Wednesday, September 30, 2020


जरा सुनो
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बलात्कारियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए। ऐसा कानून भी बनाना चाहिए।
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दोहा ***********************

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आर्तनाद सुन दिल भरा, जीवन निश्चित अंत।
नहीं अमर इस धरा पर, राजा हो या संत।।

दुष्ट साथ अब छोड़ दो, कितने कहते संत।
नरक द्वार वो भोगता, कुत्ते जैसा अंत।।

आर्तनाद जब से सुना, अन्तर्मन बेचैन।
कुर्बानी दी वीर ने, मिला नहीं तब चैन।।







विधा-कविता
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मौन तपस्या बहुत बड़ी, करना जाने कोय,
दिन रात प्रभु रटन, दुख दर्द सदा सम होय,
ऊर्जा तन की रोकिये,करिये सुंदर यह काम,
मौन व्रत धारण करो, हो जाये जग में नाम।

इतिहास गवाह जग में, कितने हुये विद्वान,
मौन शक्ति उन्हें मिली, बने जगत में महान,
शिव,योगी,गांधी,भागीरथ,देव बड़े निराले थे,
मौन शक्ति बम समान,जानता है पूरा जहान।

भोजन करते जब कभी, होती ऊर्जा संचित,
अधिक बोलने से जन, रह जाता है वंचित,
ऊर्जा बचे शरीर गर, लाभ शरीर को हजार,
ऊर्जा नष्ट नहीं कीजिये, जीवन बनता बेकार।

भय,क्रोध,चिंता मिटे, मौन में शक्ति है अपार,
शरीर निरोगी बन जाए, करो मौन से ही प्यार,
जिसने भी मौन किया, सकारात्मक बने विचार,
मौन धारण जब करें, मिलता है प्रभु का प्यार।

शिवभोले जग में हुये, रखते तप का बड़ा ज्ञान,
मौन रहते थे कई कई कल्प, यूं त्रिलोकी महान,
शहस्त्र कल्प जब बीते, टूटता समाधि मौन भंग,
जग के रक्षक वो बने, देवलोक की है वो शान।

बापू के तीन ये बंदर,बतलाते हैं जगत का हाल,
एक उनमें रहता है मौन, बदले जमाने की चाल,
गांधी जब अफ्रीका गये, किया उन्होंने मौन व्रत,
बापू नाम से जाने जाते, बने थे अंग्रेजों के काल।

योगी,संत,महात्माऔर कितने ही हुये जगत देव,
एकांत बैठकर तप करते, मौन रह प्रभु से लीन,
उम्र,तन शक्ति,सांस बढ़े,अपनाओ गर ना यकीन,
सरस्वती में 6 माह तपे शिव, जैसे कोई हो मीन।

भागीरथ ने मौन-तप किया, लाये धरा पर गंगा,
सगर, अंशुमान मौन तप,पहुंचे थे दोनों देवलोक,
मौन शक्ति जब शिव तोड़ी,जटाओं में फंसी गंगा,
अभिमान गंगा गया, लिया नहीं कभी कोई पंगा।

च्यवन ऋषि मौन तप किया, महेंद्रगढ़ की ढोसी,
सुकन्या ने फोड़ी आंखें, तोड़ दिया था मौन व्रत,
शर्याति ऋषि ने अपनी सुकन्या,बनाई ऋषि पत्नी,
च्यवन ऋषि ने शादी करने में,रखी थी एक शर्त।

एक तरफ च्यवन वृद्ध,दूजे सुकन्या खड़ी जवान
अश्विनी कुमार फिर आये,बनाया था च्यवनप्राश
फिर से हुआ जवान च्यवन, तोड़ा था निज मौन,
मौन की शक्ति अपरमपार, जानता नहीं है कौन।

मौन प्रकृति, मौन,आकाश,मौन चंद्रमा की जमीं,
मौन वैली देश में प्रसिद्ध,मौन रहकर हटे कमी,
मौन जुलूस हो या मौन धारण,करे मन को शांत,
बक बक करने से बढ़ते क्रोध,पाप और ये गमी।

सृष्टि का अजब नजारा, मौत मिलती होता मौन,
अंत सभी का मौन रूप है, मौन से उत्पत्ति अंत,
मौन जहां का राज खोलता, मौन बड़ा होता ग्रंथ,
मौन रहकर अर्जित करो ज्ञान,कहते कितने संत।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक


बेटी
विधा-कविता






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बेटी घर संसार है,
कर लो इससे प्यार,
जिस घर बेटी नहीं,
मानो घर नरक द्वार।

बेटी बिना सजे नहीं,
घर,आंगन और द्वार,
बेटी बिना निश्चित है,
एक दिन होगी हार।

बेटी मां, बहन होती,
बेटी करती है उद्धार,
बेटी बिना जगत में,
मिलते हैं कष्ट हजार।



 

Tuesday, September 29, 2020

 

जरा सुनो
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विषय- बेटी की समाज में भूमिका
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बेटी जग का मूल, बेटी घर का प्यार, बेटी बेटों से कम नही, बेटी है घर संसार।
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-दोहा शब्द-मुमकिन
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मुमकिन है इस देश में, पानी का व्यापार।
चालिस का लीटर मिले, बोतल में जलधार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

पवनपुत्र दोहा
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पवनपुत्र का नाम सुन, दुष्ट रुके ना एक।
परम भक्त श्रीराम के, मिलते रूप अनेक।।

पवनपुत्र का नाम लो, मिट जाएंगे पाप।
भक्ति भाव में डूब जा, जिसका मिले न नाप।।

पवनपुत्र रटते रहो, मिट जाए संताप।
संकटमोचन नाम है, हर लेते हैं पाप।।

बजरंगबली नाम लो, संकट में जब आप।
हर दिन शुभ ही मानते, पवनपुत्र का जाप।।



पहली मोहब्बत को, पहला खत जो दिल से लिखा था
विधा-कविता
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बात वर्ष 2000 की है। 21 नवंबर 2000 में मेरी शादी अलवर में हुई थी। अगस्त 2000 में हम लड़की को देखने गये थे। उस वक्त मोबाइल आ चुके थे। खैर अधिक बातें मोबाइल से ही होती थी किंतु मुझे याद है एक खत भी लिखा था। जो मेरी पत्नी ने 17 नवंबर 2010 को हुई उनकी मृत्यु तक संभालकर रखा था। आज उन्हें ही याद करते हुये कुछ अंश लिख रहा हूं।
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वास्तव में 1964 में संगम फिल्म आई थी जिसमें राजेंद्र कुमार एवं वैजंतीमाला पर फिल्माये गीत से प्रेरित होकर खत लिखा था जिसके बोल थे--
ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर
के तुम नाराज़ ना होना
के तुम मेरी जि़न्दगी हो
के तुम मेरी बंदगी हो
ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर
के तुम नाराज़ ना होना
के तुम मेरी जि़न्दगी हो
के तुम मेरी बंदगी हो.......शैलेंद्र सिंह
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  मेरा खत
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पढ़ाई करके थक चुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुका था,
मोहिनी सूरत बड़ी सुहाती है,
रात दिन नहीं सो पाता हूं मैं,
बस याद तुम्हारी तड़पाती है।

