लंकापति दहन और प्रदूषण
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KANINA MOHALLA-MODIKA WARD-01 DISTRICT-MAHENDERGARH(HARYANA) PIN-123027 Mob 91+9416348400
लंकापति दहन और प्रदूषण
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नारी
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सागर
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हाइकु
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सागर उठे
ऊंची जब तरंग
छिड़ती जंग
गहरा सिंधु
जीव जंतु हैं बंधु
खुशी संसार
तरंग उठे
सागर जब मिले
मन भी खिले
सागर रचा
संसार जब बसा
जन भी हँसा।।
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स्वरचित/नितांत मौलिक
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अन्तर्राष्ट्रीय शांति दिवस
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कुछ तो है
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विधा-कविता
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कुछ न कुछ होता है, जगत आधार,
दूर से आकर बढ़ जाता है जन प्यार।
बसा हुआ यहां वहां, सुनहरा संसार,
आपसी प्रेम नहीं हो तो जीना बेकार।।
कुछ तो है,जो खिंच लेता है इंसान,
कोई तो बदनाम हो,कोई बने महान।
हर मानव की जग में,होती पहचान,
जीने की अदा हो, अपनी हो शान।।
कुछ तो है अदृश्य शक्ति,देती प्रमाण,
यह जगत भरा है, गुणों की है खान।
आगे बढ़कर देख, बन नहीं अज्ञान,
बुराई का मन कर लेता पूर्व में भान।।
कुछ तो है, जो चलाता सारा संसार,
साधु, संत सब खोज खोजकर हारे,
जप-तप करते देखे कभी दिन रात,
कभी खोज में पहुंचते मंदिर के द्वारे।
कुछ तो है, अदृश्य रूप में दे साथ,
कैसे मौसम बदले, कैसे दिन रात,
कभी बने सुख दुख के ही हालात,
ज्ञान विज्ञान के चर्म की चले बात।
कुछ तो है,जो यादों में आ जाते हैं,
कुछ बेबात ही गले में पड़ जाते हैं,
कुछ तो यादों में सारी रात सताते हैं,
कुछ अनजाने हमें गले से लगाते हैं।
कुछ तो है,जो मातृभूमि पर दे जान,
शहीद होते हैं तो बनती है पहचान,
वीर सपूत देश में कहलाते हैं महान,
देशभक्त देश पर हो जाते हैं कुर्बान।
कुछ तो है, जो प्रेरणा देते हैं इंसान,
कितने ही लोग, दे जाते बड़ा दान,
गुरुजनों के पास बैठ, पाते हैं ज्ञान,
उन्नति करता जाये, देश का विज्ञान।
कुछ तो है,जो मिले मात पिता गुरु,
लंबी कहानी अचानक होती शुरू,
निराशा भी क्षण में बन जाती आशा,
देखा नजारा तो बढ़ जाएगी पिपासा।
कुछ तो है, खिंचा चला जाए मानव,
कब दिमाग बदले, बन जाता दानव,
पल में खुशियां बदल जाती हैं गम,
नहीं पता चलते चलते निकले दम।
कुछ तो है, जो देता अंदरूनी शक्ति,
दुष्ट के दिल में जाएगी कभी भक्ति।
रोते रोते जन शुरू कर देता है हँसना,
ख्वाबों में आते हैं वो सांसों में बसना।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
कैफियत
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विधा-कविता
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कैफियत के लिए गये, वो मिला भला चंगा,
चाहे कोई काम करो, पर लेना कभी न पंगा।
जाना होता इस जग से, जगत हो एक सराय,
