Saturday, December 21, 2019

                                     गरीबी
शरीर के अति कृश शरीर पर फटे पुराने कपड़े सर्दी में कांपती हुई बालिका ने बर्तन साफ करते हुए अपनी मां से कहा-मो, मैं भूखी हूं। दो दिनों से मैंने कुछ नहीं खाया है। कुछ खाने का प्रबंध हो सके तो कर दो। अश्रुपूरित नेत्रों से मां ने अपनी बच्ची की ओर देखा और कहा-बेटी, यह हमारी बदकिस्मत है। जिस मालिक के घर नौकरी कर रहे हैं वो क्रूर है और हमें दिनभर काम पर लगाए रखता है और सर्दी में एक कप चाय तक नहीं देता। जब से तुम्हारे पिता का देहांत हुआ है तब से बुरे दिन चल रहे हैं। अगर किसी के आगे हाथ फैलाते हैं तो वो हमारे जोबन पर अधिक नजर रखता है और तरस नहीं खाता। इस भेडिय़ों के राज में मेमना कब तक जान बचा सकता है। जी चाहत है मैं जान दे दूं।
...नहीं मां, नहीं। मुझे कोई भूख प्यास नहीं है परंतु ऐसे शब्द तो कम से कम मत बोला। इतना कहकर बच्ची ने अपनी मां के मुंह पर हाथ रख दिया और मां बेटी सुबक सुबक रो रही थी।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**

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