Friday, July 31, 2020





दोहा

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फेल हुये घबरा नहीं, कर लो सतत प्रयास।
हिम्मत कभी न हारिये, सदा पास की आस।।

आकर्षण परिणाम है, सुख दुख का संसार।
बस तन का सुख भोगते,इसे कहे जन प्यार।।

जंदा दुश्मन छोडऩा, बहुत बड़ी है भूल।
जब आये वो सामने, लगता जैसे शूल।।

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*होशियार सिंह यादव

शब्द-सतत
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फेल हुये घबरा नहीं, कर लो सतत प्रयास।
हिम्मत कभी न हारिये, सदा पास की आस।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

शब्द-आकर्षण
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आकर्षण परिणाम है, सुख दुख का संसार।
बस तन का सुख भोगते,इसे कहे जन प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

आकर्षण परिणाम है, सुख दुख का संसार।
बस तन का सुख भोगते,कहते इसको प्यार।।

आकर्षण परिणाम है, सुख दुख का संसार।
बस तन का सुख भोगते,नाम दिया है प्यार।।



शब्द-आकर्षण
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आकर्षण परिणाम है, सुख दुख का संसार।
नमन दोहा धुरंधर
शब्द-आकर्षण
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आकर्षण परिणाम है, सुख दुख का संसार।
बस तन से सुख भोगते,नाम दिया जन प्यार।।





विषय-ख्वाहिशें
विधा-कविता
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जन्म लिया इंसान ने
होती जीने की आस,
ख्वाहिश हो जन की
धन-दौलत हो पास।

सुंदर हो एक बंगला
नौकर करते हो काम,
दूर दराज तक देश में,
अपना एक हो नाम।

घर में जब मैं जाऊगा,
आगे पीछे सब नौकर,
चाय मेज पर रखी हो
जब उठता मैं सोकर।

सुंदर सी एक बीवी हो,
सेवा करती हो दिनरात,
ख्वाहिश होती दिल की
आये नहीं दुख की रात।

घर में दूध, घी ,मक्खन,
बने घर विभिन्न पकवान,
जगत में  फैले नाम मेरा
शाही ठाठ बाट व शान।

पढ़े लिखे घर हो बच्चे,
गाये हर दिन गीता सार,
ख्वाहिश मेरे  दिल की,
घोड़े सैर को मिले तैयार।

लंबा चौड़ा खेत हो मेरा,
चारों ओर महके गुलाब,
ख्वाहिश मेरे दिल की है
यूं महकता मिले शबाब।

धन दौलत के भंडार हो,
गाये ये पक्षी राग मल्हार,
बारिश रिमझिम पड़ रही
पले पूरे जगत का प्यार।

पहनने को नये वस्त्र हो,
मिलने आये दोस्त हजार,
ख्वाहिशें पूरी कैसे होंगी,
बढ़ता ही जायेगा खुमार।

आयेगा फिर वो सवेरा,
संकट सारे हो जाए दूर,
ख्वाहिशें दिल की मिटे
नहीं रहेगा फिर गरूर।।

Thursday, July 30, 2020


नमन

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परिचय उनका दीजिये, जग को होता नाज।
ईश्वर घट-घट में बसे, तीन लोक में राज।।
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-

29 जुलाई 2020

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सता नहीं मॉँ बाप को, जन्म दिया अनमोल।

खाना गर देता नहीं, वचन मधुर ले बोल।।

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-
28 जुलाई 2020
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मौसम को भी मात दे, बदले जब इंसान।
भेड़ रूप में भेडिय़ा, कैसे हो पहचान।।
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27 जुलाई 2020
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किसको जग में निज कहे, कौन सुने मन बात।
जालिम दुनिया कर रही, अपनों पर ही घात।।

शब्द-रिमझिम
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सावन की छाई घटा, रिमझिम पड़े फुहार।
चातक नभ को ताकता, है बूंदों से प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,जिला महेंद्रगढ़,हरियाणा


दोहे
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चंचल नारी चॉँद सी, करती रहे विभोर।
पिया मिलन की आश में, पायल करती शोर।।

गौरी चित से सोचती, धरा पर घटा प्यार।
साजन सजनी दूर हैं, सावन करे पुकार।।

पायल गौरी चांॅंद सी, चंचल चित आधार।
पिया मिलन को सोचती, रूठा जाये प्यार।।
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जरा सुनो
**-*****

दूसरों को दुख देकर कुछ इंसान सुखी रहना चाहते हैं जो उनकी बड़ी भूल है। दूसरों के खुशी से इंसान खुश रह सकता है।
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-जुलाई 2020
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हॅँसी खुशी मन में भरे, जब आते त्योहार।
भाईचारा एकता, और बढ़ेगा प्यार।।

राखी धागा मानते, अमोघ है हथियार।
झुके यमराज सामने, भाई बहना प्यार।।

परिचय उनका दीजिये, जग को होता नाज।
ईश्वर घट-घट में बसे, तीन लोक में राज।।
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त्योहार
तीज त्योहार दे रहे, खुशी का पैगाम।
हॅँसते गाते ले मना, वरना होगी शाम।।

हॅँसी खुशी मन में भरे, जब आते त्योहार।
भाईचारा एकता, और बढ़ेगा प्यार।।
राखी
बहना भाई से कहे, आया है त्योहार।
हाथ पर राखी यूं खिले, ज्यों भाई बहन प्यार।।

राखी धागा मानते, अमोघ है हथियार।
झुके यमराज सामने, भाई बहना प्यार।।

रक्षा बंधन
रक्षा बंधन पर्व है, भाई बहना प्यार।
हंस ले गा ले आज तू, होगी कभी न हार।।


रक्षा बंधन पर्व है, भाई बहना प्यार।
राखी बाजू पर सजे, आशीर्वाद हजार।।
नमन दोहा संवाद
दोहा
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लोक लाज अब घट रही, बदले पल में रंग।
पाप कर्म में डूबते, जन मिलते बदरंग।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,
हरियाणा

नमन ************************
परिचय उनका दीजिये, जग को होता नाज।
ईश्वर घट-घट में बसे, तीन लोक में राज।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,
हरियाणा


शब्द-परिचय
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परिचय उनका दीजिये, जग को होता नाज।
ईश्वर घट-घट में बसे, तीन लोक में राज।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,
हरियाणा


शब्द-तुलसी
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जिस घर में तुलसी लगे, मिटे रोग संताप।
देव कोण ईशान है, करो बैठकर जाप।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,
हरियाणा

त्योहार
तीज त्योहार दे रहे, खुशी का पैगाम।
हॅँसते गाते ले मना, वरना होगी शाम।।

राखी
बहना भाई से कहे, आया है त्योहार।
हाथ पर राखी यूं खिले, ज्यों भाई बहन प्यार।।


रक्षा बंधन
रक्षा बंधन पर्व है, भाई बहना प्यार।
हंस ले गा ले आज तू, होगी कभी न हार।।







मित्रता 



 विधा-कविता
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जग में मिलने हजारों जन,
पर कुछ में  बड़ी पवित्रता,
दर्द मिटाके, सुख का दाता,
कहलाती है सच्ची मित्रता।

