KANINA MOHALLA-MODIKA WARD-01 DISTRICT-MAHENDERGARH(HARYANA) PIN-123027 Mob 91+9416348400
Friday, October 29, 2021
**DIL KI AWAZ **दिल की आवाज**
Tuesday, August 10, 2021
Thursday, February 04, 2021
धुंध
विधा-छंदमुक्त कविता
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सफेद चादर नजर आ रही,
धुंध और कोहरा छाया है,
वाहन चल रहे घोंघा जैसे,
जन बैठे हैं आग के पास।
सर्दी बढ़ती जा रही अब,
सरसों, गेहूं लहलहा रहे,
कहीं बसंत के फूल भी,
कहीं फाग दूर सुनाई दे।
स्वेटर पहने कंबल ओढ़े,
कांप रहे बुजुर्ग जन अब,
चहुं ओर सन्नाटा छाया है,
नहीं सुनाई दे रहा वो शोर।
मधुमक्खी मंडरा रही फूल,
कोयल भी गाती अब बाग,
मस्ती में झूम रहे भंवरे भी,
सुन सुन मन जाता है जाग।
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कुचक्र
विधा-दोहे
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चलते कुचक्र बैठकर, करे बुराई काम।
पाप कर्म में लीन हैं, सुबह वक्त या शाम।।
कैसा कुचक्र नीच जन, चलते रहते रोज।
सोच नहीं बदलती, करे बुराई खोज।।
मौका देखा मारते , करते कुचक्र वार।
पाप धर्म में खेल में, पापी जाए हार।।
साहस की किरणें चमका कर,
तम का पथ अवरोधन कर दो।
बुराई सारे जग की मिटा कर,
अच्छाई से जन दामन भर दो।।
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दोहा *******************
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नाग देवता बढ़ गये, मिलते गली हजार।
झट से मानव को डसे, नहीं करे वो प्यार।।
करो बुराई सामना, बेशक होती हार।
जीत मिलेगी एक दिन,जगत करेगा प्यार।।
आएगा वो वक्त भी, झूठ मिलेगा मोल।
खूंटी पर लटके मिले, सच के सारे बोल।।
ऋतुराज
विधा-कविता
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कवि करते कल्पना,
कहलाए ऋतुएं चार,
इनमें सर्व श्रेष्ठ होती,
कहलाए बसंत बहार।
खेतों में बहार आई,
फूल खिले हैं हजार,
भ्रमर कलियां ढूंढते,
उनको फूलों से प्यार।
हल्की ठंड पड़ रही,
तरुवर कर रहे पुकार,
मन प्रसन्न हो जाएगा,
देखकर जल की धार।
मां सरस्वती की पूजा,
विद्या की देवी कहाए,
खुशी का पर्व सुहाना,
लो नभ में पतंग उड़ाए।
ऋतुराज लो आ गया,
बागों में छा गई बहार,
ऋतु आई मिलन की,
चकवा चकवी में प्यार।।
Tuesday, February 02, 2021
कविता
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बैसाखी/कविता
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फूली सरसों चहु ओर,
बाग फूल महकाते हैं,
ढोल और ताशें बजते,
लो आ गई बैसाखी है।
पंजाब में पर्व मनाते हैं,
खुशियां जहां निराली,
पुरुष नाचते ताशों पर,
नारी लगती मतवाली।
बागों में कोयल गाती,
खुशबू से मन भर जाये,
भंवरे मतवाले मंडराते,
आकाश पतंग लहराये।
फसल पकी को देखकर,
किसानों में मच गई झूम,
दादुर गा रहे टेर लगाकर,
जहां भी देखों मची धूम।।
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बसंत पंचमी
विधा-कविता
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करो अर्चना मां सरस्वती,
आया शुभ बसंत पंचमी,
हाथ जोड़कर करे प्रणाम,
कृपा की बनी रहे बंदगी।
मां का मिला आशीर्वाद,
बने हैं सारे बिगड़े काज,
तेरी कृपा जिस पर रही,
उसने किया जग पे राज।
विद्या फल दे, देना ज्ञान,
कभी करे नहीं अभिमान,
जहां जाए मिले सम्मान,
देना सद्बुद्धि का वरदान।
अज्ञानी कितने उतारे पार,
विद्वानों में हुई नहीं हार,
हाथ जोड़कर करे प्रणाम,
मिलता रहे जहां का प्यार।
कवि करते आये कल्पना,
कहलाती जग ऋतुएं चार,
सबसे श्रेष्ठ मन खुशी भरे,
कहलाती है बसंत बहार।
खेतों में जब बहार आई,
फूल खिले उपवन हजार,
भ्रमर कलियों ढूंढते फिरे,
बस उनको फूलों से प्यार।
हल्की ठंड भी पड़ रही,
लो तरुवर कर रहे पुकार ,
मन भी प्रसन्न हो जाएगा,
देखके शुद्ध जल की धार।
मां सरस्वती की हो पूजा,
विद्या की देवी वो कहाए,
खुशी का पर्व सुहाना हो,
लो अंबर में पतंग उड़ाए।
भाषा की मर्यादा को,
कभी नहीं हम भूलेंगे।
हिंदी में हम बात करें,