देखी तुम्हारी चांद सी सूरत,
सब भूख मेरी मिट जाती है,
जल्दी करके शादी कर लेना,
ये सर्द रात मुझे ना सुहाती है।

एक एक दिन तन्हाई में गुजरे,
हो रहा है, अब मेरा बदहाल,
कैसे दिल की, तुमको सुनाऊं,
डस लेगा मुझे वक्त और काल।

माता पिता से कह दिया अब,
बस करनी है तुमसे ही शादी,
तुम जीवन संगिनी बन जाओ,
बेशक फिर हो जाए बर्बादी।

दोस्तों को भी पसंद आई हो,
मेरी पसंद की, हो नंबर वन,
एक बार कहीं मिल पाये हैं,
दुबारा मिलने को करता मन

आशक्त हुआ न जान तुम पर,
कर दिया तुमने है जादू कोई,
लगता है तुम्हारा यह हाल है,
याद मेरी में तुम भी नहीं सोई।

जल्दी परिवार आएगा अलवर,
कर देगा तेरी रस्म गोद भराई,
एकांत में मेरे खत को पढ़कर,
ले रही होंगी तुम एक जम्हाई।

याद गर कभी तुम्हें मेरी आए,
कर लेना मेरे मोबाइल पे बात,
दिन में देखे कोई, बात चलेंगी,
अच्छा हो करना जब हो रात।

यह खत तुम संभालकर रखना,
याद दिलाएगा यह पहला प्यार,
अच्छा हो तुम भी मन की कहो,
न्यौछावर कर दूं बस जान हजार।

कई लड़कियां जीवन में देखी है,
पता नहीं क्यों हुआ दिल बेकरार,
करता हूं याद तेरा खिल खिलाना,
कुर्बान करूं तुम पर चंद्रमा हजार।

नहीं अमीर का, सुपुत्र हूं मैं कोई,
नहीं हूं मैं रांझा, नहीं हूं महिवाल,
पर इतना मुझे, यकीन हो गया है,
कर दिया तुम्हारे चेहरे ने बेहाल।

खत इतना ही काफी होगा अब,
कर लेंगे शेष मोबाइल पर बात,
पढ़ाई मेरी तुम, चौपट कर देती,
जब आती हो मेरे ख्वाबों में रात।

जल्दी ही शहनाई घर में बजेंगी,
बन ठनकर दूल्हा आऊं तेरे द्वार,
पहली मुलाकात बनी है मुहब्बत,
सदा अमर रहेगा दोनो का प्यार।

बहुत लिखा है, पूरा भरा है खत,
स्कूल मुझको जाना कैसे पढ़ाऊंगा,
शिक्षक साथी जब, मुझसे पूछे तो,
कैसे और क्या मैं उन्हें बतलाऊंगा।

मेरी नमस्ते ले लो, देना है जवाब,
बहुत हो गया बस,जाने दो जनाब,
कटते नहीं दिन, देखा जब शबाब,
कुछ दिन की बात,साथ मेरे ख्वाब।।
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चित्र पर आधारित
विधा-कविता
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बाल रूप होता है प्यारा,
लगता मन मोहक न्यारा,
कभी क्रोध रूप में आता,
कभी मन को खूब सताता।

बालक हो जिद के पक्के,
पर मन के बड़े ही सच्चे,
कभी कभी उनकी अदा,
मासूम चेहरे लगते अच्छे,

खेल खेलते हैं अनोखे,
पहनकर बनिया कच्छे,
उनकी तोतली भाषा में
लगते सचमुच वो बच्चे।

डरते ना कभी किसी से,
राजा हो या हो वे रंक,
उनके दिल उदार होते,
मारते नहीं नाग से डंक।

Monday, September 28, 2020

 जरा सुनो
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पढ़ लिखने के बावजूद भी नौकरियां न मिलने से युवा पीढ़ी डिपरेशन का शिकार हो रहे हैं।हालाल बदतर है।
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अनिवार्य
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करो अनिवार्य देश में, रोजगार अधिकार।
खुशहाली में जन हँसे, बढ़े जगत में प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
-अनिवार्य
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करो अनिवार्य देश में, रोजगार अधिकार।
बढ़े भुखमरी रोज ही, मरते लोग हजार।।





आजादी के मतवाले सरदार भगत सिंह
विधा-कविता
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स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी भगत सिंह नाम था,
आजादी रग रग में बसे, आजादी पाना काम था,
अंग्रेजों से किया मुकाबला, आजादी दीवाना था,
अत्याचारों के आगे न झुके, ऐसा वो परवाना था।
 
केंद्रीय संसद में बम फेंके,सांडर्स को जाके मारा,
सुनकर उनकी दीवानगी, खून खौलता है हमारा,
रंग दे बसंती चोला गीत, सिर चढ़कर बाला था,
अंग्रेजी हुकूमत खातिर,बम, बारूद व गोला था।

असहयोग आंदोलन जब, पूरे देश में फेल हुआ,
भगत सिंह,राजगुरु सुखदेव,क्रांतिकारी नाम दिया
बंगा गांव में जन्में थे, भागोंवाला उन्हें नाम दिया,
ऐसा बहादुर वीर जिन्होंने पूरे जग में नाम किया।

जिस दिन उनका जन्म हुआ, शुभ दिन कहलाया
उस दिन उनके चाचा अजीत,सुवर्ण, कृष्ण आये
उनके पिता किशन सिंह,निज भाई गले से लगाये
भगत की दादी मां, बेटों को देखकर अति हर्षाये

23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने, उनको दी फांसी,
राजगुरु सुखदेव संग, भगत को आई बड़ी हाँसी
फांसी से पहले उन्हें लेनिन की जीवनी भी पढ़ी,
भारत के अमर सपूत ने, हंसके फांसी फिर चढ़ी

सदियों बाद ऐसे वीर होते जो देश के मतवाले हो
सुनकर उनकी दास्तान हर माता मन ही मन दे रो
ऐसे वीर को नमन आज,जिसने दी आजादी भोर
फांसी देकर अंग्रेज कांप उठे, पूरे जग मचा शोर।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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कन्या भ्रूण हत्या क्यों?
विधा-कविता
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शान मानते बेटे जगत में,
चाहत होती है औरत की,
बेटी की गर्भ हत्या करके,
चाहत होती शोहरत की।

