Thursday, December 31, 2020

  दोहा
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बीत गया वो काल था, आएगा विश्वास।
बधाई तुम्हें भोर नव, देगा खुशियां खास।।

खूब दुआएं दे रहा, रहो सदा खुशहाल।
झोली खुशियों से भरे,आया नूतन साल।।

अंतिम दिन है काम का, बीता पूरा साल।
नूतन दस्तक दे रहा , खुश रहना हर हाल।।



यादों से उम्मीदों तक
विधा-कविता
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2020 को दे दो विदाई,
इसने सारी हँसी मिटाई,
हस्तियां कई इसे खाई,
चले जाने में है भलाई।

आया था जब से साल,
हो गया है जन बदहाल,
बनके आया जन काल,
बोली बंद की वाचाल।

2020 ने  छीना रोजगार,
मचा दिया था हाहाकार,
किसान,मजदूर रोये खूब,
बहुत बुरा रहा ये बेकार।

2021 अब खुशियां लाये,
खूब हँसे मन को हर्षाये,
माला  लेकर खड़े तैयार,
आ जा जल्दी देना प्यार।

करना सबकी भली भली,
देख तुझे हँसे फूल कली,
गीत गाये जन गली गली,
नववर्ष की लो हवा चली।।
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विषय-जीवन सफर
विधा-कविता
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जीवन सफर है,
यह सफर ही रहेगा
आने वाला 2021,
बस यही तो कहेगा।

एक साल बीता
कहलाया वर्ष 2020
खुशियां लेकर,
नव वर्ष आएगा 2021

एक साल में
बहुत कुछ जन खोया,
हँसा बहुत कम
अधिक समय वो रोया।

रोकर या हँसकर
शेष जीवन अब बीताना,
आने वाले 2021
अब तू और नहीं सताना।

अगर हम बचे तो,
अगले वर्ष फिर मिलेंगे,
बस फिलहाल तो
2020 अलविदा कहेंगे।।
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वर्ष 2020 के अनुभव
विधा-कविता
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2020 ने बहुत सीखाया,
खूब रुलाया खूब हँसाया,
घर में बैठे रहे हम भूखे,
रोजगार तक छीन भगाया।

वर्षभर रहे स्कूल भी बंद,
शराब बेचकर अमीर चंद,
मन में चलती रही है द्वंद्व,
एकाध बार हँसे मंद मंद।

घरवाले हुये बहुत दुखी,
किसान मजदूर ना सुखी,
कोरोना का रोग यूं फैला,
दुनिया देखी वर्षभर दुखी।

अच्छा नहीं था वर्ष 2020,
अभागा वर्षों तक कहलाए,
साल 2020 जल्दी से जाए,
लौटकर नहीं आये ना आये।।


Tuesday, December 29, 2020

बचपन
विधा-मुक्तक
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अजब गजब के दिन है, रातें लगे सुहानी।
बचपन की याद हैं, कभी मांगते पानी।।
बच्चों की इस जग में ,हो दुनिया निराली,
बचपन की शरारतें, की बहुत मनमानी।।



बांसुरी
विधा-दोहा छंद
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सुनों बांसुरी धुन कभी, मन में उठे उमंग।
साथ ढोल की थाप पर, उभरे सुंदर रंग।।

किसन बांसुरी जब बजे, दिल का नाचे मोर।
प्यार रंग मन मोह ले, नैन मिले चितचोर।।

नटखट राधा सुन रही, किसन सलोना रूप।
बजे बांसुरी धुन कभी, दिल तरसे जग भूप।।


वंदना
विधा-कविता
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वंदना उस देव की,
जिसने जन बनाया,
उजले मुख दिये हैं,
पल में उसे हँसाया।

वंदना मात पिता की,
जिन्होंने हमको पाला,
जगत का  ज्ञान दिया,
मुसीबतों से निकाला।

वंदना गुरुदेव की हो,
जो सृष्टि का दे ज्ञान,
पूरे जगत में होती है,
जिससे मेरी पहचान।

