Monday, November 30, 2020

 मिलना बिछुडऩा
विधा-कविता
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मिलना बिछुडऩा सदा रहे,
कहलाती है जग की रीत,
निश्चित ही मिलना होगा ,
मिलने से बढ़ जाए प्रीत।

बिछुडऩा भी भाग्य बदा,
फिर क्यों मन में इतराते,
चला जाना है एक दिन ,
जो इस जग में जन्म पाते,

मिलने पर मत इतराना,
बिछुडऩे पर मत पछताना,
यह जग मुसाफिरखाना है,
लगा रहता है आना जाना।।
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   सर्दी
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सर्दी सता रही है जन को,
रो रहे लोग, गरीबी मार,
देखो इन गरीब जनों को,
कर लो कभी इनसे प्यार।

प्रभु ने बनाया सबको ही,
लगती है ठंड हर शरीर,
इंसान वहीं कहलाता है,
जो जग की लेता हर पीर।

प्रभु ने बनाया अजब जग,
बना डाला गरीब तो अमीर,
गरीब वहीं जो दान नहीं दे,
दानदाता होता जग में अमीर।

दान पुण्य से, पहचान बने,
कह गये कितने जग के संत,
धन दौलत को जोड़ते रहना,
हो जाएगा एक दिन ही अंत।
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निगरानी/निरीक्षण/देखरेख/अभिभावकत ा/सरपरस्ती/संरक्षण... इत्यादि
विधा-कविता
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देखरेख जब होती रहे,
घर में बच्चे की आज,
रोग दोष दूर हो जाएंगे,
दुनियां को होगा नाज।

देखरेख अभाव रहेगा,
पनप नहीं पाएगी पौध,
देखरेख बुजुर्ग की करो,
हो चुका है यही शोध।

संरक्षण माता पिता का,
मिलता हर किसी बाल,
आगे बढ़ता वो जाएगा,
उन्नति करेगा हर हाल।

नहीं कभी कोई डर रहे,
जिस घर में हो देखरेख,
सूना घर कभी देख लेंगे,
चोर घुस सकते अनेक।

निगरानी में  हैं पनपते,
जीव, पेड़ और इंसान,
निगरानी आज के दिन,
जरूरी बनी अब मान।।


हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर
विधा-कविता
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बुजुर्ग सभी को, बनना है,
बुजुर्ग मिलते हर घर-घर,
बुजुर्गों से, आज सीख लो,
हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर।

लंबा अनुभव, उनके पास,
करते आये पापों का नाश,
वो ही आशा वो ही सांस,
बुजुर्ग धरोहर रखना पास ।

सेवा करो बुजुर्गों की अब,
बोलों मुख से सदा हर हर,
जब घर में होता है बुजुर्ग,
नहीं होता है जन तब डर।

जिन बुजुर्गों ने पालापोशा,
चलना व हँसना सिखाया,
बुजुर्ग अमानत हैं दाता के,
जिन्होंने सीने से है लगाया।

हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर,
जिस दिन नारा लग जायेगा,
अमन चैन धरा पर मिलेगा,
रामराज्य फिर चल आयेगा।

सम्मान करे बुजुर्ग रहे खुश,
कभी नहीं देना उनको दुख,






वरना वो  दिन दूर नहीं हो,
प्रभु भी तुमसे होगा विमुख।।

Sunday, November 29, 2020

 माटी का घर/कविता
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माटी के घर से, होता जन को प्यार,
इच्छा हो घर लौटूं,चाहे मील हजार,
पक्के दिल के लोग, मिलते कच्चे घर,
अपने वचन के सच्चे,नहीं मिले डर।

माटी के घर तो, करे एसी का काम,
सर्दी में गर्म रहता, गर्मी में दे आराम,
धन दौलत कम हो, भजते रहना राम,
कच्चा घर मंदिर, लगता है एक धाम।

माटी के घर तो, जन को देते हैं चैन,
आराम मिले इतना, नींद खुले न रैन,
बुजुर्गों ने बीताया,जीवन अपना सोच,
भंडार भरे अन्न के,सदा रही थी मौज।

माटी के घर में, पूजा अर्चना मिलती,
रहते वहां देव, देख कलियां खिलती,
जहां नहीं चिंता किसी,ऐश व आराम,
बस खुशी से बीतेगी,ले प्रभु का नाम।

आओ बनाए,माटी का एक सुंदर घर,
जहां सुबह और शाम, बने रहे निडर,
हर हर करते कटे जिंदगी,रहेंगे अमर,
सबसे प्यारा,सबसे सुुंदर,मेरा माटी घर।।

पहला प्यार
कविता
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इंसान एक है  रूप हजार,
कभी रोये कभी करे प्यार,
प्रेमिका संग मिलता तैयार,
परंतु याद रहे पहला प्यार।

पत्नी पत्नी गये थे बाग में,
मन  ललचाया देख फूल,
पत्नी को बाजू से उठाया,
फूल तोडऩे की की भूल।

देखा पति पत्नी का प्यार,
रह गये जन हक्का बक्का,
पत्नी भी  बड़ी खुश हुई,
पति ने मारा फिर छक्का।

