि यह, भारत देश महान।।
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Monday, January 25, 2021

 राष्ट्रभक्ति











 
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राष्ट्रभक्ति जन जन भरी हो,
वो भारत हमारा प्यारा है,
माटी इसकी चंदन सम है,
जन जन का राजदुलारा है।

जहां पूजा होती वीरों की,
मेरा देश मेरा जवानों का,
दुश्मन भी थर थर कांपते,
यह देश बड़ा विद्वानों का।

फांसी खाते देर नहीं की,
सरदार भगत सिंह प्यारा,
राजगुरू और सुखदेव का,
जोश और जनून था न्यारा।

आजाद थे वो आजाद रहे,
आजादी के लिए कष्ट सहे,
बापू व बोस जान से प्यारे,
कुर्बानी याद कर आंसू बहे।

एक से बढ़कर एक वीर है,
किस किस का बखान करूं,
वीरों का नाम ना छूट जाए,
सोच सोच यह बात मैं डरूं।




भारत भूमि
विधा-कविता
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सबसे न्यारी, सबसे प्यारी,
वीरों की भारत भूमि न्यारी,
चले गये भारत छोड़कर वो,
कहलाते थे जग अत्याचारी।

सुभाष,भगत सिंह की भूमि,
सींचा है अपने ही  खून से,
फांसी खाई कुर्बानी दे डाली,
बचाया इसको,गैर कानून से।

भारत भूमि पर हल चलाते,
उपजाते हैं अन्न देश किसान,
इसकी महिमा जगत जानता,
सभ्यता संस्कृति है पहचान।

नहीं हुआ है नहीं कोई होगा,
गंगा, यमुना जहां बहती आज,
हरदिल अजीज यहां के नेता,
करते आये हैं दिलों पर राज।
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राष्ट्रभक्ति
विधा-कविता
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भरा हुआ जोश दिलों में,
हमने ये कसम उठानी है,
दुश्मन को पल में मारेंगे,
दिल में बस यह ठानी है।

देशों में बड़ा देश हमारा,
लगता हम को प्यारा है,
शिक्षा दीक्षा में सर्वोपरि,
आंखों का  यह तारा है।

हर क्षेत्र में  नाम कमाते,
किसान कहो या मजदूर,
एक बार जो सामने आये,
पल में कर दे चकनाचूर।

आजाद किया है वीरों ने,
कर लो  नमन आज सारे,
सुभाष, भगत से वीर हुये,
लगते मन को अति प्यारे।

गणतंत्र आज मना रहे है,
संविधान अजब महान है,
ऐसा संविधान दिया भारत,
इसलिये जगत की शान है।




इंद्रधनुष

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कई रंग का पुंज हमारा,
  इंद्रधनुष सम जीवन प्यारा।
जीवन भी रंगीन हमारा,
   पल में हो जाये प्रभु प्यारा।।
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दोहा
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मात पिता खामोश अब, बहु बेटे का राज।
साली साला मौज में, सास ससुर पर नाज।।

अमल नहीं हो घोषणा, नेता पसंद ख्वाब।
लोग दर्द में जी रहे, दोषी कौन जनाब।।

मेहनत को जन भूलकर, किस्मत देते दोष।
नहीं बने जब काम तो,  मन मेें पनपे रोष।।

Sunday, January 24, 2021

 

जरा सुनो
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आज का विषय-
दिल्ली में परेड के लिए ट्रैक्टरों का आना लगातार जारी,
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वाह रे वाह!  सरकार अभी है मौन नहीं अभी हारी।
दिल्ली में परेड के लिए ट्रैक्टरों का आना लगातार जारी।।
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सुभाषचंद्र बोस/पराक्रम दिवस
विधा-दोहे
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नेता चर्चित आज भी, कहते उनको बोस।
आजादी की राह पर, चले गये अफसोस।।

दिवस पराक्रम आज है, बोस रहेंगे याद।
नारा जग में गूंजता, नहीं करें फरियाद।।

देशभक्त होगा नहीं, जग में जैसा बोस।
कहां गये वो छोड़कर, इतना है अफसोस।।



विधा-कविता
बचाओ पेड़/कविता
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भूल गये क्यों, पेड़ ही हो सहारा,
खत्म हुये तो, नहीं मिलेंगे दुबारा,
रोयेगा मानव धरती का जो प्यारा,
फर्ज बनता है बचाओ पेड़ हमारा।