वंदना धरती मां को,
जिसने दिया सहारा,
तरुवर हमको प्यारे,
प्राण कहाते हमारा।।






कविता
कविता/नव वर्ष
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जल्दी करके आना है,
नव वर्ष खुशी लाना है,
हमने तो इतना माना है,
2020 को यूं भगाना है।

बहुत दर्द दे रहा 2020
कुछ तो सोचो जगदीश,
खुशियां पास बुलाना है,
नया साल गले लगाना है।

नया साल लेकर आएगा,
हर जन के मन में खुशी,
मजदूर, किसान घर बैठे,
कितने मन से होके दुखी।

कितने लोग लील दिये,
उनको अब भुलाना है,
नये वर्ष को सजाना है,
प्यार से उसे बुलाना है।

कह दो पुराने साल से
अब वो समेट ले काम,
भाग जा कह देना इसे,
खूब किया तग बदनाम।

कहना नये वर्ष से अब,
हंसकर आये जग हँसाये,
कोरोना से जो मर रहे हैं,
उनको आकर तुरंत बचाये।।

Monday, December 28, 2020

 धर्म और आस्था
विधा-कविता
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धर्म और आस्था भारी,
भारत में अनोखी न्यारी,
धर्म आस्था की आड़ में,
बन बैठे कितने व्यापारी।

मंदिर मस्जिद  खूब बने,
पर भूख की हो लाचारी,
मंदिर आगे खड़े हैं भूखे,
बस उन्हें रोटी है प्यारी।

देवों के नाम पर लुटती,
दौलत से अबला-नारी,
अस्मिता लूटे ढोंगी जन,
आस्था पर पड़ते भारी।

आस्था बुरी  नहीं होती,
अंधी दौड़ा आस्था हार,
आस्था मन में रख लेना,
करो हर मानव से प्यार।

मंदिर मस्जिद जब जाते,
बूढ़े, गरीब को दो प्यार,
कोई भूखा नंगा नही रहे,
आस्था है जीवन आधार।।


नव वर्ष तेरा स्वागत
कविता
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2020 तेरा, नाश हो,
दिया जग दर्द हजार,
नव वर्ष तेरा स्वागत,
देना प्रसन्नता हजार।

जल्दी कर, चला जा,
महामारी तू ले आया,
गरीब,बच्चा बूढ़ा तूने,
दुख दर्द देकर रुलाया।

छीन लिया रोजगार भी,
रोका है उन्नति विकास,
घरों में छुपकर बैठे रहे,
बना डाले घर के दास।

सदियों तक तुझे जानेंगे,
राक्षसी रूप में महामारी,
कितने घर उजाड़  दिये,
रो रही एक वृद्ध बेचारी।

आजा रे! नव वर्ष 2021,
देना खुशियां, देना प्यार,
पलक फावड़े बिछाये हैं,
बेसब्री से तेरा है इंतजार।।
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तन्हाई
विधा-छंदमुक्त कविता  
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रातें गिनते हैं रोज ही,
आये दिन बड़े खराब,
तन्हाई की है जिंदगी,
किसको बताये जनाब।

तन्हाई में रोग मिलते,
देख लो कोई आजमा,
रो रोकर बीते जिंदगी,
सुन लो हमदम जनाब।

तन्हाई में मर मर जीये,
नहीं मिलता कभी चैन,
रात दिन बराबर बनते,
मन मचले रहता उदास।

तन्हाई में बड़ा आनंद,
जिन देखा उससे पूछो,
महबूबा से कह देना है,
मरकर भी ना तुम रूठो।।



दोहा
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नया साल यूं कह रहा, हे मानव तू जाग।
भूल सदा जो दिल भरी, तेरे मन में आग।।

सोरठा

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हे मानव तू जाग,नया साल यूं कह रहा।
 तेरे मन में आग,भूल सदा जो दिल भरी।।

