Thursday, February 04, 2021

 
धुंध
विधा-छंदमुक्त कविता
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सफेद चादर नजर आ रही,
धुंध और कोहरा छाया है,
वाहन चल रहे घोंघा जैसे,
जन बैठे हैं आग के पास।

सर्दी बढ़ती जा रही अब,
सरसों, गेहूं लहलहा रहे,
कहीं बसंत के फूल भी,
कहीं फाग दूर सुनाई दे।

स्वेटर पहने कंबल ओढ़े,
कांप रहे बुजुर्ग जन अब,
चहुं ओर सन्नाटा छाया है,
नहीं सुनाई दे रहा वो शोर।

मधुमक्खी मंडरा रही फूल,
कोयल भी गाती अब बाग,
मस्ती में झूम रहे भंवरे भी,
सुन सुन मन जाता है जाग।
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कुचक्र
विधा-दोहे
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चलते कुचक्र बैठकर, करे बुराई काम।
पाप कर्म में लीन हैं, सुबह वक्त या शाम।।

कैसा कुचक्र नीच जन, चलते रहते रोज।
सोच नहीं बदलती, करे बुराई खोज।।

मौका देखा मारते , करते कुचक्र वार।
पाप धर्म में खेल में, पापी जाए हार।।


साहस की किरणें चमका कर,
तम का पथ अवरोधन कर दो।
बुराई सारे जग की मिटा कर,
अच्छाई से जन दामन भर दो।।
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 दोहा *******************

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नाग देवता बढ़ गये, मिलते गली हजार।
झट से मानव को डसे, नहीं करे वो प्यार।।
 
करो बुराई सामना, बेशक होती हार।
जीत मिलेगी एक दिन,जगत करेगा प्यार।।

आएगा वो वक्त भी, झूठ मिलेगा मोल।
खूंटी पर लटके मिले, सच के सारे बोल।।




ऋतुराज
विधा-कविता
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कवि करते कल्पना,
कहलाए ऋतुएं चार,
इनमें सर्व श्रेष्ठ होती,
कहलाए बसंत बहार।

खेतों  में बहार आई,
फूल खिले हैं हजार,
भ्रमर  कलियां ढूंढते,
उनको फूलों से प्यार।

हल्की  ठंड पड़ रही,
तरुवर कर रहे पुकार,
मन प्रसन्न हो जाएगा,
देखकर जल की धार।

मां सरस्वती की पूजा,
विद्या की देवी कहाए,
खुशी का पर्व सुहाना,
लो नभ में पतंग उड़ाए।

ऋतुराज लो आ गया,
बागों में छा गई बहार,








ऋतु आई मिलन की,
चकवा चकवी में प्यार।।


Tuesday, February 02, 2021

 कविता
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बैसाखी/कविता
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फूली सरसों चहु ओर,
बाग फूल महकाते हैं,
ढोल और ताशें बजते,
लो आ गई बैसाखी है।

पंजाब में पर्व मनाते हैं,
खुशियां जहां निराली,
पुरुष नाचते ताशों पर,
नारी लगती मतवाली।

बागों में कोयल गाती,
खुशबू से मन भर जाये,
भंवरे मतवाले  मंडराते,
आकाश पतंग लहराये।

फसल पकी को देखकर,
किसानों में मच गई झूम,
दादुर गा रहे टेर लगाकर,
जहां भी देखों मची धूम।।
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बसंत पंचमी
विधा-कविता
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करो अर्चना मां सरस्वती,
आया शुभ बसंत पंचमी,
हाथ जोड़कर करे प्रणाम,
कृपा की बनी रहे बंदगी।

मां का मिला आशीर्वाद,
बने हैं सारे बिगड़े काज,
तेरी कृपा जिस पर रही,
उसने किया जग पे राज।

विद्या फल दे, देना ज्ञान,
कभी करे नहीं अभिमान,
जहां जाए मिले सम्मान,
देना सद्बुद्धि का वरदान।

अज्ञानी कितने उतारे पार,
विद्वानों में हुई नहीं हार,
हाथ जोड़कर करे प्रणाम,
मिलता रहे जहां का प्यार।

कवि करते आये कल्पना,
कहलाती जग ऋतुएं चार,
सबसे श्रेष्ठ मन खुशी भरे,
कहलाती है बसंत बहार।

खेतों  में जब बहार आई,
फूल खिले उपवन हजार,
भ्रमर कलियों ढूंढते फिरे,
बस उनको फूलों से प्यार।

हल्की  ठंड भी पड़ रही,
लो तरुवर कर रहे पुकार ,
मन भी प्रसन्न हो जाएगा,
देखके शुद्ध जल की धार।

मां सरस्वती की हो पूजा,
विद्या की देवी वो कहाए,
खुशी का पर्व सुहाना हो,
लो अंबर में पतंग उड़ाए।

भाषा की मर्यादा को,
 कभी नहीं हम भूलेंगे।
हिंदी में हम बात करें,
 ऊंचाइयों को छू लेंगे।।
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विषय-आशियां
विधा-मुक्तक
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देख आशियां जीव का, होता जन हैरान।
कभी न लड़ते देखते, उनकी हो पहचान।।
कैसा है इंसान जग, लड़ता रहता रोज,
अच्छी शिक्षा को कभी, माने नहीं जहान।।


देख आशियां जल रहा, गरीब जगत इंसान।
परहित के बस काम से, जीवन बने महान।।
पाप कर्म में खुश रहे, निंदा गाये गान,
शुभ कर्मों से जगत में, बनती है पहचान।।
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 दोहा
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महावीर हनुमान का, कर लो हरदम जाप।
जन मन को खुशियां मिले, मिट जाये संताप।।

लाखों डूबे दर्द में, खुशियां ढूंढे लोग।
मिले कहां सुख की दवा, बढ़ता जाये रोग।।

पैसा जिसके पास हो, कहलाता विद्वान।
जो ठन ठन गोपाल है, पागल कहे जहान।।