फल,फूल,छाया देते हैं जीवनभर,
इनके साये में होता नहीं लगे डर,
सब्जी,फूल,फल मिलता घर-घर,
खा पीकर मस्त हो बोलो हर हर।

खाद भी देते हैं ये जीवन में सारे,
गर्मी की छाया में बैठे जीव हमारे,
धरती माता कह रही करो शृंगार,
काट नहीं पेड़ को, दो इन्हें प्यार।

चिपको आंदोलन की करो याद,
अमृता ने कभी की नहीं फरियाद,
गौरा देवी ने लगाई प्राण आहुति,
पेड़ों को बचाओ नहीं बन जल्लाद।


आओ एक पेड़ हम भी रोप दें,
रक्षा, पानी, खाद उसको रोज दे,
आए लहलहाता फिर वो सवेरा,
डाल देगा धरा पर स्वर्ग ही डेरा।।
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विषय-जल
विधा -कविता
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खत्म करो दिन रात तो,
नहीं मिलेगा कोई हल,
शुद्ध पेयजल कह रहे,
नहीं मिलेगा फिर कल।

जीवन देने वाला अमृत,
कहलाए जीवन का हल,
रोक लो  बहते जल को,
मत बहाओ खुल ही नल।

जल बिना तड़प कर मरे,
धरती का हर जीवधारी,
जल से बढ़कर कुछ नहीं,
पुकार कर कहे धरा सारी।

Thursday, January 21, 2021

 दर्द
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जीवन में ऐसा मितु बनाओ,
 जिससे उर की सब व्यथा कहो।
साथी का दर्द सारा उठाओ,
  हरदम सबका दुख दर्द सहो।।
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दोहा
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दिल की धड़कन मेें मिले, ईश्वर का ही वास।
प्रेम भक्ति के मार्ग से, रहते मन के पास।।

सुख की छाया पास हो, करते ईश्वर भक्ति।
तोप और बंदूक से, ज्यादा होती शक्ति।।

अगर चाहिए जिंदगी, जीवन का उद्धार।
भक्ति सकल संसार में, भर देती है प्यार।।

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 दोहा
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सुख की छाया पास हो, कर लो ईश्वर भक्ति।
तोप और बंदूक से, ज्यादा मिलती शक्ति।।



श्याम तेरी बंसी
विधा-कविता
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श्याम तेरी बंसी, गाये मिलन गीत,
बंसी की धुन में बढ़े, जग की प्रीत,
जब बाजी बंसी, जग किया उद्धार,
पूरे देश जहांं में, बढ़ जाता है प्यार।

श्याम तेरी बंसी, गाये गीत मलहार,
कभी कुचीपुडी नृत्य में, बढ़ता प्यार,
जब तक बंसी बाजती, धरे कई रूप,
प्रसन्न होते नर नारी,खुश होत है भूप।

श्याम तेरी बंसी, करती है जन पुकार,
प्रेम मिलन गीत में, आ जायेगी बहार,
श्याम तेरी बंसी के, गुण  गाये संसार,
मधुर मिलन के रस में, बढ़ जाये प्यार।।







खता हो गई है
विधा-कविता
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खता हो गई है, चले जा रहे हैं,
ठहरो जरा तो, खुशबू आ रही है। 1।