अभी जन्म ना लिये जिसे,
करते गर्भ में उसकी हत्या,
पूरे जगत में नाम हो देवी,
औरत करती औरत हत्या।

अमीर लोग तो समझते है,
बेटी को सिर पे एक बोझ,
गरीब बेचारे रो रहे रोताना
दे नहीं पाते खाने को रोज।

लड़का लड़की दोनों देखो,
लड़कियां नहीं कभी कम,
मैदान मार रही लड़कियां,
लड़कों का निकला है दम।

पैसे कमाने की खातिर भी,
डाक्टर बन गये हैं, कसाई,
औरत के गर्भ लड़की बता,
जमकर छुरी डाक्टर चलाई।

कन्या भ्रूण हत्या क्यों करते,
पूछो लड़कों के ठेकेदारों से,
कन्या इतनी, बुरी लगती है,
पूछ लो जुर्म के ठेकेदारों से। 

Sunday, September 27, 2020

 जरा सुनो
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सभी को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान की जाए ताकि अनपढ़ कोई न रहे। अपना काम स्वयं कर सके।
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दोहा***********************

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ब्याह सगाई मानते, किस्मत का सब खेल।
सुरलोक बने जोडिय़ां, हो मन आत्मा मेल।।

दर्पण देखा तो मिला, खूब भरे मन पाप।
पुण्य कर्म जो ना करे, मिलता उनको श्राप।।

दर्पण जब वो देखते, मिलते दिल में खोट।
करते रहना पाप तो, खूब मिलेंगे टोंट।।

बोलती कलम

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विधा----कविता
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हुक्का बार खुल गये हैं,
मार रहे हैं जगकर दम,
देख युवा, पीढ़ी फैशन,
मन विचलित होता गम।

बीड़ी सिगरेट व मसाला,
उस पर चिलम की घूंट,
देख युवा के कारनारमे,
ईश्वर भी जाता है रूठ।

ब्राउन शूगर, ड्रग लेना,
और हेरोइन को स्वाद,
खा पी रहे वो जमकर,
जिंदगी कर रहे बर्बाद।

शराब नशे ने खो दिये,
कितने पुरुष और नारी,
घर बर्बाद  हो चुके है,
रो रही है धरा हमारी।

सेहत अपनी खो रहे हैं,
घर अपना करते बर्बाद,
घर जमीन परिवार खत्म,
कैसा जीभ पड़ा है स्वाद।।
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विधा-कविता
शीर्षक-कलियुग
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समय बुरा आया है अब,
भविष्य क्या हो जाने रब,
बर्तन साफ करते हैं बच्चे,
मिले छुटकारा जाने कब।

सरकार ने लगाया हुआ,
प्रतिबंध, बच्चों से काम,
होटल, दुकानों पर देखों,
करे सरकार को बदनाम।

छोटे बच्चे काम कर रहे,
मां बाप पी रहे है शराब,
कैसा बुरा वक्त आया है,
भविष्य हो रहा है खराब।

मार खा रहे, गाली खाते,
दर्द में जी रहे, वो बेचारे,
दो जून की  रोटी खातिर,
फिर रहे हैं वो मारे मारे।

जागो वक्त अभी है यारों,
वरना फिर पछताते रहना,
बचाओ बच्चों का जीवन,
बीते वक्त फिर ना कहना।

Saturday, September 26, 2020

 दोहा ***********************

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जिम्मेदारी भूलना,पाप निशानी मान।
पुण्य कर्म तल्लीन हो,बढ़े जगत में शान।।

जिम्मेदारी मानकर, करते जो निष्काम।
पुण्य कर्म मन में बसे, समझो प्रभु के धाम।।

उजड़ चुका गुलशन धरा, आती नहीं बहार।
खुशबू तक भी ना रही, कौन करेगा प्यार।।



जब इश्क हो गया और पता भी नहीं चला
विधा-कविता
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मीठी सी चाहत में मन आज कहीं खो गया,
सोचता हूं जिंदगी में यह कैसे हो गया भला,
दो दिलों की धड़कन सुन-सुन मन सो गया,
जब इश्क हो गया और पता भी नहीं चला।

जज्बातों की आंधी होती कहलाता है इश्क,
एक दूजे की चाहत में, कुछ कर गुजरना है,
दोनों तरफ नफरत पले तो दिल लगता जला,
पर इश्क हो गया और पता भी नहीं चला।

हसीन दुनिया में कदम रखना ही होता इश्क,
नहीं गरीबी और अमीरी की चिंता सताती है,
एक पल नजर मिलती, समझो दिल में पला,
पर इश्क हो गया और पता भी नहीं चला!

पहली नजर में मिलने पर पलता आकर्षण,
मन ही मन रात दिन पलता है अनहद प्यार,
आकर्षित करने की होती है लंबी सी कला,
पर इश्क हो गया और पता भी नहीं चला।

आकर्षण के बाद तो पनपता है दिल रोमांस,
एक दूजे को रात दिन चाहते हैं होते पागल,
नजदीकियां बढ़ती जाती हैं सब जानते भला,
पर यह कैसे इश्क हो गया और पता न चला।

अगले पायदान पर आते हैं चाहिए एक धैर्य,
कर गुजरना अच्छा है, पर नहीं होना भावुक,
प्यार में खो जाते हैं दो दिल नहीं समझे बला,
पर यह कैसे इश्क हो गया और पता न चला।

फिर दो दिल इतने करीब हो अंतरंगता बनती,
बांटते हैं अनुभूतियां, एक दूजे के आकर संग,
मखौल चलता बातों ही बातों में ना हो गिला,
पर अजीब  इश्क हो गया और पता न चला।

फिर करते हैं वादे जब दिलों का बढ़ता इश्क,
पूरे करते हर वादे को चाहे मांग ले कोई चांद,
दो दिल कहेंगे वादे अनुसार सब कुछ है मिला,
पर अजब गजब इश्क हो गया पता नहीं चला।

इश्क भी अब मुहब्बत का रूप मानते हैं लोग,
पर इश्क भी जनाब होता है जगत में बुरा रोग,
खुशनसीब जन को जरूर कभी न कभी मिला,
आश्चर्य हुआ आज इश्क हो गया पता न चला।
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विलोम गीत
विधा-गीत
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लाभ हानि चलते साथ,
चले सदा इनकी बारात
कभी होती, हानि जन,
मानव के नहीं हो हाथ।