प्यार दिलों में पलता है,
प्यार बड़ा ही खलता है,
कैसे करे मन पर काबू,
पहला प्यार मचलता है।।

जीवनभर नहीं भूलता,
पहला प्यार हो निराला,
जीवन में खूब प्यार हो,
देते रहना बस हवाला।।

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स्वरचित, नितांत मौलिक

विधा-कविता
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पतिदेव गये विदेश में ,
आएंगे अब वर्षों बाद,
नीर भरे गौरी उदास,
आती पिया की याद।

कैसे बीतेंगे, दिन मेरे,
कैसे बीतेंगी सर्द रात,
सूना घर है आज मेरा,
ये दिल में यादें साथ।

पानी में लहरें उठती,
कर रही मन झकोर,
बैरी मोर पीहूं पुकार,
मन को करती विभोर,

आयेंगे जब पतिदेव,
आलिंगन करूं जोर,
वो है मेरा पतंग ऐसा,
कसकर पकडू़ं डोर।।
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जरा सुनो
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  आज का विषय-
आडंबरों के विरुद्ध बोलने का अधिकार सब को
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आडंबर समाज के लिए घातक साबित हो सकते हैं। सभी उन्हें हटाने का प्रयास करेंगे तो ही संभव है आडंबर मिट पाये।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा








गंगा/सुरसरि/भागीरथी/देवनदी/दोहे
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नदी पावनी देव सम, गंगा नाम जहान।
मानव मोक्ष प्रदायिनी, जन जन में पहचान।।

देवनदी को मानते, मानव का वरदान।
पूरे जग में आज है, गंगा की पहचान।।

सुरसरि को मानते हैं, मोक्ष जगत आज।
हर दिल में करती रहे, युगों युगों तक राज।।

गंगा की लहरें कहे, लो आओ अब पास।
पाप सभी पल दूर हो, फल मिलता उपवास।।

गंगा यमुना संग में, सरस्वती का वास।
त्रिवेणी जहां मिल रही, मन को आए रास।।





Saturday, November 28, 2020

 
विधा-कविता/वक्त का पहिया
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हर वक्त बदलता है, तकदीर बदलती है,
देश बदलता है,  हर तस्वीर बदलती है,
समय कभी नहीं रुका, ना रोका जाएगा,
तारीख गवाही दे, हर दिन नया आएगा।

इतिहास के पन्नों पर, लिखी है दास्तान,
मूक गवाह बनकर, करती वक्त पहचान,
जो चल गये जग से, वो वक्त तारीख है
जो आयेगा जग में, उसकी फिर शान है।

जीना मरना की, एक  निश्चित तारीख है,
समय सदा चलता है,, उसकी तारीफ है,
कोर्ट कचहरी में, जब मिलती तारीख है,
आएगी एक दिन वो,  उसकी तारीफ है।

तारीख पर सारा जग, सिमट ही जाता है,
तारीख नहीं लगती तो, जन दुख पाता है,
मुकरना तारीख है,  तो मिलना बारिश है,
तारीख निशाना है, बस दिल से लगाता है।

वक्त का पहिया, कभी रुका नहीं जग में,
यह कभी नहीं किसी से, यूं रोका जाएगा,
वक्त का पहिया रौंद, सभी को एक दिन,
वापस लौटकर, नया इतिहास बनाएगा।।
स्वस्तिक
विधा-चौका
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स्वस्तिक चिह्न
यूं लगा माथे पर
सफल काम
शुभ मुहूर्त आये
तब हो नाम
करते रहो काम
मन हो साफ
प्रभु कर दे माफ
बढ़ो आगे ही
करो दाता का जाप
होगा जरूर नाम।।
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मौसम अनुसार हास्य रस
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मरना महंगा (हास्य)
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सर्दी में मत मर जाना कभी,
चाय काफी का खर्च भारी,
रजाई गद्दा मौल बढ़ जाते,
खरीदने की बढ़ती लाचारी।

दस हजार की लकड़ी आए
200 रुपये का आए  कफन
200 रुपये के बांस भी आते
कांप उठता देख देखकर मन।

महंगाई के इस  युग में देखो
मरना भी हो  जाता है कठिन
खर्चे पर खर्चा चलता रहता है
चाय पानी पर खर्चा कई दिन।

कहीं घी मरे पर डालना होता
कभी जाना भी पड़ता गंगा जी
कितने खर्चों का  बखान करूं
आंसू बहाते रहो अपना मुंह सी।

लाखों रुपये खर्च होते काज पर
लुट जाते हैं मरने पर  बहुत घर
बुराई को समाज से मिटा डालो
काज पर बेकार में खर्च ना कर।






विषय-रिश्तों की डोर
विधा-कविता
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रिश्तों की डोर,बड़ी कमजोर,
यह वो पतंग जिसके न डोर,
आंधी आई दूर चली जाएगी,
वो पतंग फिर लौट न आएगी।

रिश्तों की डोर, जब मजबूत,
मिटाये नहीं मिट पाते सबूत,
ये रिश्ते चलते, सदियों तक,
बढ़ा सकते हैं घर के सपूत।

