धुंध
विधा-छंदमुक्त कविता
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सफेद चादर नजर आ रही,
धुंध और कोहरा छाया है,
वाहन चल रहे घोंघा जैसे,
जन बैठे हैं आग के पास।
सर्दी बढ़ती जा रही अब,
सरसों, गेहूं लहलहा रहे,
कहीं बसंत के फूल भी,
कहीं फाग दूर सुनाई दे।
स्वेटर पहने कंबल ओढ़े,
कांप रहे बुजुर्ग जन अब,
चहुं ओर सन्नाटा छाया है,
नहीं सुनाई दे रहा वो शोर।
मधुमक्खी मंडरा रही फूल,
कोयल भी गाती अब बाग,
मस्ती में झूम रहे भंवरे भी,
सुन सुन मन जाता है जाग।
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कुचक्र
विधा-दोहे
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चलते कुचक्र बैठकर, करे बुराई काम।
पाप कर्म में लीन हैं, सुबह वक्त या शाम।।
कैसा कुचक्र नीच जन, चलते रहते रोज।
सोच नहीं बदलती, करे बुराई खोज।।
मौका देखा मारते , करते कुचक्र वार।
पाप धर्म में खेल में, पापी जाए हार।।
साहस की किरणें चमका कर,
तम का पथ अवरोधन कर दो।
बुराई सारे जग की मिटा कर,
अच्छाई से जन दामन भर दो।।
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दोहा *******************
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नाग देवता बढ़ गये, मिलते गली हजार।
झट से मानव को डसे, नहीं करे वो प्यार।।
करो बुराई सामना, बेशक होती हार।
जीत मिलेगी एक दिन,जगत करेगा प्यार।।
आएगा वो वक्त भी, झूठ मिलेगा मोल।
खूंटी पर लटके मिले, सच के सारे बोल।।
ऋतुराज
विधा-कविता
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कवि करते कल्पना,
कहलाए ऋतुएं चार,
इनमें सर्व श्रेष्ठ होती,
कहलाए बसंत बहार।
खेतों में बहार आई,
फूल खिले हैं हजार,
भ्रमर कलियां ढूंढते,
उनको फूलों से प्यार।
हल्की ठंड पड़ रही,
तरुवर कर रहे पुकार,
मन प्रसन्न हो जाएगा,
देखकर जल की धार।
मां सरस्वती की पूजा,
विद्या की देवी कहाए,
खुशी का पर्व सुहाना,
लो नभ में पतंग उड़ाए।
ऋतुराज लो आ गया,
बागों में छा गई बहार,
ऋतु आई मिलन की,
चकवा चकवी में प्यार।।