जीवन ऐसा हो इंसान, जैसे पवित्र होती गंगा।।
कैफियत गये अस्पताल,मिला अति परेशान,
रोग दूर नहीं हो रहा, निकल रही थी जान।
एक दिन ऐसा आता है, साथ कोई न देता,
हंसते गाते सो जाये, चादर एक लंबी तान।।
चार दिनों की जिंदगानी, पूछो सबका हाल,
पता नहीं किस दिन,बदले जमाने की चाल।
आज हम लो हँस रहे, कहल होंगे बदहाल,
पता नहीं किस घड़ी, होता जन मालामाल।।
जितना हंसना होता है,उतना ही रोना पड़ता,
धन दौलत पास मिले,पर फिर पड़ता सडऩा।
मात पिता और गुरुदेव समक्ष,कभी न अडऩा,
कपोल कल्पित बातें जग,कभी नहीं है घडऩा।।
कैफियत जानों मात पिता, जिन्हें तुमको पाला,
ऐसे कष्ट बताएंगे वो, मुंह पर लग जाये ताला।
सदा समदृष्टि रखो,हटा लेना आंखों का जाला,
संशय की बात चले जब,कहते दाल में काला।।
दर्द में डूबा मिलता है जन,किसको क्या कहेंगे,
जब तक यह दुनियादारी है, सुख दुख यूं रहेंगे।
दोस्त बना अपनों को, पराया कोई नहीं होता है,
एक दिन जब वो बिछुड़ जाये,नयन यूं ही बहेंगे।
राजा हो या रंक सभी को, जाना होता है जरूर,
फिर किस बात पर है, किस चीज का हो गरूर।
मिल जाये जैसा चाहा, खुशनसीबी कहलाती है,
अच्छे दिन जब आ जाये, मुख पर आता है नूर।।
कैफियत की बात सुनी, आया मन एक विचार,
जहां में कितने लोग हैं, देते हर जन को प्यार।
मुंह फुलाये घूम रहे जन, कैसी होती जिंदगानी,
प्रेम प्रीत इस जहां में कहलाती है जन आधार।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
कोमलता
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विधा-कविता
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कोमलता वो गुण जहां,
समक्ष खुश होत इंसान।
सच्चे,साधु जन की यह,
बन जाती बड़ी पहचान।।
कोमलता देख सुकुमार,
भ्रमर आते हैं बड़े पास।
बस एक इस गुण कारण,
बन जाते हैं कितने दास।।
कोमलता सर्वोच्च गुण है,
पत्थर का कर देता मोम।
वाह वाह मुख से निकले,
पुलकित होता रोम रोम।।
कोमलता जिस दिल बसे,
पूर्ण कर लेता जग काम।
बस इक सुंदर गुण से ही,
हो जाता है जगत में नाम।।
कोमलता के नाम पर जन,
लेते नाम जग के ही फूल।
कोमलता को कम आंकना,
जन की होती है बड़ी भूल।।
कोमल होता जब मन जन,
दया, रहम के करता काम।
जिसके दिल में रहम मिले,
वो जाता है बस स्वर्ग धाम।।
कोमल हृदय जब हो नहीं,
पाप,अधर्म के करता काम।
अहित, अत्याचार दिनरात,
हो जाता है जगत बदनाम।।
कभी नहीं मुख मोडऩा है,
कोमलता गुण के सामने।
देवत्व गुण के समान हो,
हर जन लगे इसे जानने।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
सांवला रंग
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विधा-कविता
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सांवला रंग मन को लुभाये,
कभी हँसे कभी मुस्कुराये।
श्रीकृष्ण सी बांसुरी अधर पे,
कितनी गोपियों को लुभाये।।
सांवला रंग पक्का होता जन,
सांवले की हो अजब अदायें।
सांवला मोहन हर दिल बसे,
हर जन के मन को भा जाये।।
सांवला रंग जगत में प्रसिद्ध,
कहकर गये कितने ही कवि।
और चमक आ जाती है जब,
चमके दमके नभ पर वो रवि।।
सांवला रंग हर दिल अजीज,
सांवले पर कर लेना विचार।
सांवली मूरत जब भी मिलती,
मन में उभरेगा अनहद प्यार।।
सांवला रंग देव जग रखवाला,