दर्द में डूबे हुये हैं, लोग जहां वाले,
कोई खुशियों की, दुआ आ रही है। 2।

बैठे थे किनारे, लहरों से बातेें करने,
ठंडी ठंडी हवा, मन को भा रही है। 3।

चले थे सफर को,न मंजिल मिली है,
यादों की राहे तो, मन तड़पा रही हैं। 4।

माना कि मंजिल, एक दिन मिल जाये,
तराने दिलों के, तन मन गुनगुना रही है। 5।

दोस्त मिले थे, जब हम सफर चले थे,
यादों की कश्ती यूं, मन महका रही है। 6।

ये राज जहां के इस, दिल में दफन हैं,
राज की बातें अब, मन तरसा रही हैं। 7।

क्या खता हो गई है, रूठ चले हो तुम,
ये आहें तुमको,अब पास  बुला रही है। 8।

आओ पहलु में तुम, दिल तड़प तुम्हारी,
तड़पन तुम्हारे ही, मधुर गीत गा रही है। 9।

जो भी कहा तुमसे, माफ कर देना अब,
वो रुसवाई दिल पे, बस सहे जा रही है।10।

अकेले चले जा रहे हैं, हर इंसान जाता,
ये राहे बस देेखो, स्वर्ग तक जा रही हैं। 11।

ख्वाबों का सफर, होता जग में निराला,
वो ख्वाबों के दर्श, दिल तड़पा रही हैं। 12।

अब भूल जाओ, अब नहीं हम मिलेंगे,
दूर खड़ी है वो, बस मुझे बुला रही है। 13।

Tuesday, January 19, 2021

दोहा शब्द-सिक्का
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खोटा सिक्का मानते, होता है बेकार।
वक्त पड़े वो काम का, कर लो सोच विचार।।
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सिक्का
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खोटा सिक्का भी कभी, जग के आए काम।
कभी कभी परिवार में, खोटा करता नाम।।

उड़ती पतंग देखकर, दुनिया गाये गीत।
धरती पर गिरता कभी,धट जाती है प्रीत।।

शब्द-सिक्का
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सच्चे से खोटा भला, वक्त पड़े दे काम।
मिले पुराना गुड़ सदा,मिलता महँगे दाम।।

शब्द-सिक्का
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सच्चे से खोटा भला, वक्त पड़े दे काम।
मिले पुराना गुड़ सदा,मिलता महँगे दाम।।
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तस्वीर
विधा-दोहा छंद
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नाम रखा इंसान का, वैसी थी तस्वीर।
चतुराई को देखकर, दूर हुई मन पीर।।

देख रहे तस्वीर को, लगे जान पहचान।
अजब गजब की सोच से,बढ़ी जगत में शान।।

पड़ी मिली तस्वीर तो, वो लगता था भूप।
मेरा बच्चा था वहीं, कहते उसे अनूप ।।

माना इस तस्वीर में, भरे हुये हैं रंग।
देख देख उसको लगे, छेड़े मन की जंग।।
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शादी सालगिरह
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पल पल बीते शुभ घड़ी,
हाथों में खुशी की छड़ी,
आएगी शादी सालगिरह,
सदा हँसो नही हो विरह।
श्रीगणेश बुद्धि बल देगा,
मां सरस्वती ज्ञान भर दे,
शिवभोले मन तप भर दे,
विष्णु देव मंगल कर दे।
सारे जगत में नाम मिले,
मन के सारे फूल खिले,
यौवन की बरसे फुहार,
मिले नहीं जग में हार।
सांझ सवेरे ले प्रभु नाम,
बनते रहेंगे बिगड़े काम,
कभी ना वो आये शाम,
परम पद मिलेगा धाम।
दुष्ट सारे पड़े कमजोर,
मन के हरदम नाचे मोर,
कीर्ति का मचा रहे शोर,
खुशियों की आये भोर।।






शिक्षा
विधा-कविता
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शिक्षा होती संपदा , बढ़ता बांटो ज्ञान।
शिक्षा जग आधार है,क्यों नर है अज्ञान।।
शिक्षा बिन जीवन नरक, शिक्षा हो उपहार,
सोच समझ इंसान तू, शिक्षित बने महान।।

पोथी जमकर कह रही,पढऩा लिखना सीख।
शिक्षा से मुंह मोड़ के , नहीं मिलेगी भीख।।
खूब पढ़े किस काम का, करे नहीं जब दान,
शिक्षा दीक्षा दे सभी, वरना जग में झीख।।

घर घर शिक्षा से बने,  बच्चों की पहचान।
पढ़ लिखकर करते सदा,भारत का सम्मान।।
पढऩा लिखना काम का, सेवा दिल में भाव,
भव सागर से पार हो, मिलता शिक्षा ज्ञान।।

पढऩा लिखना काम का, सेवा दिल में भाव।
पूरे जग में नाम हो,     शिक्षा है वह नाव।।
जग का साथी मानते,  शिक्षा जगत स्वरूप,
अनपढ़ रहते लोक में, भूल गया जन दाव।।

शिक्षा रूपी नाव में,   जो होता है सवार।
जीवन नैया पार हो, जग का मिलता प्यार।।
ज्ञान नाम का दीप है, जगत गुरू का नाम,
शिक्षा दीक्षा दान दे,  होगी कभी न हार।।

खोट शिष्य के जान के, देना उसको ज्ञान।
सही वक्त गुरु जान के, देेता शिक्षा दान।।
शिक्षा से जो जोड़ता, लगता नाता धाम,
हर जन का यह रूप है,मानव बने महान।।