रिश्तों की डोर, पकड़े रखना,
रिश्तों का स्वाद सदा चखना,
रिश्तों में नहीं हो कड़वापन,
वरना टूट जाएगा तन व मन।

रिश्ते निभाना बहुत कठिन है,
सोच समझकर रिश्ते तोडऩा,
टूट गये अगर एक बार कभी,
कठिन बन जाते फिर जोडऩा।

Wednesday, November 25, 2020

 अर्धनारीश्वर
विधा-कविता






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शिव और शिवा का मेल,
अर्धनारीश्वर रूप कहलाए,
जग के प्राणी नष्ट होने से,
नया रूप तब प्राण बचाए।

जब ब्रह्मा की सृष्टि रचना,
जीवन उपरांत हो रही नष्ट,
घोर तप  किया शिव भोले,
अवतार लेने का दिया कष्ट।

ब्रह्मा के तप से प्रसन्न होकर,
शिव भोले ने अवतार लिया,
शिव और शक्ति दोनों मिले,
तब जीव-जंतु उद्धार किया।

स्त्री पुरुष बराबर होते जग,
शिव भोले ने उपदेश दिया,
जब जब कष्ट पड़े देवों पर,
तब ही शिव विषपान किया।

जग में शक्ति के बीना शिव,
लगते हैं वो  खुद ही अधूरे,
शिव नंदी की करते सवारी,
शक्ति शेर पर ही लगती पूरी।

एक दूजे के पूरक लगते हैं,
शिव और शक्ति मिलते जब,
सृजन होता है प्राणीमात्र का
उत्पत्ति और विकास हो तब।

सागर में जल के समान शिव,
शक्ति होती जल लहर समान,
जल बिना लहर अस्तित्व नहीं,
शक्ति के बल शिव हो महान।

शिव कारण शक्ति हो कारक,
शिव संकल्प शक्ति हो सिद्धि,
एक दूजे के बिना है विरक्ति,
शिव भक्त होता शक्ति भक्ति।

शक्ति जागृत शिव हो सुसुप्त,
शिव हृदय शक्ति है मस्तिष्क,
शक्ति सरस्वती शिव है ब्रह्मा,
शिव हो भक्त शक्ति हो इष्ट।

शिव विष्णु हो शक्ति लक्ष्मी,
शिव महादेव, शक्ति पार्वती,
शिव रुद्र शक्ति है महाकाली,
शिव देता गति, शक्ति प्रगति।

शिव और शक्ति जब मिलते,
करते है ब्रह्मांड का विस्तार,
नर-नारी दोनों ही पूजनीय हैं,
दोनों रूपों से कर लो प्यार।

अर्धनारीश्वर बनने के बाद ही,
सृष्टि का हो पाया था निर्माण,
आधा भाग शिवभोले बना था,
दक्ष पुत्री उमा बनी आधे प्राण।

फाल्गुन महाशिवरात्रि के दिन,
ब्रह्मा ने किया था सृष्टि निर्माण,
ब्रह्मा-विष्णु ने शिवलिंग पूजा,
तब से हुआ नव शक्ति प्राण।

अति फलदायिनी अर्धनारीश्वर,
देता है दर्शन भक्तों को कभी,
पूजा करते हैं देव और दानव,
पूजा करते हैं नर नारी सभी।।
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 दोहा
शब्द-अफसोस

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होता है अफसोस जब, अपने चलते चाल।
धोखा देने वाले को, मिलती मौत अकाल।।

Sunday, November 22, 2020

सुनो
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 आज का विषय-
 धार्मिक आस्थाओं से खिलवाड़
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धार्मिक आस्थाओं से खिलवाड़ देश को गर्त में ले जाने का मार्ग है।
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दोहा ****************************
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उलझन में जब मन पड़ा, रुक जाते सब काम।
शांतचित मनन कीजिये, प्रभु का यह पैगाम।।

सर्दी बढ़ती जा रही, पहन गर्म पोशाक।
ठंड लगे जब तन कभी, बहता रहेगा नाक।।

मेवा मिश्री डाल के, लड्डू खाओ आज।
दर्द मिटे तन के सभी, सेहत का है राज।।





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शहनाइयां/कविता
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खूब सताया कोरोना ने,
अब बज उठी शहनाई,
आना मेरी शादी में तुम,
चहुं ओर आवाज आई।

डीजे पर थिरक रहे पैर,
भूले मास्क लोग लुगाई,
गाते- मेरे यार की शादी,
करे जमकर सभी हंसाई।

थोड़े वस्त्र पहन लिये हैं,
ठंड में चले ठुमक ठुमक,
देव उठनी एकादशी आई,
घरों में होती चमक धमक।

इस वर्ष अल्प मुहूर्त होंगे,
जल्दी करो, ब्याह सगाई,
हंसी खुशी में बीतेंगे दिन,
सांवली सूरत दिल बसाई।