विष्णु और मनमोहन हैं एक।
अटल इरादे हर जन के खातिर,
दूर कर देते जब कष्ट हो अनेक।।
राधा प्रसन्न देखकर मनमोहन,
होती है प्रसन्न मन ही वो मन।
विष्णु के आठवें अवतार वो,
प्यारे लगते जग के जन जन।।
देवकी, वासुदेव के हैं प्रिय,
यशोदा और नंद के हैं प्यारे।
गीता का उपदेश दे दिया वो,
पापी जन को भी पार उतारे।।
सांवला रंग द्योतक जग देव,
नहीं कोई उनसे महान होगा।
जिसने उनकी महिमा सुन ली,
उसने ही स्वर्ग का सुख भोगा।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
घर से थे चले
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राखी
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सोने की चिडिय़ां
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जहां तक हो
चिट्ठी
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विधा-कविता
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कागज का एक टुकड़ा, लाता है जब संदेश,
चिट्ठी जिसका नाम पड़ा,बदले पल में भेष।
अच्छे बुरे शब्दों से भरी, स्वर्णअक्षर भरे हुये,
हजारों किमी जाए, भारत हो या हो विदेश।।
अब नहीं आती चि_ियां, अब आते हैं संदेश,
चिट्ठियों ने बदला अब, मोबाइल का भेष।
युवा,बुजुर्ग,औरत हर इंसान, बन गया हैं फैन,
कहते सुना गया है, युवाओं ने बिगाड़ा है देश।।
कभी आती थी चिट्ठियां, गम और खुशी साथ,
पढ़ते रहते थे उसे घंटों, एक और दूजे के हाथ।
वीर गये मां की सेवा में, हो गये जाकर शहीद,
कभी कभी तो बच्चे भी हो जाते थे तब अनाथ।।
डाकिया लाकर देता था, करते घर घर इंतजार,
पढऩे की खातिर बुलाते, लिखा पढ़ा जो इंसान।
गम और खुशी शब्दों में भरी, कभी आता प्यार,
परदेश गये पतिदेव का, नारी करती रहे इंतजार।।
खत,चिट्ठी या लिफाफा, पूरे लबालब होते भरे,
एक एक शब्द में जान डाल दे, होते शब्द खरे।
कभी सुनने वाले प्रसन्न हो, कभी लगे डरे डरे,
कभी युद्ध की बात मिले, कितने साथी यूं मरे।।
क्या अजब जमाना था, फोन नहीं कभी होते,
कभी फौजी को गम में देख, दिल से ही रोते।
तीन चार दिन लग जाते, चिट्ठी आने जाने में,
पाक चिट्ठी मन प्रसन्न,छाती से लगाकर सोते।।
बदल गया है अब युग, चिट्ठी गधे का सींग,
जैसे खत्म कर दी जन, सावन की अब पींग।
पर वो जमाना बेहतर था, बुजुर्गों ने भी झेला,
अब तो हर जन को बस,देखा फोन झमेला।।
आने वाली पीढ़ी, चिट्ठी सुनकर हँसा करेगी,
कागज पर कलम चलाने से, वो हरदम डरेगी।
पर बुजुर्ग भुला नहीं सकते, चिट्ठी का संदेश,
सदियों तक याद रहेगा, मेरा सुंदर भारत देश।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
हरा रंग
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विधा-कविता
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हरा रंग हरियाली का द्योतक,
सस्य धरती पर हो हरी भरी।
सब रंगों में नेक है यह रंग,
घस, दूध, फसल हरी हरी।।
सुग्राही रंग कहलाता हरदम,
घास पर चलो आंखों में दम।
खेत क्यार अगर पीले पड़ते,
जन को होता जमकर ही गम।।
हरियाणा में पार्टी की पगड़ी,
हरे रंग की धारण वे करते।
हरे रंग मेुं प्रकाश संश£ेषण,
हर प्राणी के कष्ट वो हरते।।
हरित क्रांति नाम पड़ा जब,
ई-बोरलोंग व नार्मन आये।