तुम तो वाकिफ हो
विधा-काव्य/मुक्तक
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तुम तो वाकिफ हो सदा,बुरा बहुत अभिमान।
अनुभव जग में लो कभी, बढ़ जाता है ज्ञान।।
बुरे कर्म जग भूलकर, कर ले जनहित काम,
दुखा नहीं दिल देव का, वरन मिले शमशान।।
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तुम तो वाकिफ हो
विधा-काव्य/मुक्तक
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तुम तो वाकिफ हो मुझे, करता सुंदर काम।
साधु संत यह कह रहे, जन जीवन संग्राम।।
डरकर भागे  जो कोई, हरदम  होता फेल,
तूफानों  से  जो लड़े, होगा  जग  में नाम।।

Sunday, December 27, 2020

 
जरा सुनो
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आज का विषय-
 देश और धर्म के साथ खिलवाड़ आखिर क्यों?
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देश और धर्म से खिलवाड़ घातक रहा है और इनसे खिलवाड़ समाज को गर्त में ले जाता है।
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गरीब
विधा-क्षणिकाएं
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हिम्मत से गरीब नहीं,
कहलाते वो ही अमीर,
जो होते हैं जग गरीब,
दोष देते हैं वो नसीब।
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अमीर गरीब है तन से,
करवा कर देख तन काम,
पैसे हाथ का मैल हो,
जिसके बल पर हो नाम।।
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नव वर्ष
विधा-छंद
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दोहा छंद
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नया साल यूं कह रहा, करना सुंदर काम।
पाप कर्म पर गर चला, हो जाए बदनाम।।

प्रसन्न रहना चाहिए, मानव को हर हाल।
दस्तक देने को चला, मनभावन नव साल।।

नये साल की लालिमा, छाई चहुँ दिश ओर।
वन उपवन में नाचते, पक्षी भारत मोर।।

छाई है आंगन खुशी, नये साल की भोर।
आगे बढ़कर सीखना, नाच नृत्य सम मोर।।

सुनी मुबारक राम ने, बोला आओ श्याम।
खुशियों से झोली भरे, मन मंदिर सम धाम।।

नये साल में खुश रहो, हरना दुख जन रोज।
नहीें शांति जग में कहीं, अपने भीतर खोज।।









धरती
विधा-कविता/वसुंधरा
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पले बड़े हुये गोद में,
जिसको किया खराब,
मां समान  है वसुंधरा,
पलते रंक और नवाब।

हरी भरी लहलहायेगी,
मन में उठती है उमंग,
कभी बसंत की बासंती,
कभी लहरें उठती गंग।

अन्न, जल,जीवन देगी,
समा लेती अपने रूप,
समान भाव वो रखती,
सुंदर मुखड़ा या कुरूप।

सोना-चांदी उपजाती,
मन को करती विभोर,
धरती अंबर प्रसन्न हुये,
नाच रहा है मन मोर।।

Saturday, December 26, 2020

 


दोहा****************

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आसमान भी रो रहा, धरती कष्ट हजार।
बारिश जब हो झूमकर, बढ़े जहां में प्यार।।
****-
-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़ हरियाणा
 दोहा****************

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गैरत जिनकी मर चुकी, जीना है बेकार।
गिरे हुये हैं मानते, नहीं मिले जन प्यार।।

पिता देव आकाश सम, बच्चों का आधार।
कष्ट रात दिन झेलता, देता अनमिट प्यार।।

पिता कमाता रोटियां, मिले नहीं आराम।
सोच रहा निश जागकर, पूरे करता काम।।

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दोहा शब्द-गैरत
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गैरत जिनकी मर चुकी, जीना है बेकार।
गिरे हुये हैं मानते, नहीं मिले जन प्यार।।



कुंडलियां  *******************

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खाना मिलता देश में, करके मेहनत रोज।
होटल में दावत उड़े, करते नेता मौज।।
करते नेता मौज, कृषक आंदोलन करते।
उनकी सुनता कौन, बैठ सड़कों पर मरते।।
शुरू किया सरकार,बिलों का लाभ बताना ।
हलधर  का आधार, सिर्फ लंगर का खाना ।।  
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नाराज हो मुझसे
विधा-कविता
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खपा खपा लगते हो,
बस शिकायत तुझसे,
मुंह चिढ़ा बात करते
क्यों नाराज हो मुझसे?

