सुनो
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दर्द पराये भी देते हैं जो देर सवेर सहन हो जाते हैं किंतु अपनों द्वारा दिये गये दर्द एक काले नाग की भांति डसते हैं।
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--होशियार सिंह यादव, कनीना
मुक्तक
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1.(मात्राभार-19)
बैठे मायूस यादों में खोये।
लगते हो जैसे गमों में रोये।
बिछुड़े गये हैं जीवन में लाखो।
उन्हीं की यादों में नैन भिगोये।।
2.(मात्राभार-17)
कभी यादें बहुत सताती हैं।
यादें दर्द कोई दे जाती।।
यादों के सहारे गम कटता।
यादें निज बीती बताती हैं।।
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*होशियार सिंह यादव
दोहा कुंडलियां प्रतियोगिता
विषय-चित्राधारित
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सोने की चिडिय़ा देश, आज हुआ बदहाल।
दर्द दिलों में लिये हैं, कोरोना का काल।
कोरोना का काल, बड़ा मुश्किल है जीना
पी रहे थे बीड़ी शराब,आज बंद हुआ पीना।
सब्जी बिके न आज, भाव हैं औने पौने।
अमीर खाये माल, गरीब जा रहे सोने।।
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*होशियार सिंह यादव
शब्द-हठ
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बाल, त्रिया, भूपाल हठ, सृष्टि हुये विख्यात।
जब तीनों जिद पर अडिग, नहीं बनेगी बात।।
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*होशियार सिंह यादव
दुल्हन/वधु
विधा-कविता
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बहुत अरमान होते हैं
जब दुल्हन बनती है,
खुशी और गमों कई
फुलझड़ी चलती हैं।
मां बाप देते विदाई
मन ही मन रोती है,
जुदाई की घड़ी आई
छुपके नैन भिगोती है।
घर में बेटी होती है
दुल्हन वो बन जाती,
कभी रो रो बीते उम्र
कभी खुशी वो पाती।
जुदाई अपनों की वो
जीवनभर वो सहती,
कभी मायके में खुश
पीहर में दुख सहती।
दुल्हन की जुदाई तो
एक दुल्हन है जानती
अपने-अपने क्या हैं
दुल्हन ही पहचानती।।
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समय
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समय समय की बात है, राजा बने फकीर।
सत्यवादी नृप बनकर , झेली जग की पीर।।
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