एक है दोस्त, दूजा दुश्मन,
दोनों में जरा करलो मंथन,
दोस्त चाहे  सदा ही भला,
दुश्मन चाहे काट दूं गला।

दुश्मन के  दिल में नफरत,
चाहे वो जन की हो दुर्गत,
सदा करता रहे उल्टे काम,
यूं होता है जग में बदनाम।

दोस्त के दिल में बहे बयार,
खुद दुख में देता सच्चा प्यार,
दोस्त मिल जाएं कई हजार,
सच्चे मित्र मिले बस दो चार।

मित्र वहीं है मित्रता निभाए,
दुख पहाड़ सम, वो  हंॅँसाए,
सदा ही गले से वारे लगाये,
कुर्बानी दे दे, नहीं घबराये।

सच्ची मित्रता सुनने मिलती,
सुन दोस्ती कलियां खिलती,
ईश्वर भी देखे, जोड़ी ,प्यारी,
दोस्ती नहीं है कभी दोधारी।

सच्ची मित्रता कृष्ण-सुदामा,
युगों युगों तक रहेगा ये नाम,
जब -जब बात सुदामा चले,
याद आयेंगे तब-तब श्याम।

सच्ची मित्रता राधा श्याम की,
रहेगा इसका गवाह इतिहास ,
राधा,गोपियां,श्रीकृष्णजी की,
दिल में महकेगी सदा सुबास।

पोरस-सिकंदर बनी थी दोस्ती,
जगमग करेगी, हर दिल जवां,
अति कष्ट झेले कर्ण महाभारत,
फिर भी कौरव हो गये स्वाह।

चाणक्य चंद्रगुप्त की थी दोस्ती,
नंदवंश करवाया पल में साफ,
जिस दुष्ट से चाणक्य भिड़े थे,
नहीं किया उसको कभी माफ।

दोस्ती त्रिजटा और सीता की,
दोस्ती रही  गांधारी कुंती की,
दोस्ती  पृथ्वीरात  चंद्र प्रमाण,
गौरी मारा तीर न चूका चौहान।
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Wednesday, July 29, 2020


विषय-कच्चा मकान
विधा-कविता
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होते थे कच्चे मकान, मन के जन थे पक्के,
समय बदला आज है,जन बन गये कच्चे,
धीरे धीरे खत्म हो गए, हो गया विकास,
इंसान का अब हो चला, मानो सर्वनाश।

कच्चे घर फूस के, चिडिय़ां करती बसेरा,
बारिश में आनंद से,खुशियों का था डेरा,
चिडिय़ां जन को जगाती, जब हो सवेरा,
सोते रहते पक्कों में, सुबह शाम नहीं बेरा।

सर्दी में थोड़ा दर्द था, गर्मी में था आराम,
एसी/कूलर सी हवा , देते थे सुबह शाम,
सरकंडों से छत बने,मन को था एक चैन,
पक्के मकान हो गये, तरसते  हवा को रैन।

माटी के थे कच्चे मकान, बारिश का डर,
झोपड़ पट्टी नाम था, कहते नहीं उन्हें घर,
आंधी बारिश में गिरे,  दबकर नहीं मरते,
पक्के कहीं न गिर जाए, इसी बात से डरते।

नहीं रहे नहीं मिले,ढूंढे से अब कच्चे घर,
पक्के मकानों में अब, गर्मी सर्दी का है डर,
बहुत खर्चीले हो गये,अब के पक्के मकान,
कच्चे दिल के रह रहे,समझते अपनी शान।

आयेगा फिर लौट,  एक दिन बीता जमाना,
लाख गुणा अच्छे थे कच्चे,हर जन ने माना,
पर अब देर हो चुकी है, इंसान ने पहचाना,
कुत्ते, बंदर,बिल्ली शोर, पक्कों में




है जाना।

झोपड़ पट्टी मिल जाती, बड़ बड़े होटल में,
झुंड,पान्नी,मूंज, जेवड़ी, खो गई दलदल में,
आधुनिकता की होड़ में, खो रहा है इंसान,
बहुत काम के कच्चे मकान,अब तो ले मान।।
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कच्चा मकान
विधा-कविता
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होते थे कच्चे मकान, मन के जन थे पक्के,
समय बदला आज है,जन बन गये कच्चे,
धीरे धीरे खत्म हो गए, हो गया विकास,
इंसान का अब हो चला, मानो सर्वनाश।

कच्चे घर फूस के, चिडिय़ां करती बसेरा,
बारिश में आनंद से,खुशियों का था डेरा,
चिडिय़ां जन को जगाती, जब हो सवेरा,
सोते रहते पक्कों में, सुबह शाम नहीं बेरा।

सर्दी में थोड़ा दर्द था, गर्मी में था आराम,
एसी/कूलर सी हवा , देते थे सुबह शाम,
सरकंडों से छत बने,मन को था एक चैन,
पक्के मकान हो गये, तरसते  हवा को रैन।

माटी के थे कच्चे मकान, बारिश का डर,
झोपड़ पट्टी नाम था, कहते नहीं उन्हें घर,
आंधी बारिश में गिरे,  दबकर नहीं मरते,
पक्के कहीं न गिर जाए, इसी बात से डरते।

नहीं रहे नहीं मिले,ढूंढे से अब कच्चे घर,
पक्के मकानों में अब, गर्मी सर्दी का है डर,
बहुत खर्चीले हो गये,अब के पक्के मकान,
कच्चे दिल के रह रहे,समझते अपनी शान।

आयेगा फिर लौट,  एक दिन बीता जमाना,
लाख गुणा अच्छे थे कच्चे,हर जन ने माना,
पर अब देर हो चुकी है, इंसान ने पहचाना,
कुत्ते, बंदर,बिल्ली शोर, पक्कों में यह है जाना।

झोपड़ पट्टी मिल जाती, बड़ बड़े होटल में,
झुंड,पान्नी,मूंज, जेवड़ी, खो गई दलदल में,
आधुनिकता की होड़ में, खो रहा है इंसान,
बहुत काम के कच्चे मकान,अब तो ले मान।।
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विषय-छंदमुक्त
विधा-कविता
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चला जा रहा,
कुछ अता ना पता,
कमर झुकी थी,
लिये हाथ में लाठी,
कभी इधर तो उधर,
सोच कमजोर
दिमाग पर लगा जोर
नहीं आया याद
पूछा राहगीर से
मुझे जाना कहा?
मैं कहां से आया हूं
मेरा ठिकाना कहा,
समझा मुसाफिर
बुढ़ापे की निशानी
सभी में आनी।
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Tuesday, July 28, 2020


विषय-क्रांति
विधा-छंद   दोहे
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क्रांति दिल में फूटती,
करे हाथ से वार।
सपना दिल में रख सदा,
मिले जहॉँ का प्यार।।

दुष्ट रुलाये जब कभी,
कष्ट देता हजार,
क्रांति दिल में जन्म ले,
करे पूरी उधार।।

सहे अंग्रेज मार तो,
चले उठा तलवार।
क्रांति देखी दुष्ट ने,
मानी पल में हार।।

गांधी, सुभाष देखकर,
विदेशी गये हार।
क्रांति के इस दौर में,
भगत मिला जग प्यार।।
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दोहा शब्द-मौसम
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एक तरफ इंसान है, आज हुआ बदरंग।
दूजे मौसम नाम है, पल में बदले रंग।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा




 पहली मुलाकात
विधा-कविता
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सोचा था चलो, देख आयेंगे शहर,
रुकेंगे वहा पर, खाना खाएं दोपहर,
अलबत्ता चार पांच हम, हुये सवार,
आपस में हंसते,पहुंचे थे शहर द्वार।

वर्ष 2000 की गर्मी, सताती रही घोर,
मृग मरीचिका दूर तक, नहीं था शोर,
मुरझाये से पेड़ लगे,  रुकते हम जाये,
कहीं पहाड़,कही रास्ता,घाटी से आये।

सुबह चले अलवर को,  दूरी कोस सौ,
गाड़ी जा रही तेज, 




कर रही थी पौ पौ,
कहीं रास्ते में पीया पानी, बढ़े थे आगे,
गर्मी में नींद आये, सोये कभी हम जागे।

जाना था जहां पहुंचे, उससे थोड़ा आगे,
जब देखा शहर आया, नींद से हम जागे,
जिस घर हमें जाना था,वो पीछे रह गया,
वर्षों बाद आये थे शहर,लगता नया नया।

पूछकर किसी से वापस, मोड़ चल दिये,
भूख लगी जोर की, खाने को कुछ लिये,
आखिर चालक ने कहा, देखो घर आया,
कहा हमने यह घर, मुश्किल से है पाया।

दस्तक दी दरवाजे पर, जन बाहर आया,
दिया परिचय अपना, वो जन मुस्कुराया,
दरवाजा खोला उसने, अंदर हमें बैठाया,
देखा घर बाहर तो, हमें तो पसंद आया।

मच गया शोर लो, मेहमान घर में आया,
कोई पानी ले आया,कोई खाना ले आया,
बारी बारी दे परिचय,फिर उसको बुलाया,
लेकर हाथों में पानी, एक मूर्त ने लुभाया।

पीकर पानी निहारा, कभी पैर कभी हाथ,
यही थी भावी पत्नी, हुई पहली मुलाकात,
सोचा कि अब पकडऩा, बस इनका हाथ,
मन में बस गई थी वो, होने को आई रात।

लेकर हमने विदाई,  चल पड़े घर की ओर,
पहली मुलाकात को, गाते रहे अंतिम छोर,
पहुंचे घर पर घायल, कहा यह शादी पक्की,
शादी के बंधन में बधे, कहलाएं हम लक्की।।

Monday, July 27, 2020


विषय-बेवजह वह खपा हो गए

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विधा-कविता
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अपना उन्हें मानकर, करते आए वफा,
दिन रात एक किया, फिर भी हैं खफा,
वफा करते करते, दर्द में रोकर सो गये,
खता न कोई,बेवजह वह खपा हो गए।

प्यार किसी से हो बुरा, जग की है रीत,
जितनी से काम चले, उतनी बहुत प्रीत,
जग मयखाना है, जहां खा पीके सो गये,
कोई खता न,बेवजह वह खपा हो गए।

दोस्त आज दोस्त नहीं, दे जाते हैं धोखा,
छुरी बगल में रखकर, देखते रहते मौका,
अपनों की क्या बात, वो बेवफा हो गये,
खता न कोई, बेवजह वह खपा हो गए।

बहुत दर्द छुपा रखा, दिल भी है घायल,
जब दिल के टुकड़े हो, खनकाती पायल,
बस उनके लिए बेवफा भी, वफा हो गये,
खता ना कोई, बेवजह वह खपा हो गए।

खेलकूद में बीताये सारे,मधुर सुहाने दिन,
अब बुरा वक्त आया, बीते दिन गिन गिन,
किस पर विश्वास करे, साथी सब नये नये,
खता ना कोई, बेवजह वह खपा हो गए।

अब तो बनाना आशियाना, मिलेगी डगर,
जीवन लंबा झेल चुके, अभी बहुत सफर,
सफा जिंदगी के काटकर,हम तो ऊब गये,
साथी साथ छोड़,बेवजह वह खपा हो गए।

जिनको माना अपना था,वो भी रूठ गये हैं,
सोच सोचकर जगत की आंसू खूब बहे हैं,
दुश्मन तो दुश्मन होते हैं, दोस्त दुश्मन भए,
खता नहीं हुई है,बेवजह वह खपा हो गए।

आओ अब दुश्मनी भुला दे, बन जाए मीत,
दो कदम तुम चलोगे तो, बढ़ जाए मन प्रीत,
खुशियों के दिन थे जो, वो कैद ही बन गए,
न जाने क्यों साथी बेवजह वह खपा हो गए।

मौसम भी भीगा भीगा, पड़ती सावन फुहार,
एक बार तुम आ जाओ, आ जायेगी बहार,
मान भी जाओ जालिम , क्यों जुदा हो गये,
खता कोई नहीं, बेवजह वह खपा हो गए।









मंदिर
विधा-दोहे
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मन को मंदिर मान के, करो सदा शुभ काम।
गरीब मनुष्य धाम है, सेवा से हो नाम।।
*
मंदिर माता मान लो, पूजा करना रोज।
लंबा जीवन पाइये, हर पल होगी मौज।।
*
पूजा मंदिर कर सदा, नेक करो फिर काम।
नहीं पता किस मोड़ पे, हो जाएगी शाम।।
*
नाम कमाओ लाख गर, थोड़ा कर लो दान।
मंदिर जाओ रोज ही, बढ़े सदा ही मान।।
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दोहा
27 जुलाई 2020
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पानी जन को सीख दे, मत ना करना बैर।
बहते जल में गिर गये, कर बचने की खैर।।
*****
--होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

मास्क लगा लो खींचके, बचना है गर रोग।
धूल,रोगाणु ना घुसे, जीवन रहे निरोग।।
*****
-होशियार सिंह यादव, लेखक,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

जरा सुनो
********

भूख के कई प्रकार हैं किंतु सबसे खतरनाक भूख पेट की होती है जो न मिटने की स्थिति में इंसान हिंसक बन जाता है।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा


 छंद मुक्त लेखन
दिनांक 27 जुलाई 2020
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लेखनी

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लेखनी की ताकत कभी छुपती नहीं।
लेखनी की ताकत कभी झुकती नहीं।।
वो लेखक ही क्या जो स्पष्ट नहीं लिखे,
लेखनी की ताकत कभी बुझती नहीं।।
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दोहा-आक्रोश
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कोड़ी कोड़ी जोड़ता, जन रहकर खामोश।
कोई धन को छीनता, बढ़ जाए आक्रोश।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा-

दोहा-
धर्म कर्म की बात पर, जन रहता खामोश।
देश लूटकर भागता, तब आए आक्रोश।।

कोड़ी कोड़ी जोड़ता,जन रहता खामोश।
धन पर डाका जब पड़े, तब पनपे आक्रोश।।

कोड़ी कोड़ी जोड़ता, रहकर जन खामोश।
कोई धन को छीनता, तब आए आक्रोश।।

कोड़ी कोड़ी जोड़ता, रहकर जन खामोश।
कोई धन को छीनता, बढ़ जाए आक्रोश।।

दोहा 2020
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चिंता चिता समान है, कर देती है अंत।
मन को शांत राखिये, जग में कहते संत।।

समाचार बिना जन सदा, रहता है अज्ञान।
पढ़े खोलकर देश की, मन मिटता अज्ञान।।

सावन रिमझिम कर रहा, गाये भोले गीत।
दादुर सुर की तान तो, लगती है संगीत।।

Sunday, July 26, 2020


विषय-तारीख
विधा-कविता
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**************************************
हर वक्त बदलता है, तकदीर बदलती है,
देश बदलता है,  हर तस्वीर बदलती है,
समय कभी नहीं रुका, ना रोका जाएगा,
तारीख गवाही दे, हर दिन नया आएगा।

इतिहास के पन्नों पर, लिखी है दास्तान,
मूक गवाह बनकर, करती वक्त पहचान,
जो चल गये जग से, वो वक्त तारीख है
जो आयेगा जग में, उसकी फिर शान है।

जीना मरना की, एक  निश्चित तारीख है,
समय सदा चलता है,, उसकी तारीफ है,
कोर्ट कचहरी में, जब मिलती तारीख है,
आएगी एक दिन वो,  उसकी तारीफ है।

तारीख पर सारा जग, सिमट ही जाता है,
तारीख नहीं लगती तो, जन दुख पाता है,
मुकरना तारीख है,  तो मिलना बारिश है,
तारीख निशाना है, बस दिल से लगाता है।

कभी वो तारीख थी, आज यह तारीख है,
सदा चलते रहना है, वो तारीख बारिश है,
फूल, कली, खिलते, बन जाती तारीख है,
महीने में तारीख हैं,पूरी साल में बारिश है।

सदा रही है चलती, इसे चलते ही जाना है,
जो बीत गई तारीख,दिन,वापस न आला है,
जैसे जन जीवन भी,  बस आना व जाना है,
ले दौड़ वक्त के साथ, अगर ज्यादा पाना है।

समयुग,त्रेता,द्वापर गये, संधिकाल शुरुआत,
आएगा कलियुग फिर, ले तारीख एक साथ,
हाथ बंधे चले जाएगा,तारीख लिख जाता है,
तेज समय चलता,बस यह तारीख बताता है।

हर घटना टिकी की तारीख लिखी जगत में,
सोच समझ कर चल,इंसान तू कर ले काम,
समस्त ब्रह्मांड की तारीख,  यह ले पहचान,
समय के साथ ना चला, मिट्टी में मिले शान।

आओ बनाए मिलकर हम, एक आशियाना,
समय तारीख अनुसार सदा चलता ही जाए,
दौड़े समय, तारीख के संग, ,अगर मिलकर,
दर्द मिटे सभी के, हंसे हम और जग हंसाये।।
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*होशियार सिंह यादव



विषय-तारीख
विधा-कविता
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हर वक्त बदलता है, तकदीर बदलती है,
देश बदलता है,  हर तस्वीर बदलती है,
समय कभी नहीं रुका, ना रोका जाएगा,
तारीख गवाही दे, हर दिन नया आएगा।

इतिहास के पन्नों पर, लिखी है दास्तान,
मूक गवाह बनकर, करती वक्त पहचान,
जो चल गये जग से, वो वक्त तारीख है
जो आयेगा जग में, उसकी फिर शान है।

जीना मरना की, एक  निश्चित तारीख है,
समय सदा चलता है,, उसकी तारीफ है,
कोर्ट कचहरी में, जब मिलती तारीख है,
आएगी एक दिन वो,  उसकी तारीफ है।

तारीख पर सारा जग, सिमट ही जाता है,
तारीख नहीं लगती तो, जन दुख पाता है,
मुकरना तारीख है,  तो मिलना बारिश है,
तारीख निशाना है, बस दिल से लगाता है।

कभी वो तारीख थी, आज यह तारीख है,
सदा चलते रहना है, वो तारीख बारिश है,
फूल, कली, खिलते, बन जाती तारीख है,
महीने में तारीख हैं,पूरी साल में बारिश है।

सदा रही है चलती, इसे चलते ही जाना है,
जो बीत गई तारीख,दिन,वापस न आला है,
जैसे जन जीवन भी,  बस आना व जाना है,
ले दौड़ वक्त के साथ, अगर ज्यादा पाना है।

समयुग,त्रेता,द्वापर गये, संधिकाल शुरुआत,
आएगा कलियुग फिर, ले तारीख एक साथ,
हाथ बंधे चले जाएगा,तारीख लिख जाता है,
तेज समय चलता,बस यह तारीख बताता है।











जरा सुनो
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तूफान भी अगर आ जाये तो डटकर मुकाबला करना चाहिये, न जाने कौन सा उकाब जान बचा दे।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

देश  तरक्की  कर  गया , बढ़ा  ज्ञान  विज्ञान ।
कुर्बानी   देकर   मिली , आजादी   की  शान ।
आजादी  की  शान , फौज  ने  नाम  कमाया ।
देकर   अपनी   जान , देश  आजाद   कराया ।
किया कुशल व्यवहार ,मित्रता कर ली पक्की ।
है  शिक्षा  में   नाम , कर  गया  देश  तरक्की ।।

उपवन  तो  अब  घट रहे , बढ़ी आपदा आज ।
होगा  जीवन  अंत  तो ,  मिटे  धरा  का  राज ।
मिटे   धरा   का  राज ,  बढ़ेगी  आफत  भारी ।
देख   हवा  में    दोष ,  डरे   सारे   नर   नारी ।
पेड़   करें   सिंगार , बने   तब  धरती   पावन ।
हरे   भरे   ही   रहें ,धरा   के   सारे    उपवन ।।

Saturday, July 25, 2020



विषय-परोपकार की परिभाषा
विधा-पद्य
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परोपकार जग में भला,कर लो दिनरात,
तन मन धन अर्पित करे, हो बड़ी बात,
मरते हुये जीवन दे, रखे जन से आशा,
परहित ख्याल करे, परोपकार परिभाषा।

देशभक्त जग में हुये, करे देश की सेवा,
जीवन कुर्बान कर दे, नहीं चाहिए मेवा,
पेड़ पौधे, नदियां भी,करते जन उपकार,
इंसान को चाहिये, कर उनका हितकार,

देव,भक्त,वीर,दानी,पूरा भरा है इतिहास,
अपनी जिंदगी देकर, किया काज खास,
दुष्ट,पापी, नीचों को,  देव करते विनाश,
गरीबों को जग में, हितकर जन से आस।

कवि,लेखक,पत्रकार हुये, परोपकार कर्म,
सच का मार्ग ना छोड़ा,जान जाए वो धर्म,
जान अपनी दे गए, लिख गये हैं इतिहास,
उनके बस कर्मों में,जनहित बात थी खास।

पेड़ फलों से जन का, करता सदा उपकार,
नदियों, नाले, जल से, करते जन से प्यार,
इंसान ऐसा जीव है, समझता नहीं उपकार,
सोच सोच मन उदास, दिल  जाता है हार। 