भूल चूके अब महामारी,
विवाह शादी लगे प्यारी,
बंध जाओ  बंधन प्यारो,
शुभकामनाएं तुम्हें हमारी।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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कविता
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एक मीरा हुई जगत,
पूरा जग सुने कहानी,
प्रभु प्रभु रटती रहती,
श्रीकृष्ण हुई दीवानी।

खाना पीना भूल गई,
तन मन में रमे गोपाल,
सोते जागते रटती रहे,
प्रिय बड़े थे नंदलाल।

जहर का प्याला पी,
हो गई थी मीरा अमर,
प्रियतम श्रीकृष्ण माना,
चुना था कठिन डगर।

चैन नहीं मिलता था,
सीने लगाती गोपाल,
ताउम्र दीवानी बनकर,
बदली जग की चाल।
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चांद
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एहसास होता है चांद का,
देखता हूं सामने मेरा यार।
सोलह शृंगार में चांदनी सी,
लुटा रही सर्वस्व ही प्यार।।
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा






शारद ऋतु
विधा-कविता

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टप टप ओस पड़ रही,
आसमान लगता सफेद,
चादर सी सरसों ओंढे,
शारद ऋतु खोलती भेद।

किट किट दांत कर रहे,
हाथ पैर में लगती ठंड,
जमकर चाय चुसकी ले,
छुप छुपकर दंड ले पेल।

आग सेकते नर  व नारी,
भीगी अंगिया भीगे साड़ी,
शांत शांत, प्रकृति लगती,
भूत नजर आती हैं झाड़ी।

सरसों पीली पीली फूले,
फसल ले रही अंगड़ाई,
होली की आहट सुनती,
मेंढ़े भूल गये सब लड़ाई।

छुपकर बैठे हैं पक्षी भी,
कहीं नहीं सुने चहचाहट,
कभी नभ पर शीत लहर,
कभी बारिश की आहट।

बर्फ जमी है पहाड़ों पर,
समुद्र पानी बर्फ समान,
मूली, गाजर, शक्करकंदी,
सेब संतरा बनी पहचान।

बच्चे बूढ़े जीना मुहाल,
जा रहे काल  की गाल,
मवेशी दूध हो रहा कम,
आंखें होती जाती हैं नम।

चहुं ओर शोर मचा है,
लाओ ऊनी वस्त्र रजाई,
आग सेक लो हाथ चले,
खाओ गोंद लड्डू मलाई।

सेहत में  मोटे लगते हैं,
तन पर भरे वस्त्र हजार,
सेहत खातिर शारद ऋतु,
कर लो सेहत से ही प्यार।  

Saturday, November 21, 2020

 

दोहा ****************************
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कर लो सूर्योपासना, छठ पूजा है आज।
दानवीर सब जानते, दुनिया करती नाज।।

मन पर काबू जो करे, बने देवता रूप।
कलुषित विचार हो कभी, राक्षस है वो भूप।।

आशा जब इंसान में, करता सुंदर काम।
सोच समझ जब काम ले, होता जग में नाम।।


 दोहा*****************

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कर लो सूर्योपासना, छठ पूजा है आज।
दानवीर सब जानते, दुनिया करती नाज।।


नमन उत्तरांचल उजाला परिवार
विषय- राधे केशव
दिन -शनिवार
विधा-कविता
 दिनांक- 21 नवंबर 2020
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राधे केशव की जोड़ी,
जग में बनी मिसाल है,
देख देखकर जोड़ी को,
बदली सबकी चाल है।

कितनी जोड़ी बनती हैं,
यह जोड़ी बेमिसाल है,
यमुना पर रास रसाया,
देखे जो मालामाल है।

विष्णुरूप में प्रभु आये,
छवि अजब निराली है,
एक देवी का रूप बने,
करता जग रखवाली है।

कान्हा,कृष्ण,रणछोड़,
कितने ही रूप होते हैं,
दर्शन करके  दोनों के,
सुख की नींद सोते हैं।

बसा आंखों में छवि,
कर डालों आंखें बंद,
प्रभु का गुणगान करो,
आवाज करो  बुलंद।।
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काव्य/कविता/पद्य./ छन्द इत्यादि।
विधा-कविता
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जिसे भी देखे नशा चढ़ा,
कविता बहुत सुहाती है,
कौवा, बटेर, तीतर आज,
बड़े मधुर स्वर में गाती हैं।

चार लाइन लिख लेने पर,
समझते बड़े हैं कवि आज,
काव्य एक ऐसा रोग बना,
जैसे तन पर चलती खाज।

काव्य अब वो वस्त्र बना,
हर जन को बड़ा सुहाता,
गर्मी हो या हो सर्दी उन्हें,
दिन रात मन को ही भाता।

कविता का  नशा होता है,
शराब भरी एक बोतल हो,
खड़े,पड़े,सोते जागते लिखे,
कभी हंसते कभी लेते हैं रो।

कवि हुये अजब गजब के,
लिख गये बड़ी सच्ची बात,
ऐसा काव्य लिख डाला है,
पढ़ते रहना चाहे दिन रात।।
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एकता की शक्ति
विधा-कविता
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देवों की जैसे भक्ति,
एकता में हो शक्ति,
जहां नहीं है एकता,
रोता मिलेगा व्यक्ति।

एकता में  वो शक्ति,
चिडिय़ां मारे शेर को,
एक -एक सभी जले,
आग लगे ना ढेर को।

एकता बड़ी है ताकत,
हिला दे सरकार चूल,
अनेक कभी न रहना,
करना नहीं कोई भूल।

एकता घर में नहीं हो,
रावण भांति मर जाते,
एकता पांडवों में देख,
कौरव देखके डर जाते।

Friday, November 20, 2020

 दोहा

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पत्थर पानी में पड़े, उठती एक तरंग।
उठते कभी हिलोर मन, रूप बनेगा जंग।।

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प्रार्थना
विधा-दोहे
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करो प्रार्थना रोज ही, बनते बिगड़े काम।
सुबह सवेरे नाम लो, देवों से हो नाम।।

करता कोई प्रार्थना, होता जग में नाम।
प्रभु के द्वारे लो चले, कहते उसको धाम।।

सदा प्रार्थना भली है, मिले देव का प्यार।
आगे बढ़ते जाइये, कभी नहीं हो हार।।





संंगिनी
विधा-कविता  
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स्वर्ग में बनते रिश्ते नाते,
बुजुर्ग और सज्जन बताते,
भाई बहन,माता पिता हो,
सहस्त्र वर्ष नहीं जुदा हो।

संगिनी सदा रहती याद,
देती रहती  हरदम साथ,
वो होती है  बायां हाथ,
उस बगैर लगता अनाथ।

संगिनी जब से आये घर,
नहीं रहेगा जन कोई डर,
भोजन से भरा रहे उदर,
एक है नारी दूजा है नर।

संगिनी लाती है निखार,
भर देती है तन में प्यार,
बच्चों को दे प्यार दुलार,
मिलता सदा सदव्यवहार।

संगिनी सीता श्रीराम की,
भटकी फिरी वो वन वन,
रावण का अंत करवाया,
पतित सलिल थी पावन।

संगिनी मिली पार्वती तो,
शिवभोले नंदी पर आये,
देवी देवता नृत्य कर रहे,
तीनों लोक तब मुस्कुराए।

संगिनी विष्णु देव लक्ष्मी,
पूजती रहती दुनिया सारी,
देख देख धन दौलत को,
खनक समक्ष दुनिया हारी।

सरस्वती मां ब्रह्मा संगिनी,
ज्ञान दीप जगत में जलाए,
जिह्वा पर है जिसके बैठी,
वो नर जग में नाम कमाए।

श्रीकृष्ण संगिनी रुकमणी,
राधा के संग  रास रसाये,
कभी यमुना तट पर मिले,
राक्षसों को वो मार गिराय।

शांतनु संगिनी थी ज्ञानवती,
श्रवण कुमार पुत्र कहलाए,
परशुराम उनके पैर छू रहे,
ऐसा जगत में नाम कमाये।

दशरथ की तीन संगिनियां,
कैकई ने किया ऐसा काम,
राम चले थे बनवासी बन,
हो गई थी आखिरी शाम।

लक्ष्मण की उर्मिला संगिनी,
पांडवों की संगिनी, द्रोपदी,
भरत संगिनी कहाती मांडवी,
जग के काम की पत्नी रति।

संगिनी जग में हो तारिणी,
संगिनी करती है जन काम,
संगिनी सदा साथ निभाती,
होता जग में उनसे ही नाम।।
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सूर्योपासना
विधा-कविता






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सूर्याेपसना पर्व होता है,
छठ पूजा  कहलाता  है,
दीवाली बीते  छह दिन,
अनोखा ये पर्व आता है।

पहले दिन  नहाय खाय,
खरना होता है दूजे दिन,
तीसरे दिन  सांध्य अघ्र्य,
अघ्र्य देते हैं अंतिम दिन।

युगों युगों से चला आया,
पर्व करता मन को शुद्ध,
सुर्योपासना करते रहना,
देव कभी नहीं हो कु्रध।

पूड़ी,सब्जी का कर त्याग,
चूल्हे में जलाके के आम,
प्रथम खाना  खाएगा व्रती,
करता दिनभर  शुभ काम।

सूर्य की बहन होती षष्ठी
जिसका पर्व  छठ  पूजा
बिहार का लोक पर्व हो
इससे बड़ा ना पर्व दूजा।

माता अदिति ने की थी,
पुत्र प्राप्ति को यह पूजा,
सूर्य,कर्ण, द्रोपदी ने की,
छठ मैया की बड़ी पूजा।

परिवार  प्रसन्न रहे सदा,
इसलिए पूजा करते जन,
कई बीमारियों से बचता,
स्वस्थ रहता  है तन मन।

छठ मैया कल्याण करेगी,
करते हैं यह मंगलकामना,
सदा-सदा प्रसन्न रहे जन,
दुखों का  नहीं हो सामना।

Thursday, November 19, 2020

मुझे लौटा दो
विधा-कविता  
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मुझे लौटा दो, मेरा बचपन,
हर्षित होता था, तन व मन,
दर्द देता जैसे माह अगहन,
पराये लगते आज,हर जन।