बस यूं ही बात करते,
फुरसत क्षणों में तुझसे,
वादों पर खरा उतरा हूं,
क्यों नाराज हो मुझसे?

कभी झगड़ा ना हुआ,
शिकायत नहीं तुझसे,
बातें नहीं कर रहे हो,
क्यों नाराज हो मुझसे?

कभी दिल दुखाया ना,
हँसकर बातें की तुझसे,
मुंह फेर लेते मिलने पर,
क्यों नाराज हो मुझसे?

साथ साथ चलते आये,
दूर ना हुये कभी तुझसे,
बातें करना गवारा नहीं,
क्यों नाराज हो मुझसे?

जब भी कष्ट मिला है,
पुकारा बस मैंने तुझको,
पर अब वो बात नहीं,
क्यों नाराज हो मुझसे?

साथ खाना खाया हमें,
खपा नहीं कभी तुझसे,
तुम अलग राह चलती,
क्यों नाराज हो मुझसे?

रात दिन तुझे चाहा था,
मुहब्बत बड़ी थी तुझसे,
दूर दूर छुपकर रहते हो,
क्यों नाराज हो मुझसे?

खेल अधूरा छोड़ों ना,
यह प्रार्थना बसु तुझसे,
अच्छा नहीं लगता यह,
क्यों नाराज हो मुझसे?

जग तमाशा देख रहा,
यकीन बड़ा था तुझसे,
जग तमाशा बन चुका,
क्यों नाराज हो मुझसे?

मन में बहुत इतराते थे,
पाकर प्यार बस तुझसे,
वादे सारे तोड़ दिये हैं,
क्यों नाराज हो मुझसे?

कोई किसी का नहीं हैं,
यह समझाता मैं तुझसे,
आकर मुझको आजमा,
क्यों नाराज हो मुझसे?

बहुत बेदर्द जमाना हो,
यकीन मिला था तुझसे,
बस खाक छान रहे हैं,
क्यों नाराज हो मुझसे?

जिंदगी आनी जानी है,
पर दर्द मिला है तुझसे,
अब ना और मुझे सता,
क्यों नाराज हो मुझसे?

नाराजगी अब दूर कर,
फिर गले मिलूं तुझसे,
बांहों में बस आ जाना,
क्यों नाराज हो मुझसे?


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नियति
विधा-चौका
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पड़ती ठंड
शांत हो गई धरा
कैसी नियति
लगता जन डरा
बदली मति
खो गया रंग हरा
किसको कहे
लगता सब नया
आती ना दया
कैसे करूं मैं बयां
उसके आगे
नतमस्तक होते
जीवन नया
मिलता अब कहां
स्वर्ग नरक यहां।

Thursday, December 24, 2020

 

जरा सुनो
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आज का विषय- मुक्त
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महामारी, सर्दी, सड़कों पर किसान।
विधेयक तीन और सरकार परेशान।।
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कुडलियां
विधा-कुंडलियां
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घबराना क्या देखकर,दुख सुख छाया धूप ।
रहना  है  हर  हाल में , कुदरत के अनुरूप ।
कुदरत  के  अनुरूप , चलें  तो सुख पाएंगे ।
रहें   अगर   विपरीत , रोग   बढ़ते  जाएंगे ।
करता सदा सचेत ,बदल मौसम का आना ।
सर्द गर्म बरसात , देखकर  क्या  घबराना ।।



कविता नव वर्ष
 नव वर्ष विदाई
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राक्षस सा बनकर,
जा रहा वर्ष 2020
लाखों जनों के घर,
बचाये वो जगदीश,