परोपकार की परिभाषा, समझे जब इंसान,
तक ही पूरे जग में, होगी जन की पहचान,
जो उपकारी जगत में,समझे उनका उपकार,
जीवन सुंदर बन जाए, मिले जन जन प्यार।।
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विधा-कविता
विषय-कोयल
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कोयल गाती गीत सुहाने,मन को करे विभोर,
बागों में बहार आती, सावन बरखा करे शोर,
मिश्री कानों में घुलती,बागों में नृत्य करे मोर
काले काले बादल आये, छायी घटा घनघोर।

बसंत बहार में फूल खिले, आ जाती बहार,
मन बाग बाग होता, प्रेमी की आंखें हो चार,
भंवरे गूंजन करते हैं, जब होती कली तैयार,
लुक्का छिपी करते, चकवा संग चकवी प्यार।

कोयल मतवाली होती, रंग बेशक हो काला,
बागों में कूकती, कौवा के  मुंह लगता ताला,
प्रकृति छटा बिखेरती, सूरज गर्मी दे उजाला,
तन मन निखरे नर नारी, फेरे प्रेम की माला।

एक छोटा सा पक्षी है, मन को करता प्रसन्न,
एक मानव की वाणी से, दर्द उठता तन मन,
निज वाणी कोयल सी बने, करो ऐसा उपाय,
धन के पीछे भागता है, करता है हाय-हाय।।







यादों की बारात
विधा-सायली
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1.
यादों
की लेकर
बारात को जब
पहुंचे घर
द्वार।

2.
यादो
की बारात
निकले घर द्वार
मिलेगा साजन
प्यार।

3.
घर
से निकली
यादों की बारात
हो गई
रात।
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नमन
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झूला झूले नारियां, लेती झोले जोर।
सावन पावन माह में, टिड्डे करते शोर।।
टिड्डे करते शोर , मोर नाचे बागों में।
सुनो मेघ मल्हार , श्रेष्ठ होता रागों में।।
टप टप बूंदें देख ,सखी क्यों साजन भूला।
देखी भागम भाग , बाग में छोड़ा झूला।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


कुंडली नंबर 01

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झूला झूले नारियां, लेती झोले जोर।
सावन पावन माह में, टिड्डे करते शोर।।
टिड्डे करते शोर, नाचे बागों में मोर।
छाये बादल खास, आसमान बिजली घोर।।
बरसती बूंद देख, नवेली साजन भूला।
मच गई भागदौड़, छोड़ बागों में झूला।।
**************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


दोहे
विषय-ईश्वर/दाता/रब
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जग से टूटे प्यार तो, रब का मिलता साथ।
जन भूले वो भूलता, न होने दे अनाथ।।

नाता प्रभु से जोडिय़े, जीवन में दे साथ।
मानव से मन ले हटा, दाता पकड़ों हाथ।।

सच्चा जग में मान ले, दाता का है नाम।
झूठी होती रीत हैं, ईश्वर करता काम।।
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Friday, July 24, 2020

जरा सुनो
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इंसान का व्यवहार बारिश जैसा होना चाहिए चूंकि बारिश जब आती है तो हर जन प्रसन्न कर देती है।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा-

प्रदत्त पंक्ति-
राम मंदिर प्रतीक राष्ट्रीय स्वाभिमान का
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राम मंदिर है भारत की आन बान शान का।
राम मंदिर प्रतीक राष्ट्रीय स्वाभिमान का।।
आदर्श पुत्र  राम को  पूरा जगत  जानता,
राम मंदिर को मानो विश्व की पहचान का।।
**************************

*होशियार सिंह यादव







 


शिक्षा-
**
शिक्षा तन का फूल है, खुशबू फैले दूर।
मानव बनता देव तब, बढ़ जाता है नूर।।

अशिक्षा
लगे अशिक्षा दाग सा, बिन खुशबू का फूल।
रूप, कुरूप समान हो, नहीं अंत इस भूल।।

मंत्र
जब मंत्र तंत्र सीख लो, करो अज्ञान दूर।
उल्टे सीधे काम से, गर्व काहे हुजूर।।
*******************
*होशियार सिंह यादव



शब्द-गणेश
*************************

पहले पूज गणेश लो, फिर देवों का ध्यान।
सच्चे मन से भक्ति कर, मिले बुद्धि वरदान।।
*************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

शब्द-गणेश
*************************
पहले पूज गणेश लो, फिर देवों का ध्यान।
सच्चे मन से भक्ति कर, मिले बुद्धि वरदान।।
*************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


शब्द-आंदोलन
*************************
आंदोलन बापू चला, गये  अंग्रेज  हार।
देशभक्ति की जीत से, महका घर संसार।।
*************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


शिक्षा-
**
शिक्षा तन का फूल है, खुशबू फैले दूर।
मानव बनता देव तब, बढ़ जाता है नूर।।

अशिक्षा
लगे अशिक्षा दाग सा, बिन खुशबू का फूल।
रूप कुरूप समान हो, नहीं अंत इस भूल।।

मंत्र
जब मंत्र तंत्र सीख लो, करो अज्ञान दूर।
उल्टे सीधे काम से, गर्व काहे हुजूर।।

दोहा ****************************
चापलूस बन कर करो, हजम देश का माल।
मालिक को फिर मात दो, चलकर कोई चाल।।

हरी भरी जब हो धरा, आए सावन तीज।
झूला झूले नारियॉँ, वपन काल यह बीज।।

चापलूस बन काम ले, खा ले सारा देश।
वेश बदल कर भाग जा,लूटो ऐश विदेश।।
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नमन दोहा धुरंधर
शब्द-चापलूस
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चापलूस बन काम ले, खा ले सारा देश।
वेश बदल कर भाग जा,लूटो ऐश विदेश।।
****************************
-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

नमन साहित्यगंगा
शब्द-तीज
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**************************
हरी भरी जब हो धरा, आए सावन तीज।
झूला झूले नारियॉँ, वपन काल यह बीज।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
टप टप रखना जन बड़े, बेशक चट कर देश,
बनो चापलूस संतरी, भाग जाओ विदेश।।

दोहा **************************
चापलूस बन कर करो, हजम देश का माल।
मालिक को फिर मात दो, चलकर कोई चाल।।
****************************
-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा



दोहा **************************
चापलूस जन नाम है, बड़े गजब के काम।
करे हजम वो माल को, मालिक हो बदनाम।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
धर्म आड़ में कर रहे, उल्टे सीधे काम।
आप मलाई चाटते, प्रभु हो बदनाम।।

देश धर्म की बात पर, होते जन नाराज।
फर्ज, कर्ज को भूलते, चाहे करना राज।।

जीवन भी संग्राम है, जीते कोई आज।
करो सत्कर्म जग सदा, सिर पर बंधे ताज।।
दोहा--
***************
खेलकूद कर पास कर, शिक्षा बहे बयार।
जो जन शिक्षा ले नहीं, जीना हो बेकार।।







विषय-जिम्मेदारी
विधा-कविता
                जिम्मेदारी
           ***********
***********************

जिम्मेदारी जगत में, मिलती  हर इंसान,
जिम्मेदारी सफल हो, बने जन पहचान,
जिम्मेदारी से दूर हटे, वो जीव बेईमान,
वक्त पर पूरे कर काम, बढ़ेगी जन शान।