इतनी हरियाली धरा कर दी,
हरित क्रांति वो नाम कहाये।।
हरी पत्तेदार बाजार में मिले,
सब्जियां मन को लुभाती हैं।
वन्य जीव भी हरियाली ढूंढे,
हरियाली मन को तड़पाती है।।
सावन की जब बारिश होती,
चहुं ओर हरियाली छा जाये।
कृषक चले हल उठाके देखो,
हर इंसान के मन को हर्षाये।।
हरियाली हरे रंग का प्रतीक,
हर प्राणी के मन को लुभाये।
हरी डाल पर बैठकर पक्षी भी,
कितने ही सुरीले गीत सुनाये।
हरियाली से प्रेम जो करते हैं,
प्रकृति प्रेमी जग में कहलाते।
नहीं कभी घटने हरा रंग पाये,
हरे रंग जन जन को बहलाते।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
घर घर तिरंगा
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विधा-कविता
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रामराज का सपना दिल में है,
क्या अजब राज होगा वो चंगा।
आजादी की खशियां दिल में,
फहराएगा अब घर घर तिरंगा।।
वीरों ने कुर्बानी झेली हैं जब,
मिली तिरंगे की बड़ी सौगात।
घर घर में तिरंगा अब फहरेगा,
मदभावन बन गई यह हालात।।
अंग्रेजी सितम कितने सहे हैं,
अब भारतवासी आजाद हुये।
तिरंगा खुशी से फहराएंगे यूं,
कितने ही आंसू जन के बहे।।
घर घर तिरंगा फहरा देना,
आजादी का जश्र मनाएंगे।
वीरों की गाथा सुन सुनकर,
हर जन को यह सुनाएंगे।।
काश वो आकर देखे वीर,
मिट जाए उनकी तन पीर।
तिरंगा घर घर देखकर वो,
बनके नाचेंगे यूं रांझा हीर।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
तोल
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विधा-कविता
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गजब तमाशा देखते, कैसे कैसे लोग,
जिगर,दिमाग को तोलते,कैसा है रोग।
जिगर,दिमाग का संबंध मिलता बड़ा,
कहते हैं जगवाले इसको ही संजोग।।
जब तक दिमाग नहीं चलता कभी,
जिगर में नहीं बैठती जब कोई बात।
दोनों की जोड़ी बेहतर नहीं बनती है,
तब तक बनी रहती है बुरी हालात।।
तराजू के दो पलड़ों में कभी तोलो,
दिमाग और मस्तिष्क दोना बराबर।
दिल को बहुत सताता देखा गया है,
जब दिमाग में बैठ जाता कोई डर।।
विकसित देशों में अब तो चलता,
जिगर, मस्तिष्क का बड़ा व्यापार।
जिसके पास दोनों ही महान मिले,
उसे जहां में मिल जाता बड़ा प्यार।।
आओ स्वस्थ रखे जिगर, दिमाग,
दोनों बिना जीवन है जन अधूरा।
दोनों में अगर समन्वय मिल जाये,
जल्द से जल्द हो सब कुछ पूरा।।
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मौलिक/स्वरचित
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*होशियार सिंह यादव
वार्ड नंबर 1, मोहल्ला मोदीका
कनीना -123027
जिला-महेंद्रगढ़, हरियाणा
09416348400
तितली के संग
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विधा-कविता
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तितली के संग गीत सुनाऊं,
नृत्य करूं, संग में हर्षाऊं।
कभी अंबर,बागों में फिरती,
उनके संग नभ उड़ता जाऊं।।
तितली बागों में उड़ती है,
फूल फूल रस पीती रहती।
सुंदर उसकी पंख देखकर,
आंखें जन कहानी कहती।।
तितली के संग उड़ूं हवा,
मिल जा मन को आराम।
उड़ते रहना दिनभर यहां,
और नहीं कुछ भी काम।।
तितली के संग मिले चैन,
