विषय-पर्दा विधा-कविता
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पुराने समय से चली आई,
महिलाएं करती आई पर्दा,
लाभ के साथ हानि होती,
पर्दे की होती आई स्पर्धा।
समय बीता फिर आया है,
पर्दा हटता गया चेहरे का,
दूर से पता लग जाता अब,
स्त्री का कौन परिवार डेरा।
पर्दा प्रथा बहुत बुरी रही है,
कितनी महिलाएं चढ़ी भेंट,
पर्दा करके पहचान न होती,
जब तक घर में घुसे न ठेठ।
पर्दा कभी अच्छा भी होता,
लोकलाज की हो पहचान,
हर घर में नारी की कद्र हो,
पर्दा बड़ों से रखता है राज।
********************
दोहा
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लोग आस्तीन सांप बन, करते पहले प्यार।
देखा मौका डस लिया , अजब गजब संसार।।
ख्याल करे वो रात दिन, खुल जाती है पोल।
जन की कीमत जान लेे, जीवन है अनमोल।।
प्यास धरा की जब मिटे, होती बारिश खूब।
दादुर गाये गीत तो , हरी भरी हो दूब।।
सोच बुरी मत लाइये, होता है बदहाल।
खान पान अब हो गया, मानव का ही काल।
आस्तीन के सांप तो, घूमे फिरे हजार।
नजर उठा कर देख लो, धोखा है संसार।।
विषय-बचपन की यादें
विधा-कविता
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तितली से उड़े,जोश उर में भरे, नहीं फरियादें,
खिलौने हाथी, मन को सताती,बचपन की यादें।
*
नाव का खेल,डंडे से मेल,कंची खेले शहजादे,
पतंग उड़ाना,पेच लड़ाना, वो बचपन की यादें।
**
झिरनी खेल,मां की गोद,बापू प्यार,शोर मचादे,
बच्चों संग खेल,दंगा फसाद,वो बचपन की यादें।
***
तख्ती लेखन,बारहखड़ी रटना,पेट कभी फूलाते,
शिक्षक मार,खेल में हार,दोस्त बेकार हैं वो यादें।
****
बनके मोर, करते शोर, शरारत कर नाम लगादे,
कभी सिपाही कभी चोर,देखते मोर,बाकी यादें।
*****
लुक्का छिपी,चांदनी खेल,बच्चों से मेल,मार भगादे,
हंसना रोना,वो बिछौना, बाकी हैं जहन में यादें।
****
यादें वो बचपन,उम्र हैं पचपन,अब तो बस भुला दे,
रोते हैं अब,यादों में अब,मरते दम तक बाकी यादें।।
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विषय-शरारत
विधा-कविता
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शरारत होती है बुरी,
कभी नहीं करना है,
शरारत करने से सदा,
जन को ही डरना है।
शरारत बने मजाक तो,
इंसान की होती है हार,
शरारत करने पर शिष्य
पाता है शिक्षक की मार।
शरारती बच्चा भी जग,
खा जाता है कभी मार,
शरारत जान पर बनती,
जीवन बन जाए बेकार।
शरारत से तोबा कर लो,
शरारत से न चले काम,
शरारत बुरी बताई जगत,
शरारत से नाम बदनाम।



दोहा शब्द-चिंतक
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शुभ चिंतक माँ बाप के, नाम था श्रवण कुमार।
मात पिता ले पालकी, दिखलाया संसार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़,हरियाणा
नमन दोहा शब्द-चिंतक
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चिंतक चिंतन कर रहे, दर्द भरा संसार।
बेटा बेटी घट गया, मात पिता से प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़,हरियाणा
नमन दोहा शब्द-चिंतक
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शुभ चिंतक माँ बाप के, नाम था श्रवण कुमार।
मात पिता ले पालकी, दिखलाया संसार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़,हरियाणा
विषय-नारी/स्त्री/अबला/अंगना/वामा
विधा-कविता
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भूल रहे हैं पुण्य को , पाप सजे दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ढोंगी खड़े कतार।।
हँसकर हरते चीर अब, सजे रोज दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ईश्वर लो अवतार।।
चंचल नारी चॉँद सी, करती रहे विभोर।
पिया मिलन की आश में, पायल करती शोर।।
जो नारी पति की सुने, होते हैं शुभ काम।
जिस घर महिला की चले, वो घर हो बदनाम।।
दर्द लिये संसार का, होठों पर मुस्कान।
ऑँँखों में आंसू भरे, नारी की पहचान।।
लघुकथा आधारित सृजन
विषय -पर्व
विद्या -कविता
पर्व
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मना रहे पर्व निराला,
मिलकर लगते एक हैं,
पर भाषा,बोली से लगे,
धर्म व जाति अनेक हैं।
शिवालय में भीड़ लगी,
कर रहे जल अर्पित वे,
कतारबद्ध वो खड़े हुये,
सुंदर सजीला है संजोग।
होली के पर्व पर देखा,
रंग लगा रहे मिलकर,
अलग -अलग धर्म है,
हंस रहे खिल खिलर।
दीपावली का पर्व आये,
सारे ही दीप जलाते हैं,
अलग जाति धर्म बेशक,
आपस में गले लगाते हैं।
कितने आते पर्व देश के,
सब मिलके हो जाते एक,
भारत देश एकता भरी है,
बेशक धर्म,जाति अनेक।।
नितांत मौलिक/स्वरचित
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चित्र पर आधारित आयोजन
30 अगस्त 2020
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हम एक थे हम एक थे,
हम एक हैं, हम एक थे।
हम जीत गये, जीत गये,
हम जीत गये, हम एक हैं।
मंजिल मिली, पहुंचे वहां,
गायेंगे हम, जीत जाएंगे हम,
हम एक थे, हम एक हैं,
जीत गये हम, जीत गये हम।
हम खुश थे, हम खुश है,
अपने ही जहां, हम खुश थे।
कोई गिला नहीं, कोई डर नहीं,
हम जाएं जहां, हम एक थे.....