साधू,संत,देव,मुनि, सभी पर जिम्मेदारी,
कुछ को बुरी लगे, कुछ को लगे प्यारी,
अगर हर जन समझ ले,निज जिम्मेदारी,
तो चर अचर जग, न बढ़ेे व्यथा हमारी।

धरती पर जन्म ले, वो जीव ही कहाए,
सभी जग में प्रभु से अपना भाग्य लाये,
जन्म समय मिलती,  जिम्मेदारी सबको
पूरी कर अपनी,  खुद हंसे और हंसाए।

श्रीराम प्रभु कहलाते, आये थे धरा पर,
निज जिम्मेदारी  ले आए, गये पूरी कर,
बड़े बड़े देव सभी,  बंधे हुये जिम्मेदारी,
हंसते हुये निभाते हैं, लगती उन्हें प्यारी।

त्रि-देवों ने संभाला, अपना अपना काज,
गरीब रो रो गये,, अमीर सिर बंधा ताज,
पर वो भी जिम्मेदारी, पूरी करते जग में,
लगा सीने से जिम्मेदारी मत होना नाराज।

सूरज,चांद,सितारे नभ, निभाते जिम्मेदारी,
यह भी प्रभु की देन, व्यवस्था जग हमारी,
आओ निभाएं जिम्मेदारी,कहता है समाज,
जिम्मेदारी का बंधा,हर सिर पर एक ताज।।
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*होशियार सिंह यादव

Thursday, July 23, 2020

कविता
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कठिन हो गया जग में,
साथी संगी से भी प्यार,
न जाने कब दे दे धोखा,
मुश्किल करना एतबार।

अपना  बनकर काटते,
कहते जिनको  अपना,
दोस्ती  करना  जग में,
बन गया  एक  सपना।

किस पर विश्वास करे,
किसको कहे हम चोर,
जिस पर भी हाथ रखे,
वो है पापी जग में घोर।

अब तो अपनों पर भी,
नहीं कर सकते एतबार,
लाख प्रयास कर लेना,
होगी जन फिर भी हार।
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कविता
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सावन शुक्ल तृतीया, कहाए पर्व तीज,
हरियाली चहुं ओर, टिड्डे जाते हैं रीझ,
पूरे देश में पर्व मनाते,परंपरा है पुरानी,
शिव पार्वती की पूजा, सुनते हैं कहानी।

सावन के झूले पड़े, मन में उठे हिलौर,
झूला देती सखियां, छुप हुआ चितचोर,
सावन की घटा छाई, नाचे मन का मोर,
पानी लेने चल पड़े, बिजली चमके घोर।

हरियाली तीज आई,मिलती मिठाई घेवर,
आपस में बात करते, भाभी संग में देवर,
बतासों का उपहार,आये बेटी के ससुराल,
नई नवेली दुल्हन के, मन में एक सवाल।

दादुर सुर में गा रहे, टिड्डे छेड़े राग मल्हार,
साजन सजनी तरस रहे, ऑँखों में है प्यार,
एक साथ पड़ रही, नभ से बूंद कई हजार,
चकवा चकवी ताक रहे, अब डूबेंगे प्यार।

विरह में डूबी हुई, एक नवेली  झूला झूले,
सोच रही क्या बात हुई,साजन हमको भूले,
आये ना यह विरह की रात,करती है बेचैन,
जब विदेश से साजन आये,तब आयेगा चैन।
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दोहे
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सावन के झूले पड़े, रिमझिम पड़े फुहार।
झूल रही हैं नारियां, साजन दिल में प्यार।।

नार नवेली झूलती, ले साजन का नाम।
दिल की बात दर्द दे, होती जब भी शाम।।

सखियां मन की कह रही, साजन है उस पार।
सावन के झूले पड़े, सजनी को है प्यार।।

बातें करती नारियां, साजन गये विदेश।
झूले भी अब कह रहे, चल साजन के देश।।
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कुंडलियां
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1.


झूला झूले नारियां, लेती झोले जोर।
सावन पावन माह में,टिड्डे करते शोर।।
टिड्डे करते शोर, बागों में  नाचे मोर।
करते बादल शोर,चमके बिजली घनघोर।।
बारिश फुहार पड़े,सखियों ने साजन भूला।
मच गई भागदौड़, बाग में  छोड़ा झूला।।

2.
झूला आया मायके, गौरी ने लिया डाल।
मजे ले रही झूल के, सखियां देती ताल।।
सखियां देती ताल, कभी आसमान छू ले।
सावन रिमझिम देख,खुद को सखियां भूले।।
शोर मचाती खूब, कभी खाती रसगुल्ला।
घर घर में है पड़ा, सावन पर्व का झूला।।

जरा सुनो
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रोने से कष्ट दूर नहीं होते और हंसने से कष्ट पास नहीं आते फिर रोने का मार्ग त्याग करके कष्टों में मुस्कुराना सीखो।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा

दोहा****************************

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चापलूस बन कर करो, हजम देश का माल।
मालिक को फिर मात दो, चलकर कोई चाल।।

हरी भरी जब हो धरा, आए सावन तीज।
झूला झूले नारियॉँ, वपन काल यह बीज।।

चापलूस बन काम ले, खा ले सारा देश।
वेश बदल कर भाग जा,लूटो ऐश विदेश।।




Wednesday, July 22, 2020

कविता
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सावन के झूले पड़े, मन में उठे हिलौर,
झूला देती सखियां, छुप हुआ चितचोर,
सावन की घटा छाई, नाचे मन का मोर,
पानी लेने चल पड़े, बिजली चमके घोर।

हरियाली तीज आई, मिले मिठाई घेवर,
आपस में बात करते, भाभी संग में देवर,
बतासों का उपहार,आय बेटी के ससुराल,
नई नवेली दुल्हन के, मन में एक सवाल।

दादुर सुर में गा रहे, टिड्डे छेड़े राग मल्हार,
साजन सजनी तरस रहे, ऑँखों में है प्यार,
एक साथ पड़ रही, नभ से बूंद कई हजार,
चकवा चकवी ताक रहे, अब करना प्यार।

विरह में डूबी हुई, एक नवेली झूला झूले,
सोच रही क्या बात हुई,साजन हमको भूले,
आये ना यह विरह की रात,करती है बेचैन,
जब विदेश से साजन आये, तब आये चैन।।
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आशाओं का नाम है जीवन
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कोई रहता पर्वतों पर, कोई रहे गुफाओं में,
कोई खुश घर पर है,कोई खुश फिजाओं में,
किसी को भोजन नहीं, कोई कर रहा बर्बाद,
कोई अपनों को भूला, कोई कर रहा है याद,
क्योंकि जगत में,आशाओं का नाम है जीवन.....

कोई दर्द में जी रहा, कोई खुश है मिले यार,
कोई धोखा दे रहा है, कोई कर रहा है प्यार,
कोई तरसे पाई पाई, कोई खर्चदे पल हजार,
कोई सर्दी में पीटता, कोई करे वसन व्यापार,
क्योंकि जगत में,आशाओं का नाम है जीवन....