सुख दुख जीवन के अंग,
मानव देखे दोनों ही रंग,
चक्र रूप में चलते दोनों,
कहलाते हैं मानव अंग।

खुशी गम जीवन का सार,
कभी मिलते खूब ही गम,
कभी मिलता बहुत प्यार,
पर ना मिले खुशी उधार।

दोस्ती दुश्मनी चलती रहे,
कितने ही बन जाते दोस्त,
कितने बन जाते हैं दुश्मन,
कर देते हैं दर्द हमारे मन।।

Friday, September 25, 2020

  लोकगीत
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जीवन में आता कभी, लगे नयापन काम।
खूब जहां में ढूंढ लो, हो जाएगी शाम।।

मानों जीवन है अभी, नयापन भरा जोश।
ठोकर लगती जब गिरे, आ जाता है होश।।

नया मानते हो जिसे, जीवन का वो अंग।
खुशियां जब झूमती, मन में भरती रंग।।

जीवन में हो जोश तब, नयापन लिये काम।
नहीं सफलता जब मिले, हो जाती है शाम।।






सागर मंथन
विधा-कविता
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दुर्वासा ऋषि का अपमान हुआ,
दे दिया इंद्र को लक्ष्मीहीन श्राप,
ब्रह्मा, विष्णु महेश मिलकर करे,
कैसे हो लक्ष्मी से इंद्रदेव मिलाप।

देवता दानव लड़े देव हुये क्षीण,
विष्णु नेे समझाई, देवों को बात,
मंथन लगातार चले दिन व रात,
वक्त है सोचो, करो दो दो हाथ।

दैत्यों को दिया लालच अमृत का,
हो गये दानव ,झटपट सभी खुश,
देवों ने वासुकी, नाग पूंछ पकड़ी,
दैत्यों का पकड़ा दिया नाग मुख।

कच्छप अवतार लिया विष्णु ने,
अपने पर टिकाया वो मंदराचल,
वासुकी नाग से शुरू मंथन समुद्र,
शिव समझे यूं होगी समस्या हल।

हलाहल सबसे पहले ही निकला,
भयभीत हुये सभी दानव और देव,
शिवभोले ने कंठ धारण कर लिया,
कहलाए वो नीलकंठ वाले ही देव।

फिर निकली थी कामधेनु जगत में,
करती है धरती पर वो ही उजाला,
उच्चै श्रवा निकला, तत्पश्चात घोड़ा,
इंद्र के पास रहा, लगाया मुंह ताला।

14 रत्नों में में फिर निकला ऐरावत,
इंद्रदेव ने पास रहा, यह एक खास,
कौस्तुभ मणि निकली मंथन के रास,
श्रीकृष्ण ने रख ली अपने ही पास।

पारिजात एक पौधा, सुंदर बहुत रंग,
देवों के पास रहा,बदला जीवन ढंग,
रंभा नामक अप्सरा सभा रही कुबेर,
मंथन तेजी से बढ़ा, हुई नहीं थी देर।

लक्ष्मी निकली मंथन,सुंदर और जवां,
विष्णु देव आगे बढ़े किया था विवाह,
वारुणि नामक निकली मंथन से शराब,
राक्षस पीकर मस्त हुये, हो गये खराब।

हुई फिर चंद्रमा उत्पत्ति, शोभा आकाश,
कल्पवृक्ष फिर आया, सुंदर होते है फूल,
देवताओं ने अपना लिया राक्षस गये भूल,
धीरे धीरे कमजोर राक्षस नष्ट हुये समूल।

फिर निकला पांचजन्य शंख सुंदर है रूप,
फिर आया धन्वंतरि, जिसकी थी तलाश,
धन तेरस का दिन, अमृत देखा जब हाथ,
अमृत पीने को दौड़े, दानव देव भूले साथ।

फिर आये विष्णु ले रूप मोहिनी अवतार,
देवों को पिलाया अमृत नैया कर दी पार,
राहु केतु राक्षसों ने, किया था अमृत पान,
विष्णु सुदर्शन काट दिये, राक्षस हुई हार।

आज भी जन राशि में राहु केतु है नाम,
नीच गृह कहलाते हैं, राक्षस के ही रूप,
इनका पूरा शरीर नहीं, कहाते हैं कुरूप,
विष्णु की महिमा को जानते गरीब भूप।

समुद्र मंथन से हुआ देवताओं का नाम,
सभी देवता अमृत पी बैठे थे निज धाम,
मानव देखो आज भी सोचता बुरी बात,
ऐसे में वो देव भी नहीं देते हैं जन साथ।।

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स्वरचित, नितांत मौलिक
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Thursday, September 24, 2020

 जरा सुनो
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विषय- नशे की गिरफ्त में युवा वर्ग और सरकार की जिम्मेदारी
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 नशे की गिरफ्त में युवा वर्ग बढ़ते ही जा रहे हैं   और सरकार शत प्रतिशत है जिम्मेदार है। सरकार चाहे तो नशीली चीजें बेचने वालों के लिए सख्त कानून बनाकर रोक सकती है। शराब आदि पूरे देश में बंद कर सकती है।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

दोहा ***********************

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सता किसी को हँस रहे, भूले दाता नाम।
लाख छुपा ले पाप को, एक दिन हो बदनाम।।

खाना पीना भूलकर, करे खेत पर काम।
भरे पेट वो देश का, कृषक पड़ा है नाम।।

पुण्य कर्म मेें ध्यान दो, बनो नहीं शैतान।
निज करनी का एक दिन,करना है भुगतान।।


क्या हुआ
विधा-कविता
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क्या  हुआ, संसार को?
पापों के,   व्यापार को,
बढ़ती इस, बेकार को,
सच्चे जन की हार को।

क्या हुआ, परिवार को?
वैमनस्य की दीवार को,
आपस में लड़ते मिलते,
खो गये, उस प्यार को।

क्या हुआ, भाई -भाई?
बढ़ गई आपस में खाई,
हँस रहे लोग ले जम्हाई,
शर्म लिहाज कहां भगाई।

क्या हुआ, माता -पिता?
जला रहे, उनकी चिता,
क्या हो गई, उनसे खता,
बेटा-बेटी, मिलते खपा।

क्या हुआ, ये समाज को?
आपस की बढ़ी आग को,
दुश्मनी के काले नाग को,
विषमता के गाते राग को।

क्या हुआ, हर प्रदेश को?
आपसी बढ़े एक द्वेष को,
भागमभाग जन की रेस को
सभ्यता वाले अवशेष को।

क्या हुआ, भारत देश को?
रणबांकुरों के, अशेष को,
एकता, अखंडता शेष को,
हड़प्पा मिले अवशेष को।