जाति अलग, भाषा अलग ,
वेष अलग, फिर एक तराना,
देख रहा हमको यहां यूं ही,
देश मेरा है, भारत ठिकाना।
हम एक हैं....................।
हम एक थे हम एक थे,
हम एक हैं, हम एक थे।
हम जीत गये, जीत गये,
हम जीत गये, हम एक हैं।
दोहा
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1. शब्द-प्रस्तावना
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जब देखी प्रस्तावना, पुस्तक किया विभोर।
शब्दों की माला सुनी, मन का नाचे मोर।।
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2. शब्द-उपयोगिता
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सीखो धन उपयोगिता, मत करना बर्बाद।
खाली होती जेब जब, बहुत सताये याद।।
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3. शब्द-सेहतमंद
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जमकर खाओ सेब तुम, होते सेहतमंद।
घटिया भोजन भर रहा,तन मन में ही गंद।।
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4. शब्द-कट्टरता
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कट्टरता मन की बुरी, कहते सारे संत।
नहीं छोड़ता जब कभी, जन का होगा अंत।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विषय-बरसात/वर्षा
विधा-दोहे
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होती जब बरसात है, भॅँवरे गाते गीत।
बादल नभ पर देख कर, मन में जागे प्रीत।।
बारिश जब होती कभी, टिड्डे करते शोर।
नभ के बादल देखकर, नाचे वन में मोर।।
समाचार आया अभी, बारिश होगी आज।
प्रगति देश की हो रही,मोदी का है राज।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विधा-दोहा
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देश बुलंदी छू चुका, हाकी खेल जहान।
ध्यानचंद के नाम पर, भारत की पहचान।।
फांसी पर चढ़ वीर ने, दिया एक पैगाम।
हो शहीद तू देश पर, जग में होगा नाम।।
काम बुलंदी का करे, तब बनती पहचान।
मिसाल इसकी एकता,भारत देश महान।।
धन दौलत किस काम के, आये ना जब काम।
पोट बांधकर देखते, आयेगी फिर शाम।।
पंगु कर दिया फोन ने, लगा रहे जन कान।
ध्यान कहीं हो जब कभी, जा सकती है जान।।
विषय-रोटी की भूख
विधा-कविता
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मन की भूख प्यार है,
रोटी की भूख शरीर,
ना मिले जन अंत हो,
कह गये संत कबीर।
करते रहते दिनभर वो,
तन मन से बहुत काम,
रोटी की चाहत बढती,
होती जब सुबह शाम।
इंसान पहुंचा चांद पर,
जहान का लिये पैगाम,
रोटी, पानी जरूर मिले,
वरना हो आखिरी शाम।
रोटी से ही जग प्यार है,
रोटी कहाए यह संसार,
नहीं मिलेगी रोटी कभी,
लगता बुरा घर परिवार।
रोटी पेट की भूख मान,
रोटी से मानव पहचान,
रोटी पानी जहां मिलता,
वो घर देवालय समान।
रोटी की भूख जन को,
करवाती कठिन काम,
रोटी तन में ऊर्जा भरदे,
रोटी हो प्रभु का धाम।
रोटी की भूख ने जग,
मरवा डाले कई लोग,
रोटी समय पर मिले,
कहलाता वह संजोग।
श्रमिक जाए काम पर,
पत्नी करे घर रखवाली,
करे किसान काम खेत,
पेट ना रहे कभी खाली।
एक भरी सभा में भीड़,
बजा रही जमकर ताली,
रोटी के लिए भाषण दे,
सींचता पौधों को माली।
वैज्ञानिक,डाक्टर सैनिक,
शिक्षक,वकील करे काम,
भूखा नहीं रहे पेट कभी,
रोटी मिले साथ सम्मान।
मजदूर जन सेवा करता,
सोये नहीं दिन और रात,
रोटी की चिंता लगी रहे,
खाली पेट जब अनाथ।
कष्ट सह रही नारी अब,
साधु संत भज रहा रब,
सैनिक युद्ध में जा रहा,
रोटी मिलती उन्हें जब।
चारों ओर हा-हाकार है,
भरा नहीं गरीब का पेट,
दिनभर परिश्रम थक मरे,
धन खा गया मोटा सेठ।
धर्म,कर्म,पाप और पुण्य,
रोटी जन की चलाती है,
रोटी की भूख कसूती हो,
जन को बहुत तड़पाती है।
जगत में सारे रिश्ते नाते,
रोटी के कारण चलते हैं,
रोटी की भूख सता रही,
पेट को खूब वे मलते हैं।
जगत टिका, देखो आज,
रोटी की महिमा है न्यारी,
रोटी की भूख मिट जाए,
घर में पत्नी लगती प्यारी।
रोटी की भूख कह रही,
जगत का आधार रोटी,
गोल गोल,मोटी ,छोटी
मिले ना किस्मत खोटी।
कहा खो गये प्यारे अब,
रोटी की महिमा अपार,
रोटी की भूख लगे सभी,
रोटी है जग का आधार,
रोटी है..................।
जरा सुनो
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वीर पुरुष कभी अपनी बहादुरी की गाथा नहीं गाते अपितु वे करने में अधिक विश्वास रखते हैं। ऐसे में करनी में विश्वास रखो कथनी में नहीं।
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-विधा-दोहा
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रोष अकारण कर करे, युवा आज हताश।
अपने बल बुद्धि का, करते खुद ही नाश।।