धर्म कर्म सब भूल गये, पाप कर्म मन लगाय,
कोई देश का लूट रहा,  कोई मुफ्त का खाय,
कोई रो रहा बिना बात, कोई रहा जग हॅँसाय,
देख देख जगत के काम, प्रभु आओ ले बचाय,
क्योंकि जगत में,आशाओं का नाम है जीवन..। 
****************************

  फोन 09416348400


विधा- कविता
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भाई बहन को याद करें, आ गई है तीज त्यौहार,
पूरे जग में अटूट बंधन, भाई बहन का होए प्यार,
भाई कभी हलवाई बनता, बहन करे हलवा तैयार,
पंखे की हवा में खाए मिलकर,आनंद मिले हजार।

एक समय की बात सुनाऊं,भाई गया ले त्योहारी, 
कहा लो पकवान बनाए, कर ली पल में तैयारी,
पूड़ी,कचोरी,बनाया, और बनाया टमाटर का सूप,
दोनों बैठ के खाने लगे, खाया जी भर भर के खूब।

बचा हुआ सामान रख दिया, बड़ी एक अलमारी,
कहां भाई ने खाते रहना, तुम हो मेरी बहना प्यारी
बहन भाई को देखहॅँसते,क्या-क्या की कलाकारी
एक दूजे का सहयोग करेंगे,यही है सभ्यता हमारी।
*******************
स्वरचित नितांत मौलिक रचना
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

नमन वर्तमान अंकुर
22 जुलाई 2020
गीत बोलेंगे प्रतियोगिता
विषय-मानवता
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दर्द हजारों मिल जाते हैं, मानवता मिलती जग कम,
देख देख जन की बेशर्मी, ऑँखें हो जाती हैं नम,
आओ मिटा दे दुख जहां के , कहती दुनिया सारी है,
शुभ कर्म कहलाता है ये, दौलत जगत की सारी है।

इक बेचारा भूखा मरता, एक बड़ा व्यापारी है,
इक कॉँटों पर सो जाता है, इक ले नींद उधारी है,
कोई सर्दी पिट रहा है, कोई बेच रहा रजाई,
कोई पानी प्यासा है, कोई दारू करे हॅँसाई।
कौन किसी को सुखी देखता किस में कितना मिले दम....।
दर्द हजारों मिल जाते हैं.....................।

बच्चा गेंद को तरस रहा, दूजा खेल रहा फुटबाल,
एक के कपड़े फटे हुये, एक बेच रहा है थान
कोई कर रहा धर्म पुण्य, एक मचाता है तूफान,
एक बड़बड़ करता, एक की हो गई है बंद जुबान,
मार रहे हैं लोगों को ही, डाल रहे हैं कितने बम,
दर्द हजारों मिल जाते हैं..........

आएगी एक भोर सुहानी, मिलकर बैठे सारे हम,
बैरभाव सब मिट जाएंगे, गरीब अमीर हो जा सम,
अपना पराया भूल जाते, जग में होता तब ही नाम,
खूब करों मेहनत जग में, मेहनत करना अपना काम,
चहुं ओर नजर उठाओ, लगते हैं जगत में हम ही हम।
दर्द हजारों मिल जाते हैं..........।।

दर्द हजारों मिल जाते हैं, मानवता मिलती जग कम,
देख देख जन की बेशर्मी, ऑँखें हो जाती हैं नम,
आओ मिटा दे दुख जहां के , कहती दुनिया सारी है,
शुभ कर्म कहलाता है ये, दौलत जगत की सारी है।

Tuesday, July 21, 2020

जरा सुनो
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अकसर दूसरों को नीचा दिखाने की चाहत में इंसान इस कदर गिर जाता है कि लोगों को मुंह नहीं दिखा पाता।

बुराई और भलाई साथ चलती हैं। यदि तुम बुरा करना चाहों तो प्रभु भला करते देर नहीं लगाते हैं।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


दोहे
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खुश मिलेगा जन कभी, संकल्प शक्ति पास।
हिम्मत मन से हारता, नहीं रहे तन सॉँस।। 

पास संकल्प शक्ति हो, कर लो सुंदर काम।
आगे बढ़ते जाइये, जग में होगा नाम।।

मानव शरीर पा लिया, अब कर अच्छे काम।
नहीं संकल्प शक्ति हो, कैसे हो जग नाम।।

सच्चे मन से काम ले, प्रभु को कर ले याद।
अगर संकल्प शक्ति है, क्यों करते फरियाद।।
**************************

*होशियार सिंह यादव


दोहा *********************************

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बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।

नहीं खण्ड वर्षा जहांॅँ, न हो मूसलाधार।
नहरी पानी दूर हो,  फिर जीना बेकार।।

धरती पर पापी बढ़े, और बढ़े अन्याय।
प्रभु आएंगे देव बन, देने को जन न्याय।।
************************
*होशियार सिंह यादव


दोहा ************************

**
***********************
धरती पर पापी बढ़े, और बढ़े अन्याय।
प्रभु आएंगे देव बन, देने को जन न्याय।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा




 दोहा ************************

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बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


बिंदु
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बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन, हाल जगत का जान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,बस इतना जग ज्ञान।।



खण्ड वर्षा
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*************************
नहीं खण्ड वर्षा जहांॅँ, न हो मूसलाधार।
नहरी पानी दूर हो,  फिर जीना बेकार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


धरती पर पापी बढ़े, और बढ़े अन्याय।
तब आएंगे देव बन, देने को जन न्याय।।

नमन दोहा ************************
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा



शब्द-बिंदु
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बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन, हाल जगत का जान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,बस इतना जग ज्ञान।।



खण्ड वर्षा
*************************

नहीं खण्ड वर्षा जहांॅँ, न हो मूसलाधार।
नहरी पानी दूर हो,  फिर जीना बेकार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा





विधा-कविता/ मुस्कुराहट
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शैतानी करते बच्चे, झलके खुशी आहट,
छोटी सी हंसी से, खिल उठे मुस्कुराहट,
कभी कभी तो बड़े भी, करे खटखटाहट,
वो भी हंसा देती है खूब, मन उठे चाहत।

बहुत कठिन हो चला, घर बाहर हंसना,
बातें जब करते जन, लगे नाग सा डसना,
दर्द में डूबा हर इंसान, हंसना गये हैं भूल,
उनके व्यवहार लगे, ज्यों फांसी गये झूल।

तितली, मकड़ी पकड़ ले, बच्चों को प्यार,
कभी घरौंदा बना तोड़ते, हंसी मिले हजार,
कुछ बोलते रो रहे हैं, हंसी दे दी है उधार,
हंसी-ठहाके लगा, मुस्कुराहट से कर प्यार।

कितना बदला है युग, हंसी भी मिले मोल,
जिस किसी से बात करो, बोले कड़वे बोल,
छोटे बच्चे की हंसी, कोनों में मिश्री दे घोल,
हंसी मिले खरीद लो,यह बड़ी है अनमोल।

हंस लो आज अभी, बच्चे की हंसी कहती,
हंसी धरा से रूठ गई, वो और  कहीं रहती,
देख देख जमाने को, आंखों से आंसू बहती,
हंसी ढूंढके लाओ, बच्चे की मुस्कान कहती।।
*******************

*होशियार सिंह यादव



शब्द चिंतन
विधा-कविता
***********
प्रदूषण





*****
बढ़ गया प्रदूषण, जीना हुआ मुहाल,
आये दिन रच रहा, मानव बुरी चाल,
वायु,पानी,धरा,ध्वनि, कर दिये बेकार,
प्रकृति शुद्ध न रही, जिससे जग प्यार।

प्रदूषण बोलबाला, मौत  सामने तैयार,
आए दिन आ रही हैं, आपदाएं हजार,
जल में जहर घुला है, मचा कोलाहल,
वायु भी दूषित हो गई, ना सामने हल।

गांव कभी जाने जाते थे, बढ़ गया शोर,
कौवा,गिद्ध,तोता गायब, भूला नाच मोर,
हर जन प्रदूषण करता, बने हैं पापी घोर,
पेड़ पौधे काट डाले, बचे न कीकर,थोर।

आएगा घोर युग,  घर-घर में घुले जहर,
पाप, दोष बढ़ जायेंगे, गांव हो या शहर,
हत्या, लूट, डकैती चले, आठों ही पहर,
बढ़ जायेगा फिर जगत, प्र्रकृति का कहर।

वक्त अभी बचा लो, घोलों मत नहीं जहर,
प्रदूषण कम करो, वृक्षों से भरो गांव शहर,
बचा लो सुंदर जग को, आयेगा कलियुग,
सतयुग के सपने देख, आएगा पाषाण युग।।

Monday, July 20, 2020










दोहा**************
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दुख के काटें पथ अड़े, चलना है दिनरात।
चले पथिक मंजिल मिले, तब बनती है बात।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


दोहा
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बड़ी बड़ी बातें करें, मिले नहीं कुछ ज्ञान।
करते ओछे काम वो, समझे अपनी शान।।
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-होशियार सिंह यादव,

जरा सुनो
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अधिक बोलने से जन की ऊर्जा तो नष्ट होती ही है वहीं बुद्धिमता कम होने का प्रतीक भी होता है। ऐसे में कम तथा उचित बोले।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

अकाल
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टिड्डी हमला हो गया, है किसान बदहाल।
फसल अगर चौपट हुई, भारी पड़े अकाल।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

ओलावृष्टि सेे तंग थे, अब टिड्डी की चाल।
फसल अगर चौपट हुई, जरूर पड़े अकाल।। 

अगर प्रदूषण बढ़ गया, प्रकृति मिले बदहाल।
धरा फसल चौपट हो, बढ़ेगी भूख,अकाल।।

कीड़े, टिड्डी खा गये, किसान हैं बेहाल।
फसल नष्ट हो गई, तो पड़े फिर अकाल।।
टिड्डी हमला हो गया, है किसान बदहाल।
फसल अगर चौपट हुई, भारी पड़े अकाल।।








     मां
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मां मेरी पहचान ले
अज्ञानी मैं कहलाता,
बस तेरी पूजा करता,
उम्मीद वहीं से पाता।
जब जब कलम उठे,
लिखता  तेरे गुणगान,
तेरी महिमा  निराली,
जग में सुंदर तेरी शान।
हाथ जोड़ विनती करूं,
देना मुझको बस शक्ति,
पूजा तेरी करता रहूं मैं,
मिले ज्ञान और भक्ति।
वर्षों से दूर रहा हूं मां,
अब ना करना मुझे दूर,
तेरे चरणों में पड़ा रहूं,
नहीं मुझे कोई गरूर।
तेरी महिमा गाता जग,
गाते रहते जग त्रिदेवा,
देवी,वीणा वादिनी तू,
सेवा तेरी देती है मेवा।
तुच्छ मुझे बस जानकर,
रख ले बस मेरा ख्याल,
ज्ञान नहीं मुझे जग का,
रोज बदलता है चाल।
मन मंदिर में बसी रहो,
चलती रहे यह कलम,
हर दिन होठों पर रहे,
भक्ति कभी न हो कम।
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*होशियार सिंह यादव


कविता
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मुश्किल से थामा है, 
रखना है  साथ साथ,
एक दूजे के  हो गए,
सेवा करेंगे दिन-रात।

रहता है इस दिन भी,
हर जन बड़ा इंतजार,
शादी परंपरा निभाते,
तब मिलता है प्यार।

छूटे नहीं, कभी भी,
हाथों से, यह हाथ,
छूटा है, अगर कभी,
बनते, उल्टे हालात।

आते हैं खयाल भी,
तब चलती है बात,
शुभ घड़ी शुभ दिन,
तब बनते हैं हालात।

नाराज ना होना कभी,
कहते हैं दूल्हा दुल्हन,
हंसी खुशी में मिलते हैं,
दोनों के आपसी मन।।

Sunday, July 19, 2020


गीत

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हे प्रभु आया, दूर से, चलके तेरे द्वार।
विनति सुन लो, तुम मेरी, करो भक्ति स्वीकार।।
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मुझे पता ना, चाहिये, क्या पूजा सामान।
लेकर आया हूं, यहॉं, फूलों का बस हार।।
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दर से जाऊॅं, जब मुझे, दोगे दर्शन आज।
एक बार कहता, छुपे, हैं दिल में भी राज।।
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प्रभु मेरे ,यह जग, कहे, तुम हो पालनहार।
तेरी महिमा है बड़ी, मुझको तुझ पे नाज।।
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*होशियार सिंह यादव


जरा सुनो
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मेहनत मजदूरी और ईमानदारी से कमाकर खाते हैं उनका  तन और मन पवित्र होता है।
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शिवरात्रि व्रत और तप, मन को शुद्ध कर देते हैं जिससे इंसान की प्रभु के नजदीकी बढ़ जाती है।
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--होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियारणा

खग/विहग/नभचर/पक्षी
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नील गगन में उड़ रहे, मचा रहे हैं शोर।
अपने निराले रंग सेे,  पक्षी करे विभोर।।

भॉँति भॉँति के खग मिले, विभिन्न उनके नाम।
पंख, पैर को देख कर, मिलता मन आराम।।

दूर जहॉँ तक देखते, खग का है संसार।
नाना भांति  नाम है, गिनती कई हजार।।

पक्षी सेवा जो करे, कहलाता है देव।
उनकी सेवा भाव से, प्रसन्न मिले त्रिदेव।।

नर सेवा से है बड़ी, सेवा नभचर काम।
मिलता जरूर फल कभी, होता जग में नाम।।

कलाकार
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मारो भाला, तीर, बम, होगी कभी न हार।
कलाकार बन प्रभु खड़े, कर दे बेड़ा पार।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा





विकास
विधा-कविता
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विकास पर टिका हुआ,
गांव, राज्य, देश, संसार,
विकास नहीं कैसे जीये,
विकास जन का आधार।

विकास घर का हो जाए,
घर वही स्वर्ग बन जाता,
विकास गांव का हो यदि
राज्य में वो नाम है पाता।

विकास हो जब राज्य का,
देश में होता है ऊंचा नाम,
पूरी दुनिया ही गाये फिर,
देश बड़ाई सुंदर हो काम।

विकास नहीं अगर होगा,
वो जगह नरक के समान,
जीना जन हो जाता दूभर,
रोयेगा फिर देश, जहान।।
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