Thursday, October 06, 2022

 लंकापति दहन और प्रदूषण

*****************************

********************************

विधा-छंदमुक्त कविता
**************************
लंकापति का दहन हुआ,
उड़ता है धूआं चहुं ओर।
बुराई का अंत निश्चित है,
लाख मना लेना जग शोर।।
 
धूआं का प्रदूषण बढ़ा है,
मचा हुआ है हा-हाकार।
जीवनदायिनी आक्सीजन,
मिलती नहीं कभी उधार।।
 
हर वर्ष जलाते यूं आ रहे,
मिटा नहीं पाये अहंकार।
तन में लाख बुराइयां भरी,
मिटा दो बुराइयों से प्यार।।
 
जब जब प्रदूषण बढ़ गया,
जीना हो गया जन बेकार।
प्रदूषण वो बदहाल करता,
मच जाता जग हाहाकार।।

 
लंकापति का दहन होता,
पर कितने रावण भरे पड़े।
एक रावण को जब फूंकते,
कितने ही रावण पीछे खड़े।।
******************
* डा होशियार सिंह यादव
कनीना, जिला महेंद्रगढ़, हरियाणा