बुरा चाहते देश का, वो पापी हैं घोर।
धरती पर वो पाप हैं, नहीं मिलेगा ठोर।।
मरते के मुँह में डले, घी की लंबी धार।
जीते जी को जल नहीं, कोई करे न प्यार।।
उजड़ रही हैं बस्तियां, कोई चले न जोर।
रोग बुरा यह बढ़ रहा, बेशक कर लो शोर।।
सोच अकारण नीच की, कर देते हैं घात।
पवित्र विचार हो कभी, जग बदले हालात।।
विषय-अफसोस
विधा-कविता
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कोई किसी को मारता,
आता तब दिल जोश,
हम भी वहसी बने तो,
होगा बड़ा अफसोस।
कुत्ते खा रहे माल को,
गरीबों में पलता रोष,
कुएं में ही भाग पड़ी,
इसका बड़ा अफसोस।
देश तब कोई लूटता,
जन में पनपे आक्रोश,
खड़े तमाशा देख रहे,
होता बड़ा अफसोस।
अमीर घर को भर रहे,
गरीबी ले जन आगोश,
मुर्ग मसल्लम खा रहे वो,
इस बात का अफसोस।।
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रदीफ-कर
काफिया-आर
2122 2122 2122 212
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दोष देना सीख साथी देख जग बेकार डर।
बोल वाणी खूब कड़वी सोच कर अब प्यार कर।।
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आपने ही सोचना है कौन जन का साथ दे,
साथ में गर दोस्त हो तो खेल कोई वार कर।।
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फूल भी खिलते रहेंगे मौसमी अंगार से,
इस जहाँ में कौन सच्चा आज यह जन कार कर।
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दास बन जा खास देखो कौन किस्मत का धनी,
सोच आगे की सदा, कैसा यहां सुविचार कर।।
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कौन किसको चाहता देखा कभी ये दौर था,
छू बुलंदी नभ कभी ना सोचता बेकार डर।।
दोहा
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पत्रकारिता बन गई, झूठ कपट व्यापार।
देख सचाई रो रही, स्वार्थ भरा संसार।।
बारिश जब होती कभी, टिड्डे करते शोर।
नभ के बादल देखकर, नाचे वन में मोर।।
रणभेरी की तान पर, थिरके पैर जवान।
मारे काटे दुष्ट को, तब होती पहचान।।
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स्वरचित/मौलिक
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दोहा
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पत्रकारिता बन गई, झूठ कपट व्यापार।
देख सचाई रो रही, स्वार्थ भरा संसार।।
बारिश जब होती कभी, टिड्डे करते शोर।
नभ के बादल देखकर, नाचे वन में मोर।।
हो अपनापन प्रीत मेें, बढ़े जगत में प्यार।
जब विज्ञापन दान का, पुण्य कर्म बेकार।।
रणभेरी की तान पर, थिरके पैर जवान।
मारे काटे दुष्ट को, तब होती पहचान।।
पत्रकारिता सो रही, चिरनिद्रा में आज।
झूठ कपट ही कर रहे, सच्चाई पर राज।।
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विषय-मेरा इकलौता इश्क है तू
विधा-कविता
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दिल से लगाया है तुमको,
नहीं बची है कोई आरजू,
मन प्रफुल्लित हो जाता सुन,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
हुस्न कहे निज इश्क से,
सब कुछ अर्पित कर दूं,
सारी तमन्नाएं पूर्ण होती,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
हुस्न के किस्से सुनते खूब,
हुस्न की सदा बचती रूह,
हुस्न जब इश्क से कहता,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
हुस्न इश्क की चर्चा मिले,
कहे बढ़कर आगोश में लू,
मरकर अमर हो जाते जब,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
मिटा नहीं इश्क कभी भी,
कभी आये थे लैला मजनूं,
सदियों तक वो याद रहेंगे,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
है अमर इस जगत अभी,
कितने ही आशिक मजनू,
कहीं शीरी फरियाद कहा,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
सोहनी महिवाल हुये जग,
वो नजारे आँखों में भर लू,
सोहनी फिदा होकर कहे,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
अमरदीप है नाम हुस्न का
इश्क जहां का राज लिखूं,
सदा बसे हुस्न इश्क दिल,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
इश्क कहे खुश होकर अब,
हुस्न की खाली झोली भर दूं,
हुस्न कहती अपने इश्क से,
मेरा इकलौता इश्क है तू।।
,मेरा इकलौता इश्क है तू,
तेरी हर इच्छा पूरी कर दूं,
जग में आनंद ही आनंद हैं,
बस आनंद से झोली भर लूं।।
हुस्न चले कभी अंगड़ाई ले,
देख देख दुनिया जले धूं-धूं,
सबके मन में ख्वाब मिलेगा,
मेरा इकलौता इश्क है तू।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
विषय-परवाना
विधा-क्षणिकाएं
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1.
शमा देख आया परवाना,
इस दुनिया में बुरा जमाना,
कोई हँसता देख रहा है,
हमने तो अब पहचाना।।
2
परवानों की क्या बात करे,
वो आग में जल जाते हैं,
कभी कभी तो वो मरकर,
फिर से अमर हो जाते हैं।
जरा *****************
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जंगल में खड़ी दूब घास भी एक शिक्षा देती है कि तूफान एवं आंधी आए तो लचीला बनकर मुकाबला कर सकते हैं वरना सूखे पेड़ की भांति अंत हो जाएगा।
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---होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़,हरियाणा
दोहा
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पापी ढोंगी बढ़ गये, सजे रोज दरबार।
बड़े बड़े जन पूजते, धरती पर वो भार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़,हरियाणा
हँसकर हरते चीर अब, रोज सजे दरबार।
लोग फूल बरसा रहे, दाता सुनो पुकार।।
भूल रहे हैं पुण्य को , पाप सजे दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ढोंगी खड़े कतार।।
हँसकर हरते चीर अब, सजे रोज दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ईश्वर लो अवतार।।
विधा-दोहा
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हँसकर हरते चीर अब, सजे रोज दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ढोंगी खड़े कतार।।
समझ बूझ जन खो रहे, ओछे करते काम।
ना जाने किस मोड़ पर, हो जाएगी शाम।।
आम दूध में ले मिला, आये दिल में जोश।
सौंफ मिला नीर पी, फिर आयेगा होश।।
पापी ढोंगी बढ़ गये, सजे रोज दरबार।
बड़े बड़े जन पूजते, धरती पर वो भार।।
हँसकर हरते चीर अब, रोज सजे दरबार।
लोग फूल बरसा रहे, दाता सुनो पुकार।।
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया
विधा-कविता
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मन विभोर होता था जब मिलते थे दोनो,
भूल जाते थे तन व मन के दुख दर्द सारे,
बैठे दिल से दिल बातें करते थे हँस हँस,
दिल तोड़ा तुमने अब मन मेरा दुखा दिया,
कितने ही खत लिखते थे हम छुप छुपके,
रखोगी पल पल मुझको दिल से लगा के,
उन सब यादों को तेरी पल में भुला दिया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।
क्या ख्वाब लेकर हम आये थे दुनिया में,
सोचा था कोई होगा, अपना भी जगत में,
नहीं देगा धोखा, नहीं तकेगा कभी मौका,
दामन पकडेंग़े जीवन भर चलेगा वो साथ,
मरमरी हाथों से छूयेंगे कांपेंगे तब वो हाथ,
लिखेंगे खत का जवाब भी एक खत से ही,
तकेंगे उस पथ को तू आएंगी जिस पथ से,
क्या कर डाला तुमने, वो रास्ता भूला दिया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।
याद आता वो पीपल का पेड़ वादे किये थे,
कसमें खाई थी दोनों ने, साथ जीएंगे मरेंगे,
प्यार के सागर डूबे होते हम दोनों के दिल,
कहते थे हम निडर बड़े जग से नहीं डरेंगे,
तूफान बनकर आया दोनों के बीच ये जगत,
देखते ही देखते दोनों की हो गई फिर दुर्गत,
आखिर तुमने यह कैसा, मुझसे वफा किया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।
साँसें नहीं रुकी मेरी फिर तुम क्यों रूठ गई,
मिलती थी जब खुशबू आती तेरे रंगत की,
एक दिन तूफान आया और अंगुली छूट गई,
लाख ढूंढा तुझे पहाड़, बन और गलियों में,
सुबह सवेरे जागे थे चलते रहे यह सांझ भई,
बिछुड़े भी तो ऐसे कि गलियां लगती है नई,
अब सोचो तुमने मुझको क्यों यह दगा दिया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।।
****
अब किसे पुकारूं, हा! किसको कहूं अपना,
वो यादें वो,कसमें वो दिन,बन गये हैं सपना,
आंखें भी पथरा गई, नैन थक गये पुकार कर,
जोर से पुकारता हूं तो लगता है जग का डर,
यह सच है जगत में नहीं कोई रहता है अमर,
एक दिन छोड़ के जाना होगा यह प्रभु का घर,
तेरी प्यारी सारी यादों को दिल से लगा लिया,
हां,तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।
आएंगे एक दिन तुमसे हम मिलने उस जहां में,
कश्ती टूटी,मांझी घायल, लडऩा बस तूफान में,
जिस जालिम ने छीना, तुझे निज जिस हाथ से,
कसम तुम्हारी सोया नहीं कभी भी उस रात से,
वीरान सा हो गया,फिजा ने छीन है मेरा साथी,
राह तक रहे हैं वो, मूक खड़े घोड़े और हाथी,
उनको जीवों को तुमने, यह कैसा सिला दिया,