चोरी का डर भूल जा, ले लो शिक्षा ज्ञान।
वक्त पड़े तो काम दे,  मत रहना अज्ञान।।
शिक्षा को धन मान कर,करो सदा अभ्यास,
जितनी शिक्षा पा सको,बढ़ जाता है मान।।

शिक्षा मन का आइना, रखना हरदम ध्यान।
कूड़ा कचरा ढोइये, बिन शिक्षा बिन ज्ञान।।
शिक्षा बिन जीवन नरक, शिक्षा हो उपहार,
सोच समझ इंसान तू, क्यों करता अभिमान।।

छोटे बच्चे गा रहे, मिलजुल कर सब गीत।
शिक्षा दीक्षा खूब लो, तभी करे जग प्रीत।।
नाम कमाओ जगत में, तब हो बेड़ा पार,
शिक्षा दामन थाम ले, यह है मन का मीत।।

Monday, January 18, 2021

 







असली भारत गांव में है
विधा- मुक्तक
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असली भारत गांव में है।
सागर इसके पाँव में है।।
महानता बेहद निराली,
मजा अति कांव कांव में हैं।।


जरा सुनो
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आज का विषय-  व्यक्ति का असली धर्म उसके कर्तव्य हैं
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अधिकार तो कोई भी जमा सकता है किंतु अधिकारों के पीछे व्यक्ति के कत्र्तव्य निहित हैं जिनका पालन असली धर्म है।



जीवन का सार समक्ष मगर,
  हम इसको स्वयं नकार रहे हैं।
बुरी आदतों के बल पर ही,
  अपने जीवन में यूं हार रहे हैं।।

 
 
नमन दोहा **************************** **************

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नाम उन्हीं को चाहिये, करेे नहीं जो काम।
काम काज जो कर रहा, खुद ही होता नाम।।


नई नवेली नार तो, करती खूब विनोद।
सजती रहती प्रेम में, बैठ पिया की गोद।।

मौसम भी दिखला रहा, बहुत सजीला रूप।


छटा धुंध की छा रही, खिलती पल में धूप।।



लाला लाजपतराय
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गरम दल के नेता थे,
कहलाते थे लाजपत,
अग्रवाल परिवार था,
नमन उनको शत शत।

लाल बाल पाल नाम,
प्रसिद्ध हुआ जगत में,
पीएनबी की स्थापना
प्रसिद्ध हुआ भारत में।

हरियाणा में वकील थे,
हिंदी का  चाहा प्रसार,
आर्य समाज के पक्षधर,
पंजाब में  किया प्रचार।

पंजाब केसरी कहलाए,
अकाल में की थी सेवा,
पूरा जग उन्हें याद करे,
वो देश के कहाए देवा।

साइमन कमीशन आया,
जमके किया था विरोध,
पापी डायर कहर बरपा,
कैसा लिया उन्होंने शोध,

एक एक कथन कहा जो,
सिद्ध हुआ कफन कील,
जनरल डायर जाके छुपा,
गोली द्वारा गया वो लील।
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कागज के कोरे पन्ने, चूमती कलम....
विधा-कविता
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दिल में अरमान भरे, लिखूंगा आज,
कितने ख्वाब लिये है, छुपे हुये राज,
पाती अपनी मैं लिखूं, कहता बलम
कागज के कोरे पन्ने, चूमती कलम।

खुशी और गम लिखूं, झेले अति मैने,
कभी क्रोध में आया, अंदाज रहे पैने,
पर मंै वो ही लिखूंगा, पसंद हो सनम,
कागज के कोरे पन्ने, चूमती कलम।

जिंदगी एक बुलबुला,कहते आये संत,
कोई अमर नहीं है, होना सबका अंत,
जीते जी न होने दूंगा, कोई भी जुलम,
कागज  के कोरे  पन्ने, चूमती कलम।

खुशियां जग में मिले, खोज ले आज,
मन को हर्षाती सदा, होती साज बाज,
दुख मन सताते जन के, छोडऩा अलम,
कागज  के कोरे  पन्ने, चूमती कलम।

मन की करेंगे, नही जीवन मिले फेर,
परहित में कमा करे, लगा न पाप ढेर,
नहीं कुछ कर पाये तो लेंगे फिर जनम,
कागज  के कोरे  पन्ने, चूमती कलम।