नहीं मिले तो रहता बेचैन।
एक डाल से दूजे ही जाती,
मिल जाये तन मन को चैन।।
तितली रानी बड़ी स्यानी,
कभी नहीं मांगे वो पानी।
उसका घर पूरा ही संसार,
होती नहीं कभी अज्ञानी।।
वो तितली घर में मिलती,
ये तितली मिलती जंगल।
खुश रहना इसकी आदत,
जंगल में भी कर दे मंगल।।
तितली के संग डाली पाऊं,
खुद हंसूं उसको भी हँसाऊं।
काम देख तितली प्यारी के,
अपने दिल के पास बुलाऊं।।
तितली कहती रहना है संग,
यह दुनिया है बड़ी ही जंग।
स्वार्थ भरा तन कूट कूटकर,
बदले पल ही पल में रंग।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
आंखों की आंखों से बातें
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विधा-कविता
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आंखों की आंखों से बातें,
जब कभी जन कहता है।
मन मंदिर में बस जाता है,
बस प्यार दिलों में रहता है।।
आंखों की आंखों से बातें,
चुपचाप चले ज्यों तीर चले।
कभी तलवार का सामना हो,
कभी दिलों में यूं प्यार पले।।
आंखों की आंखों से बातें,
मुमकिन है कुछ कर पाये।
दिल तो बेचारा खो बैठे हैं,
अब करते रहते हाय-हाये।।
आंखों की आंखों से बातें,
गूढ लगे और होती न्यारी।
समझने वाले समझ जाते,
जो समझे उसे लगे प्यारी।।
आंखों की आंखों से बातें,
कहती है एक मन कहानी।
दो दिल जब मिलते हैं तो,
करने लग जाते मनमानी।।
आंखों की आंखों से बातें,
नहीं कोई मुख कह पाता।
जब किसी वो मोड़ मिले,
तब वो सुनहरा दिन आता।।
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स्वरचित/नितांत मौलिक
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* होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
बरसते नैन
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विधा-छंदमुक्त कविता
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भीगी भीगी रात हो,
बरस रहे हो नैन,
दिल में एक आहट सुने,
कहीं मिले न चैन।
दूर गगन बरसात हो,
रिमझिम रिमझिम करे शोर,
दिल में एक दर्द पनपे,
वन जंगल में नाचे जब मोर।।
परदेश गये जिनके पीया,
सावन बैरी सताता है,
पीया मिले जब आन के,
दिल में चैन आता है।
सांझ सवेरे आहट हो,
बार बार मन झांके बाहर,
खुशी मिले जब मन को,
दीप जले तब घर घर।
बरसते नैन सदा कह रहे,
सावन सूखा न जाये,
नसीब मिले जिनके खुशी,
वो जन उतना पाय।।
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स्वरचित एवं नितांत मौलिक
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-डा होशियार सिंह यादव
कनीना, जिला-महेंद्रगढ़, हरियाणा
महज सांसों का रुक जाना
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विधा-कविता
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महज सांसों का रुक जाना,
मौत कभी नहीं जन मानते,
अहित करें इस जग में जो,
उसको ही मौत जन जानते।
महज सांसों का रुक जाना,
डर का देता है जन आभास,
जीना उसका असली जीना,
जो पाप, बुराई का करे नाश।
महज सांसों का रुक जाना,
नहीं होता है बुराई का अंत,
पाप कर्मों जगत से मिटा दो,
कह गये जग से कितने संत।
महज सांसों का रुक जाना,
मिट सकता नहीं जन नाम,
सत्य धर्म का नाश नहीं हो,
