Saturday, October 31, 2020

 


दोहा *****************

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1. प्रदत्त शब्द- सौहार्द
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बने सौहार्द देश में, मिलकर हो जब काम।
भाईचारा तब बढ़े, होगा जग में नाम।।
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2. प्रदत्त शब्द-सहोदर
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आपस में जब प्यार हो, मन उपजे मुस्कान।
रक्त एक सा तन बहे, उन्हें सहोदर मान।।
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3. प्रदत्त शब्द-रमणीक
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लगे रमणीक बाग भी, खिले अनेकों फूल।
फिजा जहां पर खेलती,लगे जगत की भूल।।
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4. प्रदत्त शब्द-अदृश्य
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अदृश्य दुश्मन से बचो, करता घातक वार।
चिकनी चुपड़ी बात में, नहीं मिलेगा प्यार।।
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कुंडलियां

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रजवाड़े  करदो  खत्म , है बस यही अपील ।
है  बस  यही  अपील , देश  को एक बनाना ।
मुद्रा झण्डा एक , एक  विधि  को अपनाना ।
असरदार   सरदार  , नीति   ऐसी   अपनाई ।
जो  थे  दबी  जुबान , अन्त  में  मानें  भाई ।।

सभी रियासत थी जुदा , जुदा जुदा  थे राज ।
कुछ खुश थे मिल देश में , मगर कई नाराज ।
मगर  कई  नाराज , खाँमखाँ  आँख दिखाई ।
कहते   रहे   पटेल , मान   जाओ   रे   भाई ।
जब  पहुँचे  सरदार  , सामने  देख  कयामत ।
मानी  सबने बात , मिल गई सभी रियासत ।।





माटी का घर
विधा-कविता
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माटी के घर से, होता जन को प्यार,
इच्छा हो घर लौटूं,चाहे मील हजार,
पक्के दिल के लोग, मिलते कच्चे घर,
अपने वचन के सच्चे,नहीं मिले डर।

माटी के घर तो, करे एसी का काम,
सर्दी में गर्म रहता, गर्मी में दे आराम,
धन दौलत कम हो, भजते रहना राम,
कच्चा घर मंदिर, लगता है एक धाम।

माटी के घर तो, जन को देते हैं चैन,
आराम मिले इतना, नींद खुले न रैन,
बुजुर्गों ने बीताया,जीवन अपना सोच,
भंडार भरे अन्न के,सदा रही थी मौज।

माटी के घर में, पूजा अर्चना मिलती,
रहते वहां देव, देख कलियां खिलती,
जहां नहीं चिंता किसी,ऐश व आराम,
बस खुशी से बीतेगी,ले प्रभु का नाम।

आओ बनाए,माटी का एक सुंदर घर,
जहां सुबह और शाम, बने रहे निडर,
हर हर करते कटे जिंदगी,रहेंगे अमर,
सबसे प्यारा,सबसे सुुंदर,मेरा माटी घर।।



संयम

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संयम बरते जीवन में,
होंगे सफल तब काम,
संयम टूटे मानव कभी,
होगा जग में बदनाम।

संयम पर चलकर ही,
ऊंचाइयां छू जाये जन,
स्थिर रहे जब मन तो,
बाग बाग हो जा तन।

श्रीराम चले संयम पर,
मर्यादापुरुषोत्तम कहाये,
इस धरती पर, नाम है,
माता पिता धर्म निभाये।

संयम हो हर इंसान में,
करे मुहब्बत जग सारा,
अपने पराये जब सामने,
लगता मन से वो प्यारा।

संयम जगत में बरतना,
करना कभी नहीं भूल,
जीवन में आगे बढऩा,
यही हो मानव वसूल।

मरती बेटियां लाचार सरकार
विधा-कविता
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लाचार हो गई सरकार,
मर रही हैं अब बेटियां,
बेरोजगारी बढ़ती जाये,
घट रही हैं अब रोटियां।

बलात्कार का तांडव तो,
हो रहा है दिन रात अब,
सरेआम अस्मिता लुटती,
आगे क्या होगा जाने रब।

यौन शोषण बढ़ रहे हैं,
भ्रूण हत्या का पा करते,
नारी पर अत्याचार करे,
अत्याचारी जरा ना डरे।

जला रहे,काट रहे कई,
मार रहे हैं कितनी बेटी,
दुर्भाग्य सरकार का बना,
सरकार अब तक न चेती।








आएगा और बुरा  वक्त,
देखा नहीं जाएगा नजारा,
देख देखकर हालात वक्त,
जी भर चुका है हमारा।।

Friday, October 30, 2020

दोहे
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चाय और वो जब मिले,जन को दोनों साथ।
बाग बाग दिल हो उठे, आगे बढ़ता हाथ। 2।

होता प्रसन्न मन कभी,मुख से निकले वाह।
पुलकित जन देता दुआ, वो भूलेगा आह। 4।

खुशी मिले संसार में, जीवन स्वर्ग समान।
कहे सफल वो जिंदगी, मानव वही महान। 6।

महान जन वो जगत में,पुण्य कर्म हो काम।
चाय और वो संग हो, मिले दूर तक नाम। 8।
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माटी का घर
विधा-मुक्तक
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1
माटी का घर सदा, लगता जन को प्यारा।
रहते जिसमें लोग, नेह लगता हमारा।।
सभी जन प्रसन्न मिलते, अपने अपने घर,
जिसके ना माटी घर , कहाता बेचारा।।
2  

कभी कभार मिलते थे, माटी के घर।
अपना घर होता जब, नहीं होता डर।।
सदा खुशी से रहता, हर जन संसार,
घर जिनका हो नहीं, भटकेगा दर दर।।
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गीत
 शरद पूर्णिमा रात अमृत बरसता
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शरद पूर्णिमा रात अमृत बरसता
आओ मिलकर खाएंगे सब खीर,
औषधियों का यही काम करेगी
हट जाएगी तन की सारी पीर,
शरद पूर्णिमा...................।

एक वर्ष बीते आती है रात,
शरद पूर्णिमा यही कहलाती है,
सर्दी मौसम आरंभ होता है,
मन में उमंग एक भर जाती है,
इस रात को देख देखकर लगता,
प्रसन्न होते खूब जन और वीर.
शरद पूर्णिमा...................।

श्रीकृष्ण ने बताया बड़ा महत्व,
भवानी का हुआ था तब अवतरण,
कार्तिक नहान शुरू हो जाएगा,
पर्व लगता जैसे होता है रण,
कार्तिक स्नान करती नारी मिलके,
पर मन में रखती सदा एक धीर,
शरद पूर्णिमा...................

सर्दी मौसम शुभारंभ होएगा,
सभी तन मन को प्रसन्न कर जाये,
लगता हँसाये जन को हर्षाये,
मन यह कहे शरद पूर्णिमा आये,
सुंदर सुहानी जब चंद्रमा देख,
खुश होते हैं सभी गरीब अमीर,
शरद पूर्णिमा.....................।

शरद पूर्णिमा रात अमृत बरसता
आओ मिलकर खाएंगे सब खीर,
औषधियों का यही काम करेगी
हट जाएगी तन की सारी पीर,
शरद पूर्णिमा...................।









कविता/हास्य रस
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नया नया चश्मा पहना,
वो चल पड़ी बाजार,
बगल बैग टांग लिया,
कुत्ते से था बड़ा प्यार।

काला चश्मा पहना जब,
छुपा लिया दिल में राज,
सामने एक घर देखकर,
बोली कितना सुंदर ताज।

काले चश्मों से कम दिखे,
सामने कार से जा टकराई,
कार से उतरी एक बूढ़ी तो,
चोट तो नहीं लगी लुगाई।

काले चश्मे वाली खड़ी हो,
जोश में आ गई वो भारी,
दोनों बाजू ऊपर कर लिये,
लडऩे की कर ली तैयारी।

भीड़ जमा हो गई वहां पर,
टूटा चश्मा लेकर वो हाथ,
बोली मेरा चश्मा तोड़ा है,
तुझ को मैं कर दूंगी अनाथ।

टूट पड़ी बूढ़ी औरत पर,
उतारा अपना सारा जोश,
अपनी गलती छुपा रही,
बता रही बुढिय़ा का दोष।

समझा बूझाकर भेजी घर,
खरीददारी ना हो पाई तो
आ पहुंची कुत्ते सहित घर,
जान बची रट रही हर हर।।

Thursday, October 29, 2020

प्यार/प्रेम
विधा-दोहे
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पांडव बल था एकता, भाई भाई का प्यार।
काम सदा होते सफल,प्रेम धरा आधार।।
भाई भाई में प्यार हो, पले जब भ्रातृप्रेम।
बहुत बड़ी ताकत कहे, आपस का ये प्रेम।

कहे अहिंसा आज सुन, क्यों करते हो युद्ध।
आपस में जब प्रेम हो, जन भी लगते बुद्ध।।

बापू को जग मानता, जन्मदिन रहे याद।
मार्ग चलो प्यार के, करो नहीं फरियाद।।

प्यार देश में यदि बढ़े, मिटे जगत से बैर।
उसकी आंखों ने कहा, प्रभु रखते हैं खैर।


दोहे************************
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समय सदा ही दौड़ता, मिलता नहीं उधार।
मोल भाव होता नहीं, करो वक्त से प्यार।।

सर्दी गर्मी मौसम सभी, आते सदा न साथ।
कभी पसीना छूटता, कभी कांपते हाथ।।

स्वेटर पहनो जब कभी, सर्दी पड़ती खूब।
गर्मी सर्दी में नहीं, पनपती कभी दूब।।


मुफलिसी में भी मजा है
विधा-कविता
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गरीबी अमीरी संग चले,
राजा बन सकता फकीर,
कहते हैं यह प्रभु रजा है,
मुफलिसी में भी मजा है।

फकीर बन सकते अमीर,
बैठे बैठाये यमुना के तीर,
गरीबी कोई नहीं सजा है,
मुफलिसी में भी मजा है।

जगत में मुफलिस इंसान,
सच्चे इंसान की पहचान,
अमीरी लोगों का नशा है,
मुफलिसी में भी मजा है।

मुफलिस इंसान मिलते हैं,
जगत ईश्वर के बहुत पास,
धन दौलत को तरसते सदा,
दिल की बुराई करते नाश।

ईश्वर के सदा दिल में रहते,
गरीब, निर्मल,स्वच्छ इंसान,
अमीरों के दिल कठोर होते,
मिलते बस दौलत के दास।

तुलसीदास गंगा के तट पर,
मुफलिसी दिन रात बिताये,
उनकी सच्ची भक्ति देखकर,
खुद श्रीराम मिलने को आये।

मुफलिसी में नरसी भगत ने,
प्रभु भक्ति का छोड़ा न साथ,
श्रीकृष्ण भात भरने आये थे,
आया पकड़ा नरसी का हाथ।

मुफलिसी में दिन बिताये थे,
गरीब सुदामा करता विनती,
श्रीकृष्ण ने आकर घर भरा,
दौलत नहीं, हो पाई गिनती।

सबरी प्रभु भजन कर रही,
मुफलिसी में बिताती दिन,
ईश्वर श्रीराम, पहुंचे मिलने,
झूठे बेर खिलाये गिन गिन।

रैदास को कौन नहीं जानता,
मुफलिसी उनके काम आई,
गंगा में जब पैसा फेंका था,
सुन रैदास, गंगा हाथ बढ़ाई।

मन चंगा तो कटौती में गंगा,
गरीबी,भक्ति दोनों ही दर्शाता,
रैदास की गरीबी और भक्ति,
रह-रहकर मन को तरसाता।

नामदेव,कबीर और त्रिलोचन,
सधना, सैनु निम्र वर्ग कहलाए,
भक्तिभाव दिल में अति जागा,
ईश्वर के वो बहुत पास आए।

मुफलिस हो जन जन के प्रिय,
मलिन मन नहीं मिलता उनका,
पले में सोने का महल बन जाए,
फेंक दे प्रभु नाम से वो तिनका।

मुफलिसी होती बड़े काम की,
ले जायेगी प्रभु  के बहुत पास,
जिनकी कृपा सदा बनी रहती,
पाप,बुराई का दिल से हो नाश।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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सपना
विधा-क्षणिकाएं
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1
सपने बिखर जाते हैं,
सपने सुहाने लगते हैं।
जब मन खुश होते हैं,
तो नये सपने सजते हैं।।

2
सपने पहाड़ कूदा दे,
सपने तो रंग जमा दे।
सपने का क्या कहना,
हँसते हुये को रुला दे।।

Wednesday, October 28, 2020






चराग-ए-रहगुजर
दोहे
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हैं चराग-ए-रहगुजर, दीपों का त्योहार।
मिले मुहब्बत कामिनी, दामन भरदे प्यार। 2।
प्यार-ओ-तमन्ना कभी,रखता नहीं उधार।
वो चराग-ए-रहगुजर, गुजरे लोग हजार। 4।
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माटी का घर
दोहे
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माटी का घर जब मिले,तन में आये जान।
पूर्वज रहते थे जहां, इतनी सी पहचान।।

माटी का घर समझ ले, अपना तन मन जान।
एक दिन शाम ढूंढकर, ले जाएगी मान।।

माटी का घर दे सदा, खुशियों का त्यौहार।
ऐसे घर में ही मिले, अनमिट जन का प्यार।।

माटी का घर यह कहे, कर ले अच्छे काम।
पाप कर्म करता कभी, हो जाये बदनाम।।



जरा सुनो
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प्रदूषण का सतर बढ़ता ही जा रहा है जो भविष्य में खतरे का संकेत होगा।
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पूरी ताकत से करो, दुष्ट पर सदा वार।
टुकड़े टुकड़े तन करे, गर हिम्मत तलवार।।

चोरी डाका लूटना ,शर्मनाक हैं काम।
पाप पुण्य की सोच से, होता जन का नाम।।

देख भावना जगत की, पड़ा सोच में आज।
मूर्ख लोग ही कर रहे, इंसानों पर राज।।



विषय-चराग-ए-रहगुजर
-दोहे
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हैं चराग-ए-रहगुजर, दीपों का त्योहार।
मिले मुहब्बत कामिनी, दामन भरदे प्यार। 2।
प्यार-ओ-तमन्ना कभी,रखता नहीं उधार।
वो चराग-ए-रहगुजर, गुजरे लोग हजार। 4।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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परिंदा
विधा-कविता
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उड़ रहा था नभ में,
स्वतंत्र होकर आज,
कहां जाना उसको,
गहरा मन में राज।

मिलो लंबे  उड़ते हैं,
आजादी बस  जाये,
उनकी उन्मुक्तता को,
कोई नही रोक पाये।

परिंदे बैठे डाल पर,
गाते दिल से वो गीत,
खूब हंसते मिलकर,
समझों उनकी प्रीत।

परिंदों की दुनिया है,
बहुत बड़ा है संसार,
उनको देख समझ ले,
मिले जहां का प्यार।
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स्वरचित, नितांत मौलिक

नव वधू
विधा-कविता
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नार नवेली बहुत शर्माती,
जब वो पति के घर आती,
बाबूल की भी याद सताए,
कभी रोये वो कभी हंसाये।

नारी उठाती घूंघट उसका,
हंसती गाती खुश हो जाती,
प्रसन्न होकर जन को बताए,
पटाखे सी बेटा दुल्हन लाए।

कोई उसको भाभी कहता,
कोई उसके पास में रहता,
कोई उससे करे आंखें चार,
करता कोई रात कां इंतजार।

नई वधू जब खोले पोटली,
नन्द दौड़कर आये मोटली,
देवर देख- देखकर शर्माये,
पति तो सपनों में खो जाये।

किसी का दिल देखो टूटा,
किसी ने धन दौलत लूटा,
किसी का भाग्य लो रूठा,
किसी का सपना देख टूटा।
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स्वरचित, नितांत मौलिक

ओ चांद जरा जल्दी आना
विधा-कविता
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करवा चौथ का व्रत किया,
आकर प्रियतमा को सजाना,
बस एक जरूरी अर्ज तुमसे,
ओ चांद जरा जल्दी आना।

प्रियतम के लिए इंतजार है,
भूखी प्यासी रुकी सांस है,
तेरे को बस उसने पहचाना,
ओ चांद जरा जल्दी आना।

एक साल का पर्व कहाता,
सौभाग्य का प्रतीक बनाता,
तेरा रूप लगे बड़ा सुहाना,
ओ चांद जरा जल्दी आना।

सजी धजी, तुमको पुकारे,
तेरे दर्शन को कभी न हारे,
आकर इनकी लाज बचाना,
ओ चांद जरा जल्दी आना।
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प्रकृृति
विधा-कविता
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भुला नहीं सकता इंसान,
प्रकृति के बड़े हैं उपकार,
प्रकृति जीवन देती इंसान,
कर ले मानव प्रकृति प्यार।

मानव जीवन निर्भर प्रकृति,
प्रकृति पर निर्भर सारी सृष्टि,
प्रकृति ओज तेज भर देती,
समा सकती समूल समटि।

रोटी कपड़ा और मकान हैं,
प्रकृति पर निर्भर होते सारे,
प्रकृति की सुरक्षा कर लेना,
होगा यही धन भाग्य हमारे।

प्रकृति से आगे बढऩा भी,
होता है तलवार की धार,
प्रकृति में रहकर हँस लो,
हो जाएगा जन का उद्धार।

नजारे प्रकृति के लगते हैं,
इंसान को बड़े ही सुहाने,
प्रकृति की महत्ता को लो,
अब तो जग में पहचाने।।

Tuesday, October 27, 2020

 

दोहा 

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चोरी डाका लूटना ,शर्मनाक हैं काम।
पाप पुण्य की सोच से, होता जन का नाम।।

देख भावना जगत की, पड़ा सोच में आज।
मूर्ख लोग ही कर रहे, इंसानों पर राज।।

भरी भावना दिल बड़ी, ईश्वर से हो प्यार।
उनके रास्ते पर चले, कभी नहीं हो हार।।
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नमन शब्द-शर्मनाक
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चोरी डाका लूटना ,शर्मनाक हैं काम।
पाप पुण्य की सोच से, देव बने इंसान।।
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भावना
विधा-दोहे
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दिल में हो जब भावना,बनते सारे काम।
नहीं काम की सोच तो, जग में हो बदनाम।।

देख भावना जगत की, पड़ा सोच में आज।
मूर्ख लोग ही कर रहे, इंसानों पर राज।।

भरी भावना दिल बड़ी, ईश्वर से हो प्यार।
उनके रास्ते पर चले, कभी नहीं हो हार।।

जैसी जिसकी भावना, वैसा करता काम।
नीम के पेड़ पर कभी, नहीं लगेंगे आम।।

कहां गुम हो
कविता
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जिनके राज्य में हुआ,नहीं सूरज अस्त,
किये थे महाराजा,राजा,महावीर परास्त। 2।

दुनियां गाती है गीत वो सिकंदर तुम हो,
चर्चाएं सभी छेड़ते जिनकी,कहां गुम हो। 4।

मौत का तांडव रचाकर,भरी थी तिजोरी,
पृथ्वीराज हाथों हारे, तुम मोहम्मद गौरी। 6।

सोमनाथ मंदिर लूट के, तुम कहां गुम हो,
गजनवी बने तो मानो,तुम कुत्ते की दुम हो। 8।

कविता
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लव और कुश सीख रहे,
सीता माता से धनुष ज्ञान,
श्रीराम के पुत्र कहलाते हैं,
पूरे जगत में बनी पहचान।

मां से बड़ा गुरु नहीं जगत,
मां दे सकती है निज प्राण,
मां ममता की मूर्त होती है,
पूर जग में मां होती महान।

वाल्मीकि ने दी, शिक्षा तो,
लव कुश बने जगत महान,
लक्ष्मण जब मूर्छित किया,
लव कुश कहलाते विद्वान।

मात पिता गुरु देव जगत में,
जन का बना सकते  विद्वान,
इनका अपमान जब करे वो,
नीच,निशाचर,पापी ले मान।

मां को नमन करते हैं बच्चे,
पाते हैं निस दिन आशीर्वाद,
मां जग में नहीं होती कभी,
आती है जीवन भर वो याद।
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इजहार-ए-खामोशी
विधा-कविता
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लफ्जों से कहा है, फकत,
बेरुखी इजहार.ए-खामोशी
कभी खुलकर भी हंस लो,
क्यों बनाई है यह खामोशी।

मयस्सर हुआ अलम अब,
सताती इजाहर.ए-खामोशी,
तिजारत बन चुकी खुशियां,
जियारत हुई जन खामोशी।

इजहार -ए-खामोशी होता,
जीने का एक सुंदर बहाना,
दूर रहे निजयार दोस्तों से,
नहीं पड़ता घर भी सजाना।

शाम-ए-उल्फत खूब सताया,
सोचा है इजहार-ए-खामोशी,
आपस में  तकरार बढ़ी यूं,
पल में ही तोड़ दे खामोशी।

सलामत रहे हुस्न ए जिंदगी,
मय्यत में दफन-ए-खाक हो,
क्यों बनी इजहार-ए-खामोशी ,
उठा दो जनाजा जो खामोशी।।

इजहार-ए-मुहब्बत बात,
जब मुंह से निकली पति ,
इजहार-ए-खामोशी पत्नी,
बढ़ाई निज काम की गति।

इजहार-ए-खामोशी कहते,
तन-मन को आराम देना,
तान किसी के नहीं सहना,
निज मन में मस्त रहना।

अपनों के आगे चुप्पी साधे,
समझ नहीं पाये जन आधे,
ठहरा न सकता कोई दोषी,
कहते इजहार-ए-खामोशी।

पत्नी ने कहा जोर से-सुनो,
चुप रहो मन के तराने बुनो,
दिखाओ ना अब गर्मजोशी,
कर दो इजहार-ए-खामोशी।

बताते लोग, हजारों फायदे,
कहते  इजहार-ए-खामोशी,
शांत रहना लाभकारी होता,
नहीं रखा कुछ हो गर्मजोशी।

मरहम का काम कर जाती,
कहते हैं इजहार-ए-खामोशी,
प्रेम अनुभूति मन पैदा होता,
जन का प्यार मिले गर्मजोशी।

डांट डपट से आहत हुआ,
किया इजहार-ए-खामोशी,
बोलने की सजा-ए-दर्द है,
निज को ही कहता हूं दोषी।


Monday, October 26, 2020

दशहरा/दोहे
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सत्य की सदा जीत हो,कहते कितने संत।
असत्य पर जो जन चले, होगा उसका अंत।।

अनीति पर जो चल रहे, उनकी होगी हार।
सत्य मार्ग अपनाइये, मिले जहां का प्यार।।

रावण हारा सत्य से, राम की हुई जीत।
सत्य से लोग आज भी, करते मन से प्रीत।।

पर्व दशहरा कह रहा, करो जगत से प्रीत।
अच्छे जन को चाहते, जग की है यह रीत।।



इजहार-ए-खामोशी
विधा-कविता
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लफ्जों से कहा है, फकत,
बेरुखी इजहार.ए-खामोशी
कभी खुलकर भी हंस लो,
क्यों बनाई है यह खामोशी।

मयस्सर हुआ अलम अब,
सताती इजाहर.ए-खामोशी,
तिजारत बन चुकी खुशियां,
जियारत हुई जन खामोशी।

इजहार -ए-खामोशी होता,
जीने का एक सुंदर बहाना,
दूर रहे निजयार दोस्तों से,
नहीं पड़ता घर भी सजाना।

शाम-ए-उल्फत खूब सताया,
सोचा है इजहार-ए-खामोशