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विधा-कविता
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जाने क्या हो जाये,जिंदगी इंसान की।
जरूरत सख्त मिले, जन पहचान की।।
योग्य भी अयोग्य हो,वक्त की मार पे।
नहीं पता कब लगे,बाजी इस जान की।।
जाने क्या होगी, भविष्य की संस्कृति।
आज के दिन आ गई, अनेक विकृति।।
संस्कार में नाम था, भारत के देश का।
बदल गई इंसान की, आज देख प्रकृति।।
जाने क्या होगा, धरा से जल घट गया।
दिनोंदिन बढ़ गया, जन पैतरा एक नया।।
बचा लो धरा जल,वरन मचे हा-हाकार।
देव,दानव, संत सब, कर रहे हैं ये बयां।।
जाने क्या होगा, इंसान की जग आदत।
हालात होते जा रहे, बद से भी ये बद।।
आदतों को सुधारना,होता जन का फर्ज।
लिख जाएगा जग में,अपनी वो इबादत।।
जाने क्या होगा, पेट्रोल भी जग घट रहा।
तेल स्रोत घटते जा रहे, पूरे ही इस जहां।।
बचत करने की आदत,नहीं डाले इंसान।
आज इंसान पहुंचा है, कहां से भी कहां।।
जाने क्या होता, जब इंसान घटे जिंदगी।
बोलते तक नहीं, कैसी मिलती है बंदगी।।
अपने हाथों पैरों पर, इंसां मरता कुल्हाड़ी।
चहुं ओर देख लेना, बढ़ा दी जन गंदगी।।
जाने क्या होगा, जब हो तृतीय विश्व युद्ध।
पाषाण युग लौट आये,जब जन होगा क्रुद्ध।।
परमाणु के ढेर पर, बैठा है सारा ही जहान।
आज के दिन चाहिए, गांधी और संत बुद्ध।।
जाने क्या होगा, जग आपसी भाईचारे का।
रंजिश में डूब रहा, साहस घटा बेचारे का।।
प्रेम,प्रीत,सद्भाव, बढ़ा देते जन का सम्मान।
रोटी, भीख नहीं मिले, साधु संत द्वारे का।।
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स्वरचित/नितांत मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
हंगामा
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कविता
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हंगामा जो कर रहे, ज्ञान से कोसों दूर।
उल्टी बातें कर रहे, जिनके मन गरूर।।
सत्य के मार्ग पर चले, बढ़ जाती शान।
धैर्यवान जो लोग हैं,सह सकते अपमान।।
जहां देखो हो रहा, हंगामा इस संसार।
बेबात की बात करे, नहीं मिले आधार।।
संयम से जो काम ले, बुद्धिमान है जान।
बुजुर्ग समक्ष जो झुके, बढ़ जाता सम्मान।।
हंगामा नहीं उचित, गांव हो या हो शहर।
आपसी मनमुटाव बढ़े, बैर का फैले जहर।।
कभी कभी हंगामा, बरपा सकता है कहर।
पर हंगामा होता है, दिन के आठों ही पहर।।
हंगामा नहीं होता,समस्या का इक समाधान।
अच्छी प्रकार से जानता, पूरा ही यह जहान।।
शांत भाव से रहना, इंसानियत की पहचान।
सच का दामन थाम ले, वो जन हो महान।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा

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