विदा कर दो इसको,
फिर ना  मिले कभी,
2021 खुशी लाएगा,
आशा कर  रहे सभी।

भुला डालो सारे गम,
प्रसन्नता लाओ अभी,
बीत गई वो बात गई,
फिर ना आएगी कभी।

मंगलमय हो नव वर्ष
करते रहेंगे शुभकामना
खुशियां जमकर मिले
गमों का न हो सामना।
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परिंदे
विधा-कविता
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उन्मुक्त गगन में उड़ते,
लगे नहीं कुछ भी दूर,
परिंदे अपनी खुशी से,
उड़ते फिरते वो सुदूर।

नहीं बैर भाव वे रखते,
आपस में मिलता प्यार,
एक साथ मिलकर रहे,
बातें करें मिलके हजार।

जरूरत पड़ी घर बनता,
वृक्षों पर ही रहते सदा,
उड़ते फिरते मम मर्जी,
अनोखी उनकी है अदा।

इंसान के मन लुभाते हैं,
सुरीली आवाज मिलती,
डाली -डाली वो घूमते,
पुष्प कली जब खिलती।

मानव के सहायक होते,
पक्षियों का सुंदर संसार,
मार नहीं  कभी इनको,
कर लो बस इनसे प्यार।।
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पथ नया अपना रहा हूं
विधा-कविता
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निज जीवन बीता रहा हूं,
एक नया गीत गा रहा हूं,
दुनिया को बहुत दिया है,
पथ नया अपना रहा हूं।

कभी डगमग मेरा जीवन,
अब सीधा चल पा रहा हूं,
लोगों खातिर उदाहरण हूं,
पथ नया अपना रहा हूं।

माता पिता गुरु प्रिय मुझे,
उनका ऋण उतार रहा हूं,
परहित में सदा जीता हूं,
पथ नया अपना रहा हूं।

एक दिन उस प्रभु से पूंछू,
उनके ही गीत गा रहा हूं,
भवसागर में भ्रमित होकर
पथ नया अपना रहा हूं।।
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*

 




अमानत
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अमानत है जन की जिंदगी,
खेलों कूदो लो पल दो पल,
आज करना  है, जो कर लो,
पता नहीं क्या हो जाए कल।

अमानत किसी का प्यार गर,
लौटा देना चाहिए समेत सूद,
सोच सोचकर समय न गंवा,
वरना एक दिन ले आंखें मूंद।

अमानत किसी की मत रखो,
वरना मिलेगा नरक का द्वार,
संकट ही संकट छायेंगे तब,
एक दिन जन की होगी हार।

अमानत मान लेना आज ही,
अपना आज यह सारा शरीर,
सौंप दे शरीर को उस प्रभु से,
वो दाता है हर लेगा सब पीर।

Tuesday, December 22, 2020

 
 दोहा
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पैदा होकर नीच घर, विचार बने पुनीत।
हर जुबान पर नाम हो, दुनिया गाये गीत।।

दुष्ट साथ अब छोड़ दो, कितने कहते संत।
नरक द्वार वो भोगता, कुत्ते जैसा अंत।।

काट सके ना जिसको, आत्मा उसका नाम।
देह बदलती जीव में, अजर अमर हर धाम।।






विधा-कविता  
मां की ममता
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तीनों लोकों की खुशी, मां की ममता होती,
दुख दर्द बच्चे पर पड़े, घुट घुटकर वो रोती,
स्वर्ग सा सुख देती है,खुद कष्टों में ही सोती,
मां से बड़ी देवी तो, पूरे जगत में नहीं होती।

मां की ममता स्वर्ग है,मां का आंचल धाम।
मां की सेवा रोज कर, हो जाए जग नाम।।
मां की स्वर्ग मां ही धरा, मां हो सुंदर धाम।
नमन करो मां को हरदम, सफल होंगे काम।।

सुबह शाम सेवा करो, बन जाये बिगड़े काम,
आशीर्वाद सदा मिलता रहे,सुबह हो या शाम,
मां तेरी ममता मिले, अगले जन्म में भी खूब,
मां की बातों में लगता, कोमलता हो ज्यों दूब।।
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विषय-प्रतीक्षा
विधा-कविता
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अति कठिन है प्रतीक्षा, करके देख लो।
कड़वे मीठे अनुभव को, खुद सीख लो।।
प्रेमी युगल चले जिस राह थी वो अनोखी,
प्रतीक्षा के लिए कुछ, समय की भीख लो।।