सच,तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।
रोते रोते सुन ले, यह मेरा आखिरी तुझे पैगाम,
फिर जन्म धरा पर लेकर याद करना मेरा धाम,
याद रखना अपने दिल में होशियार सिंह नाम,
अब बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो गया निष्काम,
कैसी मंजिल मिली, जिस घड़ी छोड़ा है साथ,
मां बाप भी छोड़ गये अब कर गये हैं अनाथ,
अब बेदर्द जमाने को अब दिल से भगा दिया,
हा! तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।।
जरा सुनो
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जीना तो पेड़ पौधों से सीखना चाहिए जो जीवनभर फल, फूल छाया देते हैं और सूखने के बाद भी ईंधन के तथा राख बनने पर भी खाद के काम आता है।
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-होशियार सिंह यादव, लेखक,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
शीर्षक- देश/वतन/राष्ट्र
विधा -कविता
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सब देशों से प्यारा है,
मेरा अपना भारत देश,
अंग्रेज मार मार भगाए,
दुश्मन बचा नहीं शेष।
बापू गांधी ने सींचा है,
सुभाष का अति प्यारा,
इसकी रक्षा मिल करें,
बनता है फर्ज हमारा।
कभी ना झुकने वाला,
वीर शहीदों का वतन,
आओ उनको याद करे,
खिल उठेगा ये चमन।
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स्वरचित/मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
साहित्य संगम संस्थान
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देख लो जागरूकता,बढ़ी देश की शान।
पूरे विश्व में हो गई, भारत की पहचान।।
जागरूकता आ गई, चीन का माल बंद।
बुरा माल वो बेचकर, रखता बात बुलंद।।
जागरूकता जब हुई,नेता हुये बेहाल।
चोर लुटेरे सोचकर, बदली अपनी चाल।।
जागरूकता कम हुई, जमकर खाया माल।
मोटे मोटे सेठ भी, बजा रहे हैं ताल।।
शीर्षक- जिंदगी
विधा -कविता
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समझ नहीं पाया कोई,
जिंदगी है क्या झमेला,
कभी ये मन खुश करे,
कभी लगे एक मेला।
जिंदगी के रस को भी,
कम लोग पी पाते है,
दुखी जगत में आते हैं,
दुखी जगत से जाते हैं।
जिंदगी गम का दरिया,
कह गये कितने ही संत,
ना जाने किस मोड़ पर,
चलते चलते होता अंत।
जिंदगी एक गीत होता,
गाओ जमकर दिन रात,
खूब मजे से जी लेना है,
जब तक देती है साथ।।
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स्वरचित/मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
विषय-कोरोना
विधा-कविता
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गुजर रही थी सही सलामत,
प्रसन्नता भरी सुंदर घडिय़ां,
मन में उमंग, जोश लिये थे,
चल रही थी फूलझडिय़ां।
तभी नागिन से चेहरा लेकर,
आया डसने कोरोना रोग,
हक्का बक्का भुला दिये सभी,
भागदौड़ में फंस गये लोग।
लाखों जन मारे गये जग में,
लाखों बेघर हो गये आज,
कोरोना रोग दवा नहीं मिली,
रहस्य है और बना राज।
हा हाकार मचा है जगत में,
बंद हुये उद्योग और धंधे,
कितने बेघर बाट जोह रहे,
पड़ गये कारोबार ये मंदे।
बच्चे,युवा और बुजुर्ग रो रहे,
अब तो छोड़ दे चीन यम,
कब जग से विपत्ति मिट जाए,
बढ़ता जा रहा दर्द व गम।
कोरोना का भूत सिर चढ़ कहे,
समय है भाग दौड़ ले आज,
एक दिन ऐसा वो समय आएगा,
खुल जाएंगे मेरे सारे ही राज।
जरा ***********
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*************************
चेहरा फूल सा, काम जोश से, हार न मानने वाला जन कभी किसी से पीछे नहीं रह सकता। विपदा भी आकर लौट जाती हैं।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
दोहा
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बेटा चोरी कर रहा, बाप नशा है आज।
भेद खुलेंगे एक दिन, मिलती माटी लाज।।
घर आंगन में शोर था, देखो दुल्हन आज।
सास ससुर जब पीटते, खुले कई तब राज।।
दोहा शब्द-चांदनी
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आई दुल्हन झूमती, दूल्हा गाये गीत।
आंगन नाचे चांदनी, मन में जागे प्रीत।।
*************************
विषय-बारिश की आहट
विधा-कविता
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नभ पर काली घटा छाई,
बादल गरज रहे घनघोर,
देख -देख नभ की घटा,
नृत्य कर रहे वन में मोर।
द्युति से चमक रहा नभ,
टप टप बूंदों का है शोर,
दादुर जल में टेर लगाते,
टिड्डे कर रहे मन विभोर।
कहीं काले, कहीं नीले,
कहीं लोग करे भागदौड़,
कोई हँसता खिलखिला,
भरेंगे अब तड़ाग,जोहड़।
रेगिस्तान में उठी मतंग,
मतंग ऋषि के नाम पर,
बरसेंगी वो रेगिस्तान में,
फिर बारिश हो घर घर।
किसान हुये अब प्रसन्न,
भीगा उनका तन व मन,
खुशगवार होगा मौसम,
सावन गया, है अगहन।
बारिश की अब आहट,
चकौर की बढ़ी चाहत,
सूरज डूबा बादल ओट,
गर्मी हटे मिलेगी राहत।
चकवा चकवी मन हँसे,
सीप के मुंह, बने मोती,
किसानों ने ली है राहत,
अब मिलेगी खूब रोटी।
लहलहाएगी ये फसल,
अनाज कमी मिले हल,
टकटकी लगा देख रहे,
ताक रहे नभ पल पल।
तरुवर पर आयेगी बहार,
चित चोरों की बढ़े प्यास,
होगी जमकर अब बारिश,
मौसम आयेगा फिर रास।
इंद्रदेव लगते अब प्रसन्न,
हर्षित करते बादल मन,
चलेगी ठंडी-ठंडी पवन,
भीगेगा फिर घर आंगन।
बरसात में खेलेंगे बच्चे,
हर मन को कर दे खुश,
किसान चले उठा हल,
बढ़ गई है चाहत सुख।
डूब रही विरह अग्रि में,
नवेली पिया गये विदेश,
झूला झूल रही अकेली,
यादें अब प्रियतम शेष।
प्रेमिका युगल छुप रहे,
आंखों से ही करते बात,
नींद ना आएगी रात को,
कैसे मिले प्रियतमा साथ।
आते रहेंगे यूं ही बादल,
बीत जाएंगे दिन व रात,
कितने आये चले गये हैं,
कुछ छोड़ जाएंगे साथ।
लो बादल, बरसों खूब,
अमृत की करो बरसात,
मन में भर दो वो उमंग,
काम के लिए बढ़े हाथ।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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रदीफ-नहीं जाती
विधा-गजल
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अब याद दिल से नहीं जाती।
मन से निकाली नहीं जाती।।
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माना कि तुम कहीं मिल जाओ,
तुम भुलाई अब नहीं जाती।
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माना बुरा वक्त सताये,
दिल से क्यों नहीं तुम लजाती।
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कहते हैं मन तड़पाता,
मन क्यों नहीं समझाती।।
सुना
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इंसान धन दौलत को पाकर धनवान नहीं बनता अपितु इंसानियत से धनवान बनता है जिसकी कमी अकसर झलकती है।
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-होशियार सिंह यादव कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
दोहा
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भली फूल की जिंदगी, हो चाहे दिन चार।
माला सुंदर गूंधते, हर जन मिलता प्यार।
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-शब्द-अमरत्व
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आग हवा जल नभ धरा, शरीर के ये तत्व।
साथ छोड़ दे एक दिन, नहीं मिला अमरत्व।।
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-होशियार सिंह यादव कनीना,महेंद्रगढ़, हरियाणा
दोहा ****************
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दोहा नंबर-01
प्रमाणित
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करो प्रमाणित बात को, झूठ मिले अपमान।
बातें सच्ची बोलकर, जन की बढ़ती शान।।
विषय-आखिरी गीत
विधा-कविता
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जिंदगी बड़ी हसीन, करो नहीं अधिक प्रीत,
नहीं पता किस मोड़ पर, बने आखिरी गीत,
जिंदगी को जमकर गाय, होगी उसकी जीत,
जीत सुनहरा वो पल बने, बने मन का मीत।
एक शायर गाता जा रहा, जिंंदगी है खराब,
नशा करती जोर का, होती हैअंग्रेजी शराब,
आखिरी गीत शबाब का, हुस्न के मन भाए,
जिंदगी भी क्या गीत है, हँसे और ये हँसाए।
गीत गा रहे हैं आखिरी, होकर मन में खुश,
नहीं पता किस मोड़ पर, मिले बड़े ही दुख,
गाते गाते मौत आए, बन जाए आखिरी गीत,
जग एक दरिया ऐसा है, नहीं करे कभी प्रीत।
देश का मशहूर फनकार, रफी नाम कहाया,
अंतिम गीत गा रहा था, दोस्त तू आसपास,
उनका अंतिम गीत आज, बन गया है खास,
पर दोस्ती में दगा बढ़ गया,करती है विनाश।
एक लेखक कह रहा था, जिंदगी काम की,
गरीब जन से पूछो लगती, दर्द एक शाम की,
रोटी की खातिर तड़पता, चली जाती है जान,
आखिरी गीत बन जाएंगे, जिंदगी में हो नाम।
एक कवि गुनगुना रहा, जिंदगी एक गीत है,
प्यार के इस गीत से, हर इंसान को प्रीत है,
कभी कभी प्रीत भी, बन जाए अंतिम गीत,
पर निभानी पड़ती है, दुनिया की यही प्रीत।
अंतिम गीत जिंदगी का, होता सुनहरा पल,
मौत भी क्या अजब है, ढूंढ नहीं पाया हल,
कहते चले जाते हैं, कल आज नहीं ये कल,
समय पर जो काम करेगा, होगा वही सफल।
कुछ भी हर इंसान को, जीना जिंदगी मस्त,
दुख के किले समाने हो, करो उनको ध्वस्त,
एक दिन इंसान का सूरज, होता जरूर अस्त,
भावी समस्या जानकर, कभी ना होना त्रस्त।
रावण आये चले गये,सिकंदर का सूर्य अस्त,
पापी, अजामिल गये, हो गये मौत से परस्त,
आखिरी गीत कभी न कहना, रहो सदा मस्त,
कल का सूरज देखेंगे,रहकर जीवन में स्वस्थ।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विधा-कविता
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एक समय था जब होते,
हट्टे -कट्टे सभी जवान,
पूरे जग में होती थी तब,
पहलवान रूप पहचान।
दारा सिंह थे शक्तिशाली,
ग्रेट मंगोल को हराया था,
भारत के बच्चे -जवान ने,
पूरे जग में नाम पाया था।
दूध और घी खाते थे वो,
ताकत का भरा था शरीर,
अपने तन के बल से वो,
हर लेते थे जन की पीर।
अनेकों उदाहरण मिलते,
सुन सुनकर खुश हो मन,
न जाने किसकी बददुआ,
नहीं मिलता आज वो तन।
फास्ट फूड खाते देखे हैं,
घी दूध से भागते हैं दूर,
कांचल मरियल हो गये,
चलते जैसे हो तन गरूर।
आज के युवा लगते बूढे,
कब आएगी वो जवानी,
कलियुग में ओछे धंधे हैं,
करते रहते वो मनमानी।
कार्टून सा बन गया तन,
उठा नहीं पाते एक जूता,
भार लेकर चलना दूर है,
बीड़ी शराब से न अछूता।
गाय, भैंस गांवों से घटी,
दूध का पड़ा खूब टोटा,
इसलिए शरीर कमजोर,
कैसे होगा युवक मोटा।
आने वाले समय में तो,
और भी बुरा वक्त आए,
देख देख युवा पीढ़ी को,
तन और मन अति हर्षाये।
बचा लो युवा पीढ़ी को,
नहीं तो बन जाए संकट,
तन में जान नहीं मिलेगी,
समस्या बने फिर विकट।।
दोहा ****************
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दोहा नंबर-01
प्रमाणित
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करो प्रमाणित बात को, झूठ मिले अपमान।
बातें सच्ची बोलकर, जन की बढ़ती शान।।
दोहा नंबर 02
अट्टालिका
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नहीं महल अट्टालिका, जंगल में है वास।
खाने को फल फूल हैं, रहे रोग ना पास।।
दोहा नंबर 03
उलाहना
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उलाहना सुन देवकी, पकड़ा कान्हा कान।
राधा हँसकर कह रही, करो नहीं अपमान।।
दोहा नंबर 04
षडय़ंत्र
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षडय़ंत्र जब रच लिया, हुआ सभा अपमान।
द्रोपदी चीर हर रहें, कौरव बन अज्ञान।।
विषय-भक्ति की शक्ति
विधा-कविता
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भक्त निराले पूजा करते,
घोर विपत्ति से ना डरते,
तप करते करते वो मरते,
फिर देवता विपत्ति हरते।
पूजा होती कई देवों की,
भक्ति की शक्ति अपार,
देवों का आशीर्वाद मिले,
नहीं होती कभी भी हार।
गंगाजी धरा पर लाने को,
तप किया सगर अंशुमान,
देवलोक से ना आई गंगा,
मिला नहीं उन्हें प्रभु प्यार।
भागीरथ नेे घोर तप किया,
भागीरथी बन गया प्रयास,
गंगा आई धरती पर कहीं,
पापों का किया फिर नाश।
घोर भक्ति की अर्जुन जब,
शिवभोले हुये अति प्रसन्न,
कौरवों पर विजय पाई थी,
हर्षित हुआ था तन व मन।
उत्तानपाद की पत्नी सुनीती,
धु्रव भक्त को जन्म दिया,
एक पैर पर विष्णु तप कर
ध्रुवतारा नभ बन नाम किया।
प्रह्लाद भक्त ने घर तप कर,
विष्णु से पाया बहुत प्यार,
होलिका ने मारना भी चाहा,
जल गई होलिका हुई हार।
मीरा, सहजो हैं हुई भक्तिन,
कृष्णरूप में पाया था गहना,
तुलसी ने राम दर्शन खातिर,
कितने कष्ट पड़ा था सहना।
तीनलोक का प्रथम पत्रकार,
नारद मुनि कहलाए जग में,
कष्टों को दूर किया जग के,
भक्ति में छू लिया नभ को।
सूरदास ने भक्ति की लेखन,
श्रीकृष्ण के हुये अंध दर्शन,
भक्त की खातिर तैयार रहे,
उठाया प्रभु विष्णु सुदर्शन।
हनुमान जैसा नहीं जगत में,
हुआ ना हो सकता है भक्त,
भगवान श्रीराम की खातिर,
दुश्मन का बहा डाला रक्त।
प्रभु के कितने हुये है भक्त,
भक्ति की अपार हो शक्ति,
नैया जन की पार हो जाए,
कर लो प्रभु ईश्वर की भक्ति।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विषय-गणपति बप्पा मोरया
विध-कविता
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विघ्र हरो, बल बुद्धि दो,
रूप ने दिल मोह लिया,
देवों में प्रथम हो पूजन,
हे गणपति बप्पा मोरया।
रिद्धि सिद्धि के दाता हो,
बुद्धिबल में तुम्ही अपार,
शिव परिवार के सदस्य,
दे दो श्रद्धा, भक्ति, प्यार।
हर दिन हर जन पूजा करे,
हर जन की विपत्ति हरते,
तुम बिना नहीं बनते काम,
जीव जगत में है तेरा नाम।
गणेश चतुर्थी,पूजा हो भारी,
कई दिनों पूर्व करते तैयारी,
फिर करवा चौथ पर पूजते,
महिमा तेरी है सबसे न्यारी।
नौ दिनों तक पूजा होती है,
मूर्ति का जल हो विसर्जन,
गणपति बप्पा मोरया पुकारे,
गाये गाथा तेरी धरा हर जन।
आओ घर मेरे पार्वती नंदन,
मूसक सवारी,मोदक पसंद,
लंबोदर, माथे तिलक चंदन,
बुद्धि बल दो, करते वंदन।।
दोहा शब्द-मुरली
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मोहन की मुरली बजे, बढ़ जाता है प्यार।





दुश्मन पल में नष्ट हो, कभी नहीं हो हार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
नमन दोहा संवाद
शब्द
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धर्म कर्म करते रहो, कहते ज्ञानी संत।
पुण्य कभी जब साथ हो, होता सुंदर अंत।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
विधा-दोहा
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धर्म कर्म करते रहो, कहते ज्ञानी संत।
पुण्य कभी जब साथ हो, होता सुंदर अंत।।
मोहन की मुरली बजे, बढ़ जाता है प्यार।
दुश्मन पल में नष्ट हो, कभी नहीं हो हार।।
प्यासे लब जन के मिले, मिलता बहुत उदास।
पानी धारा जब मिले, तब बूझेगी प्यास।।
प्यासे लब यूँ लग रहे, कहे अभी कुछ बोल।
मीठी बातों का रहा, जगत सदा ही मोल।।
मित्र नाम पर दे दगा, पापी की पहचान ।
समय रहे पहचान ले, वरना घटती शान।।
विषय-शृंगार रस(प्रेम, विरह)
विधा-कविता
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कृष्ण लीलाओं में शृंगार रस
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बसों मेरे दिल में गोपाल ,
तुमने यमुना रास रचायो,
पूजे दुनिया सारी तुमको,
तुमने ही जगत हंॅसायो।।
मेरे प्राणों में आ जाओ,
तुम कहलाते देव हमारे,
तेरे ही दर्शन के प्यासे हैं,
सभी राह में खड़े तुम्हारे।
जब-जब तुमको पुकारा,
हो जाते हैं दर्शन तुम्हारे,
एक विनति करते तुमसे,
फिर आओ पास हमारे।
लाख उल्हाना दे रही,
गोपियां मिलकर सारी,
कहती यशोदा माता से,
सुन लो ये अर्ज हमारी,
कृष्ण छेड़ता हैं हमको,
आ जाता नदी किनारे,
जब हम नहाए जल में,
कपड़े उठा लेता हमारे,
राधा सुन सुन हंस रही,
कैसी करती बातें सारी,
मां यशोदा भी हंस रही,
लगती सूरत अति प्यारी।
खूब उल्हाना सुनकर वो,
पूछेंगी श्रीकृष्ण से सारी,
बांध दूंगी ऊखल से उन्हें
माफ करो अबकी बारी।
गोपियां डूब रही दर्द में,
मथुरा चल पड़े गोपाल,
राधा भी प्रेम में लीन थी,
हो चला अब बुरा हाल।
यशोदा व देवकी खड़ी,
रो रही देखके वो लाल,
जा रहे कंस के वो पास,
नहीं पता क्या हो हाल।
मथुरा की ओर चले वो,
रो रहे सभी ग्वाल बाल,
उस तरफ कंस को देखो
बजा रहा खड़ा दुष्ट ताल।
प्रेम कृष्ण के डूब रहे है,
छोटे नटखट नंद गोपाल,
करेगा कंस से युद्ध जाके
हो जाएगा तब बुरा हाल।
जीत हुई जब श्रीकृष्णजी,
मथुरा में तब प्रेम हर्षाया,
मथुरा और देशवासी खुश
हर जन ने फूल बरसाया।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
गजल लेखन
काफिया-आर
रदीफ-है
2122 2122 212
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दूर तो जाना नहीं व्यापार है।
पास तो आना नहीं ये प्यार है।।
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जब कभी देखा तुम्हें ऐसा लगा।
पास में सारा जगत आधार है।।
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खेल हम ऐसा कभी ना खेलते,
जिंदगी हमको लगे बेकार है।
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शाम भी ढल कर कहेगी भोर में,
साथ मेरे खूब ये संसार है।।