मधुर सुगंध फैलाना काम।
सांसे कभी भी बंद हो जाये,
राह में चलते चलते गिरता,
उसका अंत कभी नहीं जग,
जो असत्य से हरदम डरता।
सांसे जीवन भर चलती रहे,
दुख दर्द इंसान पर ना आये,
हर इंसान सुख भोगता मिले,
आपदाएं जन को ना रुलाये।
साहस भी आगे नहीं बढ़ता,
जब हिम्मत इंसान की घटे,
आगे इंसान यूं बढ़ता जाये,
ख्वाब हिलोरे यूं लेते रहेंगे,
बस सांसों की डोर ना बटे।
महज सांसों का रुक जाना,
लोग मानते है जिंदगी अंत,
पर मरकर जो नाम कमा ले,
आशाएं उभर आएंगी अनंत।
वो चेहरा
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विधा-कविता
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प्यारा बाल घर पे आया, जन को लुभाया,
रोता तो रोते थे, कभी उसने बहुत हँसाया।
चला गया वो भी एक दिन, भुला न पाते,
जब बच्चों को देखते, वो बच्चा याद आता।।
फूल सा चेहरा कभी कभी मन को लुभाए,
आओ अपनी दिनचर्या, सबको बड़ा बनाये
मिला नहीं बिछुड़ गया, याद आता है भारी,
वो चेहरा मासूम था, सभी उसे गले लगाये।
चेहरे से होती पहचान, चेहरा बढ़ाये शान,
चेहरे के सामने तो, फीका लगता है जहां।
कभी कभी चेहरा, भूल नहीं पाता इंसान,
कभी कभी सुंदर चेहरा, देता वो भगवान।।
दोस्त हमारा प्यारा था, चेहरा था सजीला,
बातें उसकी प्यारी लगे,नेत्र उसका गीला।
बिछुड़ गया एक दिन,याद आता वो चेहरा,
कैसे भूले उस चेहरे को, अजब नखरीला।।
हसीन सूरत प्यारी थी,वो राज दुलारी थी,
गरीबी ने साथ दिया,वो वक्त की मारी थी।
भूखी मरती चली गई, क्या हसीन चेहरा,
लगता थी कि देवता भी, देते आये पहरा।।
नेता का वो चेहरा,मोह लेता था जन को,
जीत चहुं ओर होती,घूमे जब अगहन को।
बुजुर्ग हो गया और चला गया,याद आए,
लाख भुलाना चाहते,भुला नहीं हम पाये।।
प्रेमिका का चेहरा देख, आवेश में प्रेमी,
गलियों के चक्कर काटे,बनकर वो बहमी।
उसको तो याद आए,बस वह इक चेहरा,
प्रेमिका का चेहरा देखने,करे गहमागहमी।
बिछुड़ गई वो भार्या, चेहरा आता याद,
कोई मिला दे उससे, यही है फरियाद।
वो चेहरा बड़ा निराला लगता था प्यारा,
चली गई छोड़कर, आती उसकी याद।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जि
नाराजगी
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विधा-कविता
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नाराजगी जग में बुरी,
करना सभी जन प्रीत।
प्रेम प्रीत से जो रहता,
दुनिया गाती है गीत।।
छोटी सी है जिंदगानी,
नहीं ले नाराजगी मोल।
कड़वी बातें बुरी लगे,
मुख पे हो सुंदर बोल।।
जाना है भाव से पार,
सजग सदा रहो तैयार।
लाख प्रयास जन करे,
प्रभु समक्ष होती हार।।
नाराजगी स्वजन कभी,
पापी, अधम कहलाए।
दोस्ती अपनों के संग,
खुद हँसे और हँसाये।
नाराजगी उचित ना हो,
बैर भाव को बढ़ाती है,
सादगी,नम्रता जन की,
सागर पार लगाती है।।
गैरों से जब नाराजगी,
कहते बुरी उसको संत।
लंबे समय नाराज रहे,
हो जाएगा जल्दी अंत।।
नाराजगी दर्द दे जाती,
प्यार दिल में जोश दे।
हर वक्त सम रहना हो,
कभी नहीं कोई पंगा ले।।
नाराजगी जन की देख,
कितने जाते लोग दूर।
उस दाता से सदा डरो,
करना नहीं कोई गरूर।।
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स्वरचित/मौलिक