प्रतीक्षा के नाम पर, झलके माथे पर दर्द।
प्रतीक्षा हो कठिन, जब चले हवायें सर्द।।
समय के साथ चल सके वो सच्चा इंसान,
प्रतीक्षा कर संयम बरते, वो सच्चा है मर्द।।

प्रतीक्षा से बढ़कर जग, नहीं कोई भी काम।
प्रतीक्षा करते करते, बीत जाये सुबह शाम।।
संयम अपने आप में बहुत बड़ा होता खेल,
जो प्रतीक्षा पर खरे उतरे, होता जग में नाम।।

प्रतीक्षा विकट घड़ी, नहीं आसान यह खेल।
प्रतीक्षा के बाद ही, हो दो दिलों का मेल।।
समय काटना मुश्किल हो, कभी कभी इंसान,
प्रतीक्षा की याद घड़ी में, जन की बनती रेल।।

प्रतीक्षा करते करते कभी, मिलती इंसान हार।
प्रतीक्षा हो इस जीवन में, सच्चा एक आधार।।
नाम कमाने की खातिर क्या क्या खेल रचाये,
प्रतीक्षा में आनंद आता, मिलता अनहद प्यार।।










प्रतिक्षा
विधा-कविता
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दर्द दिलों में उमड़ पड़ेगा
बीत नहीं पायेगा ये दिन,
शाम ढले फिर रात आए,
रात कटे नहीं तारे गिन।

वो दिन प्रतीक्षा के कहो,
दर्शन दुर्लभ होएंगे सनम,
इच्छा दिल की पूरी नहीं,
आंसुओं से आंखें हो नम।

सुबह शाम ललक मिले,
कैसे उससे मिलन होगा,
कभी बाग, कभी उपवन,
दुख दर्द में जीवन भोगा।

आएगा वो भी एक दिन,
मंजिल अपनी होगी पास,
उससे मिलन होगा अपना,
कष्ट दर्द सब होगा नाश।।


Monday, December 21, 2020

 सुनो
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आज का विषय-
आसमान छूने लगी महंगाई की आन ।
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आसमान छूने लगी महंगाई, नेता ले रहे अंगड़ाई।
सड़कों पर किसान बैठे, सरकार की जग हँसाई।।
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 दोहा

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पाप करे वो रात दिन, खुल जाती है पोल।
जन की कीमत जान लेे, जीवन है अनमोल।।

कुर्सी कीमत देखकर, मन ललचाये लोग।
कुर्सी चक्कर जान ले, बहुत बुरा है रोग।।

बुरा करके खुश हुआ, नीच कर्म ले मान।
अंत समय पछता रहा, कितना है अंजान।।
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तेरे मेरे सपने
विधा-छंदमुक्त कविता
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तेरे मेरे सपने बने हसीन,
कभी यहां तो कभी वहां,
जीवन की नैया हिचकौले,
अनमिट कांटों का सफर।

सपने इंसान को ले जाये,
कभी नभ  कभी पाताल,
नहीं होते ये कभी अपने
कभी कर देते हैं बेहाल।

सपने कभी देते हैं हँसी,
कभी मन को देते रुला,
कभी प्यासे  धरा तड़पे,
कभी डूब के जाये मर।

सपनों पर विश्वास न कर,
कभी नहीं ले जाये पार,
कैसे किसी से यूं कहिये,
सपने में होता बंटाधार।।
*********************

प्यार की सर पे रहने दे छतरी सनम
विधा-कविता
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प्यार की सर पे,
रहने दे छतरी सनम,
प्यार में इजाफा,
ना होने पाये यह कम।

प्यार वो दवा,
करे दिल का रोग दूर,
यह दवा ले लो,
फिर काहे का गरूर।

हीर और रांझा,
बने उदाहरण संसार,
सोहनी महिवाल,
घटा कभी नहीं प्यार।

हंसते हुये जीते
प्यार की मिले खुराक,
वरन यह जिंदगी
एक दिन बनती है राख।

सनम हो प्यारा,
मिलता है उसे किनारा,
सनम की मार से,
उभरे नहीं जन दुकारा।

प्यार की छतरी
बचाती आंधी बरसात,
हर हंसीन संग
मिले हमेशा सनम साथ।
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कविता
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छुप छुप मन से सोचती,
कब आयेंगे वो प्राणप्रिय,
पल पल राह निहार रही,
आकर पुकारेंगे प्रिय प्रिय।

साज शृंगार कर चुकी हूं,
हसरतें दिल में बसी हुई,
शांत भाव से आंगन बैठी,
सुनाई पड़ेगी आहट कहीं।

मधुर मधुर मुस्कान लिये,
कपोलों पर लालिमा छाई,
प्राणप्रिय का मन मोह लूं,
गौरा तन अब ले अंगड़ाई।

आएंगे जब प्रिय मेरे द्वारे,
पकड़ लूंगी मैं कस आज,
कुछ अपने दिल की कहूं,
कुछ उनसे भी पूछूंगी राज।

बेशक कोई कुछ कहता है,
सांवला  सलौना मेरा पति,
उसके चरण स्पर्श कर लूं,
तब ही होगी मेरी सद्गति।

Sunday, December 20, 2020

 
कुंडलियां  
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आँखें नीची कर कही,लोक लुभावन बात ।
भूख गरीबी खत्म होंं, हो धन की बरसात ।
हो  धन की बरसात , खुलेंगे  इतने  धन्धे ।
जग  में  हों  मशहूर ,नहीं आंखों से अंधे ।
अब रहना उस ढाल  , राम जैसे भी राखें ।
नहीं सुने दुख दर्द  , बदल लेता हैं आँखें ।।
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नमन
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अपनी धुन में खो रहे, खुश रहते हर हाल।
साधु संत बाणा लगे, सुंदर उनकी चाल।।

बने सौहार्द देश में, मिलकर हो जब काम।
भाईचारा तब बढ़े, होगा जग में नाम।।

अदृश्य दुश्मन से बचो, करता घातक वार।
चिकनी चुपड़ी बात में, नहीं मिलेगा प्यार।।





जाड़े की धूप
विधा-कविता
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जाड़े की ऋतु जब आती
पहनते हैं कपड़े कई-कई,
विभिन्न पोषाक पहनकर,
शक्लें लगती हैं नई-नई।

जाड़े में सुहानी लगे धूप,
मन को  मिलता आराम,
घंटों बैठे रहते धूप में ही,
करते नहीं कुछ भी काम।

जाड़े की धूप में बैठे जब,
आलसी बन जाता शरीर,
सर्दी तन की कम होती है,
कम हो जाती तन की पीर।

गर्म-गर्म चाय का प्याला,
मूंगफली गजक हो साथ,
गर्म पकौड़े, गर्म समोसा,
मिलते रहे सदा ही हाथ।

जाड़े की धूप कह रही,
आओ बैठों ले लो धूप,
खाना बाद में खा लेना,
पहले पी लो गर्म सूप।।
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आंसू/कविता
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आंसू
अनमोल होते हैं आंसू,
पवित्र ये  कहलाते हैं,
जब आंखों में आते तो,
गम की याद दिलाते हैं।

कभी कभी ये आंसू तो,
खुशियों से आ जाते हैं,
कभी कभी आंसू बहा,
रोगों  से  बच  जाते हैं।

आंसू दिल का बयां करे,
आंसू गम खुशी इजहार,
कभी एक आंसू न आए,
कभी गिरे ये कई हजार।

आंसू का  मोल  नहीं है
पता कर लो  बाजार  से
अगर धोखा देना  बस है
संजोकर रख लो प्यार से।