रोता है वो आज अपनापन,
सूख चला है आज मेरा तन,
ना जाने क्यों गया, मन हार,
जाने कहां खो गया वो प्यार।

मुझे लौटा दे,मेरी माता प्यार,
देती थी मुझको,दुलार अपार,
अभी चूकता करनी है उधार,
दर्शन को खड़ा, मां को तैयार।

मुझे लौटा दे, पिता की प्रीत,
पास आता था सुनाते थे गीत,
अजब गजब, पिता पुत्र रीत,
हार ना होती थी हरदम जीत।

आती थी, चाय लेकर, भार्या,
कहती थी सुनों मेरे ही आर्या,
कभी तेल लगाकर सुलाती थी,
कभी हंसती तो कभी गाती थी।

मुझे लौटा दे, भाई का सहारा,
देवों सा लगता था सदा प्यारा,
छोड़कर चले गये न जाने क्यों,
नहीं बचा जग में कोई हमारा।

मुझे लौटा दे,दादा दादी कहानी,
बिस्तर पर मिलता दूध व पानी,
कभी सुनाते, परियों की कहानी,
कभी आई थी, अल्हड़ जवानी।

मुझे लौटा दे, वो रिश्ते व नाते,
खो चुके सभी तो बड़ा पछताते,
याद करके, ख्वाबों में खो जाते,
अपना मिले उसे गले से लगाते।

मुझे लौटा दे,यार,दोस्त व सखा,
पास रहकर उनका स्वाद चखा,
वो भी गये छोड़, अब बेसहारा,
किसको पुकारे कोई ना हमारा।

मुझे लौटा दे वो जवानी का नशा,
अब तो मुझे इस, बुढ़ापे ने डसा,
हर इंसान देख देख मुझको हँसा,
समय ने कर दी मेरी कैसी दशा।

सब कुछ लुट चुका,राख बनेगी,
कुछ भी नहीं लौटेगा,यादें बचेंगी,
ये जन्म अब पूरा होने को आया,
अब तो दुख दर्द, मन को सताया।

मुझे लौटा दो, वो गुजरा जमाना,
सभ्यता, संस्कृति दुनिया ने माना,
वो वीर,धीर,महान,देशभक्त प्यारे,
आओ चलकर बस पास हमारे।

मुझे लौटा दो, बचपन की खुशी,
दौड़ते गलियों में नहीं कभी दुखी,
नहीं आएगा, लौटकर वो नजारा,
अन्तस मन में लगता मुझे प्यारा।






दोहा *********************
घटना
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घटना चलती रोज ही, उल्टे सीधे काम।
दुर्घटना हो जब कभी, होगा काम तमाम।।
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 धूप
विधा- दोहा छंद





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धूप छांव दो रंग हैं, अपना अपना रूप।
झेल सभी अब जा रहे, दरिद्र हो या भूप।।

कभी धूप में लग रहा, छांव सुहानी भान।
दोनों को ही सम समझ, होगा जग का ज्ञान।।

धूप मिटे छांव है, छांव मिटे तो धूप।
कभी उजाला हो रहा, ढलता फिरता रूप।।

जिस घर में हो धूप तो, होगा वहां प्रकाश।
रोगाणु बचेगा नहीं, रोगों का हो नाश।।

Wednesday, November 18, 2020

 मुसाफिरों से मुहब्बत
विधा-कविता  
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मुसाफिर बनकर जगत से,
हर जन को चले जाना है,
चार दिन का साथ मिला,
आखिर प्रभु को पाना है।

मुसाफिरों से करो मुहब्बत,
चार दिनों का जग मेला है,
जाना होता इस जग से जब,
पास नहीं धन और धेला है।

मुसाफिरों से प्रीत भली हो,
एक दिन उस राह चलना है,
बेशक मन में इतरा ले प्यारे,
यह संसार छोड़ निकलना है।

प्रीत,प्यार,प्रेम,मुहब्बत सभी,
इस जग में बची रह जाएंगी,
तेरे पाप,नीच कर्म,अत्याचार,
पीछेसे ही मजाक उड़ाएंगी।

सोच समझ कर पग धर ले,
मुसाफिर से मुहब्बत कर ले,
ओछे कर्म अभी त्याग दे तू,
अपने तन को शुद्ध कर ले।
 
मुसाफिर है हर शख्स ही,
जाना होता भव सागर पार,
मुसाफिरों से मुहब्बत करे,
मिलता उसको जहां प्यार।

जगत मुसाफिरखाना होता,
कोई यहां हँसे कोई रोता,
कोई दामन में खुशियां ले,
कोई अपने नयन भिगोता।

कोई जन दुख दर्द सहता,
कोई मुसाफिर साथ रोता,
कोई उनकी सेवा करता,
कोई मुहब्बत झेल सोता।

मुसाफिरों से हो मुहब्बत,
नाम कमाएगा वही जरूर,
चलो चले लंबे सफर पर,
छोड़ दे इस जग का गरुर।

मुहब्बत होती जिस इंसान,
वो होता है जगत में महान,
मुसाफिरों से मुहब्बत करो,
बन जाएगी जगत पहचान।

मुसाफिर तुम मुसाफिर हम,
फिर जन को काहे का गम,
बिछुड़ जाता है मुसाफिर तो,
होता है राहगीर को ही गम।

मेला, मुसाफिर,भीड़ सारी,
एक दिन यहीं रह जाएंगी,
मुसाफिर तो गुजर जाएंगे,
याद उनकी सदा सताएगी।

मुहब्बत मुसाफिरों से करे,
ऐसे लोग कम ही मिलते हैं,
उनकी मुहब्बत के बल पर,
फूल, कली सब खिलते हैं।
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*छठ पूजा
विधा-कविता
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चार दिनों का पर्व होता,
छठ पूजा  कहलाता  है,
दीवाली बीते  छह दिन,
छठ पूजा  पर्व  आता है।

पहले दिन  नहाय खाय,
खरना होता है दूजे दिन,
तीसरे दिन  सांध्य अघ्र्य,
अघ्र्य देते हैं अंतिम दिन।

घोर तप करती महिलाए,
दान पुण्य में  होती आगे,
शुद्ध सात्विक विचार हो,
दिन रात को व्रती हैं जागे।

पूड़ी,सब्जी का कर त्याग,
चूल्हे में जलाके के आम,
प्रथम खाना  खाएगा व्रती,
करता दिनभर  शुभ काम।

सूर्य की बहन होती षष्ठी
जिसका पर्व  छठ  पूजा
बिहार का लोक पर्व हो
इससे बड़ा ना पर्व दूजा।

माता अदिति ने की थी,
पुत्र प्राप्ति को यह पूजा,
सूर्य,कर्ण, द्रोपदी ने की,
छठ मैया की बड़ी पूजा।

परिवार  प्रसन्न रहे सदा,
इसलिए पूजा करते जन,
कई बीमारियों से बचता,
स्वस्थ रहता  है तन मन।

छठ मैया कल्याण करेगी,
करते हैं यह मंगलकामना,
सदा-सदा प्रसन्न रहे जन,
दुखों का  नहीं हो सामना।







दोहा*********************
दोहा नंबर -03
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जैसे कुत्ता काटता, वैसे काटे लोग।
भला करो इंसान का,कष्ट जहां के भोग।।
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दोहा ****************************
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सारी दुनिया में मचा, अजब गजब का शोर।
हर जुबान से सुन रहे, बढ़े जगत में चोर।।

पाप बढ़े संसार में, पापी पाते नाम।
मार रहे इंसान को, नरक मिलेगा धाम।।

जैसे कुत्ता काटता, वैसे काटे लोग।
भला करो इंसान का, कष्ट जहां के भोग।।







Tuesday, November 17, 2020

स्मृति
विधा-कविता
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अनहद स्मृतियों में उलझा,
युवा वर्ग का चाहत संसार,
भूल गये अपने पराये को,
खो गया अपनों का प्यार।

स्मृति सदा मिलती है भरी,
जैसे कंप्यूटर  हार्ड डिस्क,
अनंत विचार चिर स्थायी,
कहीं खुशियां कही रिस्क,

मरते वक्त स्मृति होती साफ,
जीवनभर न करता वो माफ,
कलुषित,आडंबर में ढ़ककर,
एक दिन हो शाम मिले राख।

बचपन में पनपती कई यादें,
युवा वर्ग में भरी मिले हजार,
बुढ़ापे में विघटित होती जाए,
भूल जाता सुधबुध और प्यार।

युगों युगों से चली आ रही हैं,
कितने प्रकार की रस्म रिवाज,
स्मृतियों में शेष अवशेष रहेंगी,
बस उन लम्हों को करते याद।

कभी वक्त की, काली छाया,
स्मृति,विस्मृति भेद नहीं पाया,
स्मृतियों की यादों ने, हँसाया
तो कभी विस्मृतियों ने रुलाया।।
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किस्मत वालों को मिलता है
विधा-कविता  
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किस्मत वालों को मिलता है,
जग में धन,दौलत,बुद्धि प्यार,
कितने लोग किस्मत को रोते,
मचाते रहते हैं वो हा-हाकार।

बपौती में मिल जाता है धन,
काला कलूटा जिनका है मन,
किस्मत उनकी होती अच्छी,
पूजा करते देेखे कितने जन।

शक्ल में बारह बज चुके हैं,
पर दौलत होती पास अपार,
सेवा करते नौकर चाकर सब,
न जाए इनका जीवन बेकार।

किस्मत वालों को मिलता है,
इस सारे जगत में एक प्यार,
प्यार कोई जगत पा जाता है,
जीवन सफल हो नहीं बेकार।

ज्ञान मिले विज्ञान मिले कभी,
बेशक तन से करे अत्याचार,
बुद्धि इतनी किस्मत से मिली,
सारी दुनिया करती उसे प्यार।

किस्मत वालों को मिलता है,
अच्छा जहान में सखा दोस्त,
जहां भी जाए वो नाम कमाए,
उसके लिए दे तन का गोश्त।

नजर डालकर जग में देख लो,
कितने हुये है अत्याचारी लोग,
धन, दौलत,वैभव के वे चलते,
मिटा चुके तन के कितने रोग।

किस्मत वालों को मिलता है,
माता पिता गुरु का आशीर्वाद,
कुछ को नसीब नहीं होता है,
आता है फिर रह रहकर याद।

किस्मत वालों को मिलता है,
अपनी बहन का जग में प्यार,
भैया दूज जब आती है कभी,
तरसता है भाई बहन दुलार।

किस्मत वालों को मिलता है,
प्रसन्नता का भरा एक  पिटारा,
कितने जीवन भर दुख झेलते,
खो जाता है आंखों का तारा।

किस्मत वालों को मिलता है,
प्रभु भक्ति, शक्ति का नजारा,
भक्ति में मीरा सी खोई रहती,
प्रभु दाता बस मिलता सहारा।

किस्मत वालों को मिलता है,
अच्छा पास पड़ोस,भाईचारा,
घर में भरा परिवार सहित हो,
धन दौलत,छोटा राज दुलारा।

किस्मत वालों को मिलता है,
सुघड़ नारी का जमकर प्यार,
घर को स्वर्ग बना देती है जो,
पल में देती हो खुशियां हजार।

किस्मत वालों को मिलता है,
जग में लक्ष्मण,भरत सम भाई,
जो भाई की खातिर मर मिटे,
खोदे ना आपस में कोई खाई।

किस्मत वालों को मिलता है,
स्वर्ग का सुख,मां की ममता,
कठिन हो जाता है जीवन भी,
घर बने नरक व खोये क्षमता।

किस्मत वालों को मिलता है,
बेहतर किस्मत का ये उपहार,
धरती के सुख हरदम भोगता,
मिले बंधु बांधवों का ही प्यार।।










दोहा *****
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मीठा बनो जुबान का, सभी से करो प्रीत।
नुसखा जग में सीख लो, दुनिया गाये गीत।।


अपने धोखा दे रहे, घटा बहुत विश्वास।
मार रहे इंसान को, किसे बिठाये पास।।


मात पिता सम्मान दो, सदा करो उपकार।
मीठा सबसे बोलना, होगी कभी न हार।।

Sunday, November 15, 2020

 


दोहा ****************************
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विचलित होता मन कभी, जाना प्रभु के द्वार।
भेदभाव चलता नहीं, मिले बराबर प्यार।।

दुश्मन छोटा हो नहीं, मानो कभी न हार।
लाख दिखावा वो करे, करो नहीं तुम प्यार।।

बुरा कभी मत सोचना, खुद का होगा नाश।
धोखा जन से जो करे, होगा सदा विनाश।।

विचलित
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विचलित होता मन कभी, जाना प्रभु के द्वार।
भेदभाव चलता नहीं, मिले बराबर प्यार।।
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विधा-कविता
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माटी के दीये लेकर,
आशा मन में हजार,
बिक जाएंगे सारे ही,
संस्कृति से हो प्यार।

एक एक दीये में भरा,
मेहनत का  वो संसार,
खून पसीना एक किया,
दीयों से आशा अपार।

सुबह से शाम हो आई,
दीया बिका नहीं एक,
हाथ जोड़  विनति की,
गुजरे जन देख अनेक।

शाम हुई गरीब रो रहा,
श्रीराम तेरी प्रजा कैसी,
लौटे थे जब बनवास से,
रही न अब जनता वैसी।

हाय गरीब जन मेहनत,
मिल गई सारी माटी में,
अगर लोग नहीं सुधरेंगे,
मिल जाएंगे सब माटी में।

तरस खाओ गरीबों पर,
मेहनत जाये नहीं बेकार,
खरीदों इनके दीये सदा,
मेहनत नहीं जाये बेकार।।
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गोवर्धन पूजा
विधा-कविता
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महिमा कृष्ण की गाते हैं,
जगत का वो होते आधार,
जब जब विपत्ति आ पड़े,
तब तब वो लेते अवतार।

गोवर्धन अंगुली पर उठा
युग प्रवर्तक ने की सुरक्षा
इंद्र देव ने मानी हार तब
गोकुल को मिली शिक्षा।

गायों की सेवा करने का
श्रीकृष्ण ने दिया था ज्ञान
गौमाता की पूजा कर लो
बढ़ जाए धन और शान।

गायों को पालते थे कृष्ण,
गोपालक जगत कहलाए,
कितने गोकुल के लोगों के
दुख दर्द झट में मिटाये।।


अंदाज अपना अपना
विधा-कविता
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बाग/कविता
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गुलशन में बहार आती है,
मन भंवरे का तड़पाती है,
प्रेमी युगल  बैठे बाग में,
प्यार की आग सताती है।

उजड़  जाता बाग बगीचा,
नहीं सुनाई देता कोई शोर,
खिजा छा जाती है गुलशन,
दर्द में उठती आती है भोर।

बाग सदा सुहाते मन को,
भर देते सदा मन में प्यार,
जीत सदा ही होती आई,
नहीं मिलेगी कभी हार।।