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मुझे देखने दो
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विधा-कविता
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भारत का इतिहास पुराना,
सबने जाना सबने माना।
मुझे देखने दो क्या-क्या,
लोगों ने इसको पहचाना।।
मुझे देखने दो आगे बढ़के,
कौन दोस्त है कौन बेगाना।
किसे दिल के पास बुलाना,
किसको दिल से दूर भगाना।।
शिक्षा की बयार बह रही है,
नालंदा तक्षशिला नाम पुराना,
मुझे देखने दो, उस वक्त को,
क्या सुंदर हसीन था जमाना।।
भाव विभोर कर दे खुशियां,
गम को यूं ना पास बुलाना।
जब अंबर से बरसता पानी,
दिल बुनता नये ताना बाना।।
मुझे देखने दो नव युग को,
जिसके ठोकर में है जमाना।
खुशियों को अब कैद करो,
दुखों का बीता है मयखाना।।
सुबह शाम अंबर पे नजारा,
मन को लगता सूरज प्यारा।
इंद्रधनुषी रंग उपवन में हैं,
मुझे देखने दो,जग उजारा।।
नभ पर रात्रि चांद लुभाये,
तारे झिलमिल गीत सुनाये।
मुझे देखने दो, सुंदर नजारा,
दिल बाग बाग हो हषाये।।
बारिश हुई है आज सुहानी,
दादुर करते जाये मनमानी।
मुझे देखने दो ,भंवरों को,
टिड्डा गाये गीत जवानी।।
चहुं ओर फसल लहलहाये,
कृषक के वो मन को हर्षाये।
मुझे देखने दो, छवि निराली,
उस भव्यता को दिल बसाये।।
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स्वरचित/मौलिक
****
* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
तू मुझ में ही तो है
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विधा-कविता
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वक्त की बंदिशों ने बनाया कुछ ऐसा,
पहले जो आलम था नहीं अब वैसा।
एक दूजे के होते थे, अब लगते जुदा,
तू मुझ में ही तो है, देखों हूं मैं कैसा।।
पहुंचा प्रभु की चौखट दर्शन भी पाया,
ऐसा लगा आज दाता बड़ा मुस्कराया।
बोला प्रभु सुन ले, तू मुझ में ही तो है,
फिर क्यों न याद किया,यहां पर आया।।
माटी को जब लोंदा, समझ में यूं आया,
माटी ने हँसकर मुझको पास में बुलाया।
बोली माटी पुचकार के मुझे,सुन ले बात,
तू मुझ में ही मिलेगा,अंतिम दिन आया।।
हवा से करनी चाही जब मैंने हँसके बात,
सपनों की दिल से चल पड़ी मधुर बारात।
हवा ने कहा सुन तू भी अंश होता है मेरा,
तू मुझ में ही तो होगा,जब आएगी वो रात।।
झांका समुद्र में लगा चहुं ओर भरा है पानी,
आता है बुढ़ापा भी जब चली जाये जवानी।
कहा पानी ने पास बिठाकर,गर्व कभी न कर,
तू मुझ में ही तो होगा,कर ले चाहे मनमानी।।
एक रोज भार्या मुस्कराई और सामने आई,
पूछा क्या राज है मन में इतना जो मुस्कराई।
मत इतराओ इतना सुन ले आज यह पैगाम,
तू मुझ में ही तो बसती हो,छवि दिल बसाई।।
सर्दी के दिन थे जलाए बैठा था घर पे आग,
धुन निकली आग से, सुना डाला एक राग।
कहा अग्रि ने आज तू तप ले ले ले सहारा,
तू मुझ में ही तो होगा, तेरा शरीर मुझे प्यारा।।
देखा आकाश पर झिलमिल कर रहे थे तारे,
कितने ही चमक रहे थे जो कभी हुये हमारे।
आई एक रश्मि बोली सुन ले सुंदर सी बात,
तू मुझ में ही तो होगा, जब आये अंतिम रात।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
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