लघु कथा जल
बेटा रमेश, गला रुंध रहा है, सामने बोतल में पानी है, जल्दी से एक घूंट पानी पिला दो। मृत्यु शैया पर लेटे बलबीर ने धीमे स्वर में पुकारा।
...अभी लाता हूं, पिता जी। रमेश ने दौड़कर बोतल पानी की उठाकर एक गिलास में थोड़ा सा जल उड़ेला और अपने पिता को पकड़ाने की मुद्रा में कहा-लो पिता जी, ठंडा पानी। आप पानी पीओ तब तक मैं डाक्टर को बुलाता हूं। रमेश ने पुकारा।
...पिता जी, पिता जी, पिता..........इतना कहकर रमेश के हाथों से जल की बोतल छूट गई और रमेश फर्श पर सिर पकड़कर बैठ गया। अश्रु आंखों से बह निकले। हे भगवान! आपने यह क्या कर डाला। अब ही दिन सुख के आए थे और अब पिता जी को छीन लिया। जीवनभर संघर्ष करते करते पिता ने ये सुख के दिन दिए। जब सुख के दिन आए तो हमें असहाय छोड़ चिरनिद्रा में सो गए..... अब मैं क्या करूं, रमेश चिल्ला रहा था।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा***
बेटा रमेश, गला रुंध रहा है, सामने बोतल में पानी है, जल्दी से एक घूंट पानी पिला दो। मृत्यु शैया पर लेटे बलबीर ने धीमे स्वर में पुकारा।
...अभी लाता हूं, पिता जी। रमेश ने दौड़कर बोतल पानी की उठाकर एक गिलास में थोड़ा सा जल उड़ेला और अपने पिता को पकड़ाने की मुद्रा में कहा-लो पिता जी, ठंडा पानी। आप पानी पीओ तब तक मैं डाक्टर को बुलाता हूं। रमेश ने पुकारा।
...पिता जी, पिता जी, पिता..........इतना कहकर रमेश के हाथों से जल की बोतल छूट गई और रमेश फर्श पर सिर पकड़कर बैठ गया। अश्रु आंखों से बह निकले। हे भगवान! आपने यह क्या कर डाला। अब ही दिन सुख के आए थे और अब पिता जी को छीन लिया। जीवनभर संघर्ष करते करते पिता ने ये सुख के दिन दिए। जब सुख के दिन आए तो हमें असहाय छोड़ चिरनिद्रा में सो गए..... अब मैं क्या करूं, रमेश चिल्ला रहा था।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा***
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