क्या हुआ, देश के मंत्री?
नहीं रहे, अब वो संतरी,
ले रहे जनता से ही वोट,
मार रहे उनको बस टोंट।

क्या हुआ, अब भाईचारा?
देख-देख जगत भी हारा,
गरीब पिसता जग बेचारा,
तग बना मूक दर्शक सारा।

क्या हुआ, अलगाववाद?
एकता की आती है याद,
किससे करे अब फरियाद,
बदल रहा है जन मिजाज।

क्या हुआ, सभी पूछ रहे?
जवाब कहीं ना मिल रहा,
और अब जाये जन कहां,
लगता है सुलग रहा जहां।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
 व्हाट्सअप एवं फोन -09416348400
मेल आईडी-
इंस्टा आईडी--


हौसला
विधा-गीत
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हौसला दिल में रख,
आगे बढऩा सीख ले,
कोई तेरा साथ ना दे,
मत किसी से भीख ले।

हौसले की है कहानी,
करो न कभी मनमानी,
आए एक दिन जवानी,
होगी मौजों की रवानी।

हौसला नाम जिंदगी,
हौसला  नाम बंदगी,
हिम्मत से बढ़ा चल,
हर समस्या का हल।

हौसला गर छोड़ दे,
जीवन मुख माड़ ले,
हौसला गर दिल में
कांटों का मुंह तोड़ दे।

हौसला होता सहारा
मिलता इससे किनारा,
हो जाता  वारा न्यारा,
यही हो फर्ज हमारा।

हौसले से होता नाम,
कर देता सफल काम,
हौसले का नहीं दाम,
हौसला हे नाम राम।
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Wednesday, September 23, 2020

 दोहा ***********************

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मर्यादित रहकर वटुक, सीखे गुरु से ज्ञान।
शीश झुकाते शान से, तनिक नहीं अभिमान।।

नहीं ज्ञान अभिमान हो, नहीं दान का गान।
करो प्रशंसा खुद कभी, घट जाएगा मान।।

मात पिता आराधना, गुरु का कर सत्कार।
वाणी में हो मधुरता, मिले जहां का प्यार।।



मोबाइल 

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दिन रात तुम्हारा नाम रटता,
नहीं कोई भी समय बचता,
दिन रात बस ख्याल आता,
मोबाइल मुझे  खूब सुहाता।
एक पल  भी ना दूर करता,
बीवी परवाह  न बच्चों की,  
रोटी, पानी सभी भूल जाता,
सुध बुध भुलाए अच्छों की।
आंखें तुझे  कुर्बान कर दूंगा,
रोग बेशक हजार लग जाए,
शिक्षा दीक्षा सब तुम ही हो,
प्रिय मोबाइल पास में आए।
कई बार गड्ढों में गिर पड़ता,
दुर्घटनाएं होते -होते बचती,
क्या चीज  बनाई मोबाइल,
हर दिल में तेरी याद बसती।


आ गई दो बुरी बीमारी
दवा से नहीं होगी ठीक
नहीं  सुधरेंगे लोग कभी
देते रहो चाहे कोई सीख,
सेल्फी की आई बीमारी
झटपट अपलोड करते है
मोबाइल पर ध्यान  करते
बेशक पड़ते और गिरते हैं,
बेशक जान जा रही होती
झटपट विडियो बनाते जन
अपलोड करे  विडियो को
खुश कर  लेते  अपना मन,
21वीं सदी की  दोनो बुराई
समाज में कलंक बन चुकी
देश धर्म को  नष्ट कर  देती
सभ्य इंसान हुआ बड़ा दुखी।


मोबाइल 

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घट गई अब दूरियां
यंत्र पर यंत्र आए हैं
एक दूजे से हैं स्मार्ट
जन को ये लुभाए हैं,
बैलगाड़ी से वायुयान
बढ़ी इंसान  की शान
अब आए  स्मार्टफोन
बने चुके जन के प्राण,
भोर से शाम तक बात
लिए हुए अपने  हाथ,  
रहता जन जन के पास
बीत जाती  सारी रात,
क्या फोन जग में आए
इंसान का  सुख छीना
प्राणों से प्यारा होता है
रीना हो या  हो मीना।
फोन, फोन, फोन, फोन
कर दिए कई जन मौन
खाना सारा भूल जाएंगे
जब नहीं हो फोन टोन,
खाना बेशक नहीं मिले
बस मोबाइल एक मिले
सारे गम पल में गायब
उसके तो बाछे से खिले,
आंखें खो दी कान बहरे
हो रही कितनी दुर्घटनाएं
कितना  नुकसान बता दे
सेल को छाती से लगाए,
विज्ञान बड़ी उपलब्धि
पर  बनी है अभिशाप
हर चीज का पैमाना है
फोन करने का न माप।
मोबाइल का जमाना है
बस ताना  बाना बुनता
कानों में वो लीड लगा
बस भोंडे  गाने सुनता,
एक परिवार पांच जने
सारे ही खोए मस्ती मेंं
व्हाटस अप में लीन हैं
आग लगे इस बस्ती में,
लीड लगा गली में चले
हार्न पर हार्न बजाए जा
व्यर्थ की बातें देख सुन
समय बर्बाद कराए जा,
बड़े काम की खातिर है
सेल का होता दुरुपयोग
आपसी भाईचारा भूले,
परिवार में घटा संजोग।
मोहभंग हुआ पुस्तक से
बच्चे मोबाइल चलाते हैं
सादा खाना भूल गए हैं
अब सुरा मांस चाहते हैं,
हिंदी में वो बात करें ना
अंग्रेजी गीत गुनगुनाते हैं
पानी की जगह ठंडा पी
कानों में लीड लगाते हैं।
** होशियार सिंह लेखक,कनीना, हरियाणा**


स्नेह/प्रेम
विधा-कविता
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जिस दिल में प्यार बसे,
वो दिल मंदिर कहलाए,
जिस घर द्वार पाप बसे,
वो नरक द्वार कहलाए।

गरीब अमीर हर दिल,
प्यार सदा ही बसता है,
जिस दिल में घृणा हो,
वो नागिन सा डसता है।

स्नेह आपसी बंधन हो,
जीवों में भी मिलता है,
देख देख बच्चों का प्रेम,
मन फूल सा खिलता है।

प्रेम कोई नहीं हाट मिले,
हर दिल में यह बसता है,
प्रेम जहां से निराला होता,
प्रेम इस जहां में सस्ता है।

प्रेम कहानी रहती अमर,
पर प्रेम का कठिन डगर,
प्रेम बड़ा अनमोल होता,
प्रेम का सुंदर होता सफर।
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जीवन संघर्ष
विधा-कविता
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जीवन एक संघर्ष कहानी,
चलती नहीं इसमें मनमानी,
कभी दुख, बुढ़ापा दे जाता,
कभी अल्हड़ आती जवानी।

कभी ऊंची पढ़ाई करते हम,
कभी फीस की है मारामारी,
कभी बचपन में बीमार होते,
कभी मां रोती खड़ी बेचारी।

कभी बेरोजगारी की लाइन,
कभी शादी की होती तैयारी,
कभी अपनों की बेरुखी हो,
कभी बच्चों, की मूर्त प्यारी।

संघर्ष की भट्टी में, तपना हो,
तब मिलती है मंजिल अपनी,
हारकर जो बैठ जाएगा कभी,
जीत कभी ना उसको मिलनी।
****************************
*स्वरचित, नितांत मौलिक
************************
*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन -09416348400

नमन कलम बोलती है साहित्य समूह
विषय क्रमांक -206
23 सितंबर 2020
विषय-वो लम्हें
विधा-कविता
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याद आते हैं वो लम्हें,
नदी किनारे मिलते थे,
गमों को भूल जाते थे,
मन के फूल खिलते थे।

याद आते हैं वो लम्हें,
विवाह बंधन में बंधे,
बोल नहीं पाये उनसे,
सबके गले देख रुंधे।

याद आते हैं वो लम्हें,
जब हम छोटे बच्चे थे,
झूठ कभी नहीं बोलते,
मन के कितने सच्चे थे।

याद आते हैं वो लम्हें,
कभी हम स्कूल जाते
खेल खेल में हंसते थे,
हर दिल में बसते थे।।

****************************
*स्वरचित, नितांत मौलिक
************************
*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन -09416348400



Tuesday, September 22, 2020

 पूजा/आराधना
विधा-दोहे
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करते पूजा देव की, बनते बिगड़े काम।
मिले सफलता हर घड़ी, होगा जग में नाम।।

मात पिता आराधना, गुरु का कर सत्कार।
वाणी में हो मधुरता, मिले जहां का प्यार।।

पूजा की थाली रखो, ईश्वर के ही पास।
रोग दोष सब दूर हो, देगी भक्ति मिठास।।









-फिर कभी
विधा-कविता
********************
करना हो कर ले अभी,
सोच ना हो फिर कभी,
मन बना ले आज अभी,
सफल हो वो जन तभी।

रावण बड़ा विद्वान था,
पर उसे  अभिमान था,
सोच-सोच आज कल,
निकल गये समय-पल।

आगे से, धुआं मिटाना,
रावण दिल थी चाहत,
आलस्य से वो भरा था,
नहीं दिला पाया राहत।

आसमान को सीढ़ी भी,
रावण इच्छा थी लगाना,
आलस्य के घमंड में वो,
बीता दिया उसने जमना।

फिर कभी की चाहत हो,
वो नहीं सफलता पाएगा,
सुस्ती में जीवन जीए तो,
प्रभु भी नहीं बचा पाएगा।

आल अभी लो इसी वक्त,
रखता काम करने की चाह,
सफल हर काम हो उसका,
लोग कहेंगे वाह वाह वाह!

फिर कभी, दिल में बसता,
रोता वो, कभी नहीं हंसता,
उसे समय का नाग डसता,
उसके मन आलस्य बसता।

समय पर काम जो करता,
भाग्य उसका देता है साथ,
हर जगह नाम हो उसका,
वो कहलाता गुणी, उदात।

आज का काम आज करो,
कल का काम करना कल,
समय निकला हाथ न आए,
रहे समस्या नहीं मिले हल।

विद्वान जन चुस्त मिलते हैं,
मूर्ख व्यक्ति सुस्त मिलते हैं,
मेहनत वो जगत आंगन हो,
जहां खुशी फूल खिलते हैं।

फिर कभी वो विष बेल है,
फैलकर जग करती विनाश,
आज अभी वो अमृत होता,
विष का भी कर देता नाश।

फिर कभी जिस दिल बसे,
होता नहीं है, उसमें संचार
आज अभी जिस जन मिले,
प्रशंसक मिले उसके हजार।

आज अभी की वाणी गूंजे,
उस जन गाते गीत मल्हार,
आज अभी जिसका ओज,
वो हरदम काम को तैयार।

फिर कभी को मार भगाए,
जीवन अपना सफल बनाए,
आज अभी को आदर देकर,
अपने दिल में आज बसाएं।।

Monday, September 21, 2020


दोहा
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लंबा जीवन लो चले, मंजिल अपनी एक।
रास्ते में मिलते कई, चलते मार्ग अनेक।।

बेटी बेटा मान ले, होते एक समान।
बदलों अपनी सोच को, अभी वक्त ले जान।।

बच्चे देश की शान हैं, बनाओ इन्हें महान।
अनपढ़ रखना भूल है, दो इनको भी ज्ञान।।

मां बाप की लाज की, रखते जो है शान।
वो बच्चे विद्वान हैं, बने देश पहचान।।



कवि और काव्य
कविता
**********************

कौन है कवि--
*********
सूरज से भी तेज गति,
गणेश भांति चले मति,
पहुंचे झट जहां न रवि,
कहलाता वो ही कवि।

कल्पना लोक में घूमता,
निज कलम को चूमता,
तलवार धार हो कलम,
सिर कर दे झट कलम।

बातों का वो होता धनी,
गहरी सोच में रहे घनी,
काव्य से जन बहलाता,
वहीं तो कवि कहलाता।

मधुमक्खी भांति व्यस्त,
नहीं देता कोई भी कष्ट,
बुराई कर देता वो नष्ट,
काव्य में कर देता पस्त।

काव्य पर निकले वाह,
जिसकी बेहतर है छवि,
निज पराये में भेद नहीं,
कहाता सच्चा एक कवि।

जो फूल सा मुरझाता है,
नई कविता ले आता है,
बुराई को झट से काटता,
भरी भीड़ को वो डाटता।

कभी नहीं, वो माने हार,
काव्य,कलम से हो प्यार,
खरी सुना दे नहीं उधार,
बात एक के सोच हजार।

धन दौलत का ना भूखा,
खा लेता वो रूखा सूखा,
उसकी भाषा हो सलिल,
काव्य का लगता वकील।

दर्द सहता पर ना कहता,
अपनी धुन में मस्त रहता,
जिसके दिल में बसे अवि,
वो कहलाएगा मधुर कवि।

क्या है काव्य--
************
एक एक शब्द में भरा रस,
लोट पोट हो जा हँस हँस,
प्रफुल्लित हो मानव नस नस,
एक शब्द के अर्थ दस दस।

शब्द वार हो बम -तलवार,
बुराई का कर, देता है नाश
काव्य में भरा हुआ मीठास,
लगता कभी वो ही सुभाष।

मिलता काव्य में ज्ञान भरा,
बातों में उतरता सदा खरा,
सौम्य प्रकृृति का वो धनी,
मन खुशियों से मिले भरा।

जीते जी, शोहरत मिलती,
भाषा में भरा दर्द व खुशी,
शब्द लगके जैसे हो गहना,
ऐसे काव्य का क्या कहना।

काव्य में जड़े हीरे व मोती,
सुंदरता देख -देखकर रोती,
सभी रसों से भरा हो काव्य,
देश विदेश में कद्र भी होती।

कवि और काव्य दूध-पानी,
कवि काव्य दोनो कहे मान,
सदियों से कवि काव्य जान,
देश की करवाते हैं पहचान।।

*********************
स्वरचित, नितांत मौलिक
*******************

सरहद
विधा-कविता
************************

लो चला वो वीर सिपाही,
जा रहा सरहदों पर आज,
वीर देशभक्तों को रहता है,
निज मातृभूमि पर ही नाज।

अपने बदन का, खून दे दे,
बचाते निज वतन की शान,
प्राणों की आहुति पल में दे,
इतनी शूरवीरों की पहचान।

सोये होते हैं जब घरों में तो,
करते सरहदों की रखवाली,
कभी बमों के साये में जीते,
कभी झेलते रातें जो काली।

एक पलक भी चैन नहींं है,
कभी युद्ध में जाना है पड़ता,
बेशक अपनी जान भी जाये,
अपने पूरे जोश से वो लड़ता।

सरहदों के रखवालों को अब
आओ करे मिल आज प्रणाम,
माटी का मोल, चुका देते वो,
कर जाते हैं भारत मां का नाम।।
 

कवि और काव्य
विधा-कविता
**********************

कौन है कवि--
*********
सूरज से भी तेज गति,
गणेश भांति चले मति,
पहुंचे झट जहां न रवि,
कहलाता वो ही कवि।

कल्पना लोक में घूमता,
निज कलम को चूमता,
तलवार धार हो कलम,
सिर कर दे झट कलम।

बातों का वो होता धनी,
गहरी सोच में रहे घनी,
काव्य से जन बहलाता,
वहीं तो कवि कहलाता।

मधुमक्खी भांति व्यस्त,
नहीं देता कोई भी कष्ट,
बुराई कर देता वो नष्ट,
काव्य में कर देता पस्त।

काव्य पर निकले वाह,
जिसकी बेहतर है छवि,
निज पराये में भेद नहीं,
कहाता सच्चा एक कवि।

जो फूल सा मुरझाता है,
नई कविता ले आता है,
बुराई को झट से काटता,
भरी भीड़ को वो डाटता।

कभी नहीं, वो माने हार,
काव्य,कलम से हो प्यार,
खरी सुना दे नहीं उधार,
बात एक के सोच हजार।

धन दौलत का ना भूखा,
खा लेता वो रूखा सूखा,
उसकी भाषा हो सलिल,
काव्य का लगता वकील।

दर्द सहता पर ना कहता,
अपनी धुन में मस्त रहता,
जिसके दिल में बसे अवि,
वो कहलाएगा मधुर कवि।

क्या है काव्य--
************
एक एक शब्द में भरा रस,
लोट पोट हो जा हँस हँस,
प्रफुल्लित हो मानव नस नस,
एक शब्द के अर्थ दस दस।

शब्द वार हो बम -तलवार,
बुराई का कर, देता है नाश
काव्य में भरा हुआ मीठास,
लगता कभी वो ही सुभाष।

मिलता काव्य में ज्ञान भरा,
बातों में उतरता सदा खरा,
सौम्य प्रकृृति का वो धनी,
मन खुशियों से मिले भरा।

जीते जी, शोहरत मिलती,
भाषा में भरा दर्द व खुशी,
शब्द लगके जैसे हो गहना,
ऐसे काव्य का क्या कहना।

काव्य में जड़े हीरे व मोती,
सुंदरता देख -देखकर रोती,
सभी रसों से भरा हो काव्य,
देश विदेश में कद्र भी होती।

कवि और काव्य दूध-पानी,
कवि काव्य दोनो कहे मान,
सदियों से कवि काव्य जान,
देश की करवाते हैं पहचान।।

*********************
स्वरचित, नितांत मौलिक
*******************

सरहद
विधा-कविता
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लो चला वो वीर सिपाही,
जा रहा सरहदों पर आज,
वीर देशभक्तों को रहता है,
निज मातृभूमि पर ही नाज।

अपने बदन का, खून दे दे,
बचाते निज वतन की शान,
प्राणों की आहुति पल में दे,
इतनी शूरवीरों की पहचान।

सोये होते हैं जब घरों में तो,
करते सरहदों की रखवाली,
कभी बमों के साये में जीते,
कभी झेलते रातें जो काली।

एक पलक भी चैन नहींंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं है,
कभी युद्ध में जाना है पड़ता,
बेशक अपनी जान भी जाये,
अपने पूरे जोश से वो लड़ता।

सरहदों के रखवालों को अब
आओ करे मिल आज प्रणाम,
माटी का मोल, चुका देते वो,
कर जाते हैं भारत मां का नाम।।
 

प्रतियोगिता के लिए
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कवि और काव्य
विधा-कविता
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कौन है कवि--

*********
सूरज से भी तेज गति,
गणेश भांति चले मति,
पहुंचे झट जहां न रवि,
कहलाता वो ही कवि।

कल्पना लोक में घूमता,
निज कलम को चूमता,
तलवार धार हो कलम,
सिर कर दे झट कलम।

बातों का वो होता धनी,
गहरी सोच में रहे घनी,
काव्य से जन बहलाता,
वहीं तो कवि कहलाता।

मधुमक्खी भांति व्यस्त,
नहीं देता कोई भी कष्ट,
बुराई कर देता वो नष्ट,
काव्य में कर देता पस्त।

काव्य पर निकले वाह,
जिसकी बेहतर है छवि,
निज पराये में भेद नहीं,
कहाता सच्चा एक कवि।

जो फूल सा मुरझाता है,
नई कविता ले आता है,
बुराई को झट से काटता,
भरी भीड़ को वो डाटता।

कभी नहीं, वो माने हार,
काव्य,कलम से हो प्यार,
खरी सुना दे नहीं उधार,
बात एक के सोच हजार।

धन दौलत का ना भूखा,
खा लेता वो रूखा सूखा,
उसकी भाषा हो सलिल,
काव्य का लगता वकील।

दर्द सहता पर ना कहता,
अपनी धुन में मस्त रहता,
जिसके दिल में बसे अवि,
वो कहलाएगा मधुर कवि।

क्या है काव्य--
************
एक एक शब्द में भरा रस,
लोट पोट हो जा हँस हँस,
प्रफुल्लित हो मानव नस नस,
एक शब्द के अर्थ दस दस।

शब्द वार हो बम -तलवार,
बुराई का कर, देता है नाश
काव्य में भरा हुआ मीठास,
लगता कभी वो ही सुभाष।

मिलता काव्य में ज्ञान भरा,
बातों में उतरता सदा खरा,
सौम्य प्रकृृति का वो धनी,
मन खुशियों से मिले भरा।

जीते जी, शोहरत मिलती,
भाषा में भरा दर्द व खुशी,
शब्द लगके जैसे हो गहना,
ऐसे काव्य का क्या कहना।

काव्य में जड़े हीरे व मोती,
सुंदरता देख -देखकर रोती,
सभी रसों से भरा हो काव्य,
देश विदेश में कद्र भी होती।

कवि और काव्य दूध-पानी,
कवि काव्य दोनो कहे मान,
सदियों से कवि काव्य जान,
देश की करवाते हैं पहचान।।

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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
सरहद
विधा-कविता
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लो चला वो वीर सिपाही,
जा रहा सरहदों पर आज,
वीर देशभक्तों को रहता है,
निज मातृभूमि पर ही नाज।

अपने बदन का, खून दे दे,
बचाते निज वतन की शान,
प्राणों की आहुति पल में दे,
इतनी शूरवीरों की पहचान।

सोये होते हैं जब घरों में तो,
करते सरहदों की रखवाली,
कभी बमों के साये में जीते,
कभी झेलते रातें जो काली।

एक पलक भी, चैन नहींं  है,
कभी युद्ध में जाना है पड़ता,
बेशक अपनी जान भी जाये,
अपने पूरे जोश से वो लड़ता।

सरहदों के रखवालों को अब
आओ करे मिल आज प्रणाम,
माटी का मोल, चुका देते वो,
कर जाते हैं भारत मां का नाम।।

Sunday, September 20, 2020

 
दाम/कीमत/मूल्य/मोल विधा-दोहे
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ख्याल करे वो रात दिन, खुल जाती है पोल।
जन की कीमत जान लेे, जीवन है अनमोल।।

जोर शोर से बोलते, रिश्वत में ले दाम।
पीते निर्धन खून ये, ओछे इनके काम।।

मौका कभी न चूकना, कीमत वक्त की जान।
युगों युगों से मानते, वक्त बड़ा बलवान।।

कीमत कुर्सी देख के, बैठे उस पर लोग।
इसका चक्कर जान ले, होता कुर्सी रोग।।

सुंदरता उपहार है, नहीं मोल की चीज।
खलिहानों में ढूंढते,  बना नहीं है बीज।।



चूहा
विधा-कविता
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कृंतक प्राणी कहलाते हैं, कुतर जाते चीज हमारी,
कभी अन्न,पेड़ कुतरता, कभी कुतरे किताब हमारी,
अजीब प्राणी धरती का, कहती है दुनिया यह सारी,
गणेश का प्रिय वाहन, करते हैं बस इसकी सवारी।

बुद्धि, विद्या के दाता कहलाते, दुश्मनों का करे संहार,
मूषक भी फुर्तीला होता, वस्तुओं का करे काम तमाम,
क्यों करते गणेश चूहे की सवारी,दो कथाएं ये समझाएं,
कैसे चूहा वाहन बना गणेश का, आओ आज बतलाएं।

गजमुखासुर राक्षस ने कभी, देवों को, कर दिया परेशान,
देवता गणेश के पास पहुंचे, फिर राक्षस से युद्ध घमासान,
दांत टूट गया गणेश का, टूटे दांत से गणेश ने किया प्रहार,
राक्षस, चूहा बनकर डर से भागा,गणेश समक्ष मान ली हार।

गणेश ने पकड़ा राक्षस को, बना लिया अपना सुंदर वाहन,
दूसरी कथा बतलाती है, क्रौंच नामक गंधर्व था सभा देवाय ,
अप्सराओं से वो करता ठिठोली, इंद्र ने क्रोध में चूहा बनाय,
क्रोध में आया था तब इंद्र, क्रौंच को दिया मूषक ही बनाय।

मूषक पहुंचा पाराशर ऋषि के, अन्न, कपड़े दिये काट सारे,
वाटिका उजाड़ी, ग्रंथ कुतरे, परेशान कर डाले ऋषि हमारे,
शरण ली तब ऋषि ने गणेश की, फेंका गणेश ने निज पाश,
बेहोश हुआ मूषक गणेश पाश से, डाला उसे हाथी के पास।

जब होश में चूहा आया, पूजा करने लगा वो गणेश की,
स्तुति की गणेश ने उसकी, दे दिया मूषक एक वरदान,
मूषक ने अपनी इच्छा से, गणेश वाहन बनना लिया मान,
तब से मूषक ही गणेश जी का है, वाहन से हो पहचान।

बिल्ली मौसी से डरता है, उत्पाती जहान में मूषक निराला,
नहीं मानता किसी हाल में, प्लेग फैलाये, कर देता काला,
कुतर कुतर लाखों का करे नुकसान, ऐसा है मूषक हमारा,
शान की सवारी गणेश की, सुनो कहानी यह फर्ज हमारा।
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फैशन का भूत
कविता
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अजब गजब का फैशन आज,
फैशन करके करते दिल राज,
फैशन करने से ना आये बाज,
फैशन को समझते जैसे ताज।

लड़कियां फैशन में अब आगे,
कपड़े ऐसे जैसे बांधे तन धागे,
लड़कों के सिर देते आये दोष,
बस सुनकर होता है अफसोस।

फटी पुरानी रद्दी जो लगती हो,
वो महंगी, कहलाती बड़ी पेंट,
ऐसे मटक मटक कर चलते हैं,
जैसे चूल्हे पर गाड़ दिये हैं टैंट।

कपड़े औछे फाड़े हुये से लगते,
बात करो युवा झट से सुलगते,
कुत्ते देखकर, उनके लग जाते,
फिर भी फैशन में वो मर जाते।

लगे गरीबी सता रही है खूब,
कपड़े लगते जैसे उगी हो दूब,
लो कहते वाह फैशन है खूब,
निखार रहे अपना वो तो रूप।

भारत सभ्यता संस्कृति में आगे,
पश्चिमी की सभ्यता क्यों हावी,
हालात आज के दिन जब ऐसा,
कैसी आयेगी पीढ़ी कहाए भावी।।