ऊंचाइयों को छू लेंगे।।
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विषय-आशियां
विधा-मुक्तक
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देख आशियां जीव का, होता जन हैरान।
कभी न लड़ते देखते, उनकी हो पहचान।।
कैसा है इंसान जग, लड़ता रहता रोज,
अच्छी शिक्षा को कभी, माने नहीं जहान।।
देख आशियां जल रहा, गरीब जगत इंसान।
परहित के बस काम से, जीवन बने महान।।
पाप कर्म में खुश रहे, निंदा गाये गान,
शुभ कर्मों से जगत में, बनती है पहचान।।
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दोहा
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महावीर हनुमान का, कर लो हरदम जाप।
जन मन को खुशियां मिले, मिट जाये संताप।।
लाखों डूबे दर्द में, खुशियां ढूंढे लोग।
मिले कहां सुख की दवा, बढ़ता जाये रोग।।
पैसा जिसके पास हो, कहलाता विद्वान।
जो ठन ठन गोपाल है, पागल कहे जहान।।
Saturday, January 30, 2021
गरीब ढोये जिंदगी का बोझ
कविता
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गरीब ढोये जिंदगी का बोझ,
एक दिन नहीं, वो रोज रोज,
रोटी की करता नित तलाश,
रोटी बने बस उसकी खोज।
सुबह उठता दर्द का सांया,
शाम ढले वो घर पर आया,
बच्चे उसके हैं आश लगाये,
कहते वो पापा रोटी लाया।
फैक्ट्री, उद्योग हो कारखाना,
ईंट भट्ठा हो, या मयखाना,
रोटी खातिर सेवा करते वो,
लगता चेहरा जाना पहचाना।
गर्मी सर्दी हो या बसंत कहार,
मजदूर मिलते हैं घर से बाहर,
खूब कमाते मिलते हैं दिनभर,
मिलती फिर भी उनको हार।
फटे पुराने वस्त्र मिले तन पर,
खाने को नहीं मिलती है रोटी,
पढ़ाई लिखाई कैसे वो करते,
उनकी है बस किस्मत खोटी।।
जयगान
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जिनका जयगान गूंजता था,
प्रतिद्वंद्वी कैसे आज हुये।
जिनका नाम दिलों में था,
वो कैसे आज बेताज हुये।।
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अमीर
विधा-सायली छंद
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अमीर
देते रहते
गरीब को पीर
चलाते हैं
तीर
गरीब
दुखी आज
अमीरों का राज
कैसे करे
नाज
दर्द
जहां में
देते हैं अमीर
बढ़ाते वो
पीर
शहीद
विधा- मुक्तक
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गोली खाते वीर जब, होता जग में नाम।
मातृभूमि को सींचते , देते हैं पैगाम।।
सदा रहेंगे याद वो, अपने देश शहीद,
वीर शहादत से बना, सुंदर भारत धाम।।
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मुक्तक
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वीर धीर बलबीर हैं, हनुमत उनका नाम।
भक्तजनों के कष्ट में, मिले सुबह हर शाम।।
सुख दुख तो इंसान में, जीवन के हैं रूप,
करते विपत्ति दूर प्रभु, जन हर्षाना काम।।
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दोहा
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शिक्षा देनी चाहिये, शिक्षा जग की शान।
शिक्षा पाकर देश भी, बनता खूब महान।।
शिक्षा भर दे ज्ञान मन, आती जमकर काम।
शिक्षा से विद्वान जन, जग में पाता नाम।।
बासी भोजन भोग से, सेहत को नुकसान।
सादा खाना खाइये, कहता सकल जहान।।
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शिक्षा
दोहा
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शिक्षा देनी चाहिये, शिक्षा जग की शान।
शिक्षा पाकर देश भी, बनता खूब महान।।
शिक्षा भर दे ज्ञान मन, आती जमकर काम।
शिक्षा से विद्वान जन, जग में पाता नाम।।
Friday, January 29, 2021
कविता
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खत्म करो दिन रात तो,
नहीं मिलेगा कोई हल,
शुद्ध पेयजल कह रहे,
नहीं मिलेगा फिर कल।
जीवन देने वाला अमृत,
कहलाए जीवन का हल,
रोक लो बहते जल को,
मत बहाओ खुलके नल।
जल बिना तड़प कर मरे,
धरती का हर जीवधारी,
जल से बढ़कर कुछ नहीं,
पुकार कर कहे धरा सारी।
पक्षी भी अब तड़प रहे,
अब पानी कहां से आए,
जल बिना जीना कठिन,
जीवन कौन अब बचाये।
कलम
विधा- दोहा
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करो कलम सिर दुष्ट का, बोलो जय जय राम।
परहित में जीवन लगा, होगा जग में काम।।
नहीं कलम को तोडऩा, आती लेखन काम।
सुंदर दोहे तुम लिखो, होगा लेखक नाम।।
देख कलम की मार को, दुश्मन रोते आज।
अच्छा लेखन जो करे, कभी नहीं हो हार।।
सदा कलम जन पास हो, लेखन सदा विचार।
देश प्रेम के लेख से, उपजे जन मन प्यार।।
Wednesday, January 27, 2021
अतीत यादें, सपने
विधा-कविता
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अतीत की यादें बहुत सताती,
कभी आती हैं कभी वो जाती,
सपने कभी-कभी ये दिखाकर,
अपनी सारी बातें हमें बताती।
अतीत की यादें कभी कभी तो,
बहुत दुख दर्द जन को दे जाती,
यादों और सपनों को दूर रखना,
दिल को अति सताती तड़पाती।
यादें कभी कभी तो इंसान का,
मन बहुत प्रसन्न कर जाती हैं,
इसलिये यादें दिल में संजोना,
बुरे वक्त पड़े बहुत काम आती।।
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सजना/सजनी
विधा-कहमुकरी
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रजनी बोली सुन कमली,
साजन मेरा बहुत खराब,
खाता पीता कुछ भी नहीं,
बस पीता जमकर शराब।
बर्तन भांडे सब बेच दिये,
खाने को नहीं मिले रोटी,
बहुत बुरे घर दिन आये,
किस्मत मेरी होती खोटी।
कमली बोली, सुन रजनी,
मेरे साजन बहुत ईमानदार,
अपने पैसे दिन कमाये है,
फिर ले आया है वो कार।
जीवन मेरा बहुत सुखी है,
घर में सब हैं मोटर कार,
हाथ में सोने की घड़ी है,
गले पड़ा सोने का हार है।
ओस
विधा-मुक्तक दोहा मुक्तक मात्राएं 13,11
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ओस पड़ी जब घास पर, चमके मोती रूप।
चांदी जैसी चमकती , हो आकर्षित भूप।।
सर्दी का जब माह हो, धुंध बहुत है आम,
सूरज किरणों से सजे, ओस सुंदर अनूप।।
फसल खड़ी हो जब बड़ी, पड़े ओस तब आम।
धुंध देखने को मिले, सुबह दोपहर शाम।।
अपनी फसलें देखकर, प्रसन्न मिले किसान,
अच्छी पैदावार से, बनते बिगड़े काम।।
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जरा सुनो
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आज का विषय-
गणतंत्र की गरिमा पर प्रहार, किसानों की यही हार।
अन्नदाता जो लड़ रहे, खोता जाये उनका आधार।।
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दोहा
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सोच सोच खुश हो रहे, मेहनत होता नाम।
जितना गुड़ डालो कभी, उतना मीठा काम।।
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-
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सोच सोच खुश हो रहे, मेहनत होता नाम।
जितना गुड़ डालो कभी, मीठा मिलता काम।।
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धीरज
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धीरज धारण कीजिये, बिगड़ रहे हो काम।
सहज पके मीठा बने, जग में होगा नाम।।
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कटी फटी पोशाक से, दुखिया सम हालात।
फैशन के इस दौर में, मिली यही सौगात।।
देखा दर्द गरीब का, आया दाता याद।
खाने को वो तरसते, कौन सुने फरियाद।।
आज गणतंत्र कह रहा, शुरू हुआ संविधान।
देशभक्तों की भूमि यह, भारत देश महान।।
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Monday, January 25, 2021
राष्ट्रभक्ति
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राष्ट्रभक्ति जन जन भरी हो,
वो भारत हमारा प्यारा है,
माटी इसकी चंदन सम है,
जन जन का राजदुलारा है।
जहां पूजा होती वीरों की,
मेरा देश मेरा जवानों का,
दुश्मन भी थर थर कांपते,
यह देश बड़ा विद्वानों का।
फांसी खाते देर नहीं की,
सरदार भगत सिंह प्यारा,
राजगुरू और सुखदेव का,
जोश और जनून था न्यारा।
आजाद थे वो आजाद रहे,
आजादी के लिए कष्ट सहे,
बापू व बोस जान से प्यारे,
कुर्बानी याद कर आंसू बहे।
एक से बढ़कर एक वीर है,
किस किस का बखान करूं,
वीरों का नाम ना छूट जाए,
सोच सोच यह बात मैं डरूं।
भारत भूमि
विधा-कविता
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सबसे न्यारी, सबसे प्यारी,
वीरों की भारत भूमि न्यारी,
चले गये भारत छोड़कर वो,
कहलाते थे जग अत्याचारी।
सुभाष,भगत सिंह की भूमि,
सींचा है अपने ही खून से,
फांसी खाई कुर्बानी दे डाली,
बचाया इसको,गैर कानून से।
भारत भूमि पर हल चलाते,
उपजाते हैं अन्न देश किसान,
इसकी महिमा जगत जानता,
सभ्यता संस्कृति है पहचान।
नहीं हुआ है नहीं कोई होगा,
गंगा, यमुना जहां बहती आज,
हरदिल अजीज यहां के नेता,
करते आये हैं दिलों पर राज।
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राष्ट्रभक्ति
विधा-कविता
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भरा हुआ जोश दिलों में,
हमने ये कसम उठानी है,
दुश्मन को पल में मारेंगे,
दिल में बस यह ठानी है।
देशों में बड़ा देश हमारा,
लगता हम को प्यारा है,
शिक्षा दीक्षा में सर्वोपरि,
आंखों का यह तारा है।
हर क्षेत्र में नाम कमाते,
किसान कहो या मजदूर,
एक बार जो सामने आये,
पल में कर दे चकनाचूर।
आजाद किया है वीरों ने,
कर लो नमन आज सारे,
सुभाष, भगत से वीर हुये,
लगते मन को अति प्यारे।
गणतंत्र आज मना रहे है,
संविधान अजब महान है,
ऐसा संविधान दिया भारत,
इसलिये जगत की शान है।
इंद्रधनुष
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कई रंग का पुंज हमारा,
इंद्रधनुष सम जीवन प्यारा।
जीवन भी रंगीन हमारा,
पल में हो जाये प्रभु प्यारा।।
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दोहा
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मात पिता खामोश अब, बहु बेटे का राज।
साली साला मौज में, सास ससुर पर नाज।।
अमल नहीं हो घोषणा, नेता पसंद ख्वाब।
लोग दर्द में जी रहे, दोषी कौन जनाब।।
मेहनत को जन भूलकर, किस्मत देते दोष।
नहीं बने जब काम तो, मन मेें पनपे रोष।।
Sunday, January 24, 2021
जरा सुनो
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आज का विषय-
दिल्ली में परेड के लिए ट्रैक्टरों का आना लगातार जारी,
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वाह रे वाह! सरकार अभी है मौन नहीं अभी हारी।
दिल्ली में परेड के लिए ट्रैक्टरों का आना लगातार जारी।।
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सुभाषचंद्र बोस/पराक्रम दिवस
विधा-दोहे
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नेता चर्चित आज भी, कहते उनको बोस।
आजादी की राह पर, चले गये अफसोस।।
दिवस पराक्रम आज है, बोस रहेंगे याद।
नारा जग में गूंजता, नहीं करें फरियाद।।
देशभक्त होगा नहीं, जग में जैसा बोस।
कहां गये वो छोड़कर, इतना है अफसोस।।
विधा-कविता
बचाओ पेड़/कविता
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भूल गये क्यों, पेड़ ही हो सहारा,
खत्म हुये तो, नहीं मिलेंगे दुबारा,
रोयेगा मानव धरती का जो प्यारा,
फर्ज बनता है बचाओ पेड़ हमारा।
फल,फूल,छाया देते हैं जीवनभर,
इनके साये में होता नहीं लगे डर,
सब्जी,फूल,फल मिलता घर-घर,
खा पीकर मस्त हो बोलो हर हर।
खाद भी देते हैं ये जीवन में सारे,
गर्मी की छाया में बैठे जीव हमारे,
धरती माता कह रही करो शृंगार,
काट नहीं पेड़ को, दो इन्हें प्यार।
चिपको आंदोलन की करो याद,
अमृता ने कभी की नहीं फरियाद,
गौरा देवी ने लगाई प्राण आहुति,
पेड़ों को बचाओ नहीं बन जल्लाद।
आओ एक पेड़ हम भी रोप दें,
रक्षा, पानी, खाद उसको रोज दे,
आए लहलहाता फिर वो सवेरा,
डाल देगा धरा पर स्वर्ग ही डेरा।।
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विषय-जल
विधा -कविता
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खत्म करो दिन रात तो,
नहीं मिलेगा कोई हल,
शुद्ध पेयजल कह रहे,
नहीं मिलेगा फिर कल।
जीवन देने वाला अमृत,
कहलाए जीवन का हल,
रोक लो बहते जल को,
मत बहाओ खुल ही नल।
जल बिना तड़प कर मरे,
धरती का हर जीवधारी,
जल से बढ़कर कुछ नहीं,
पुकार कर कहे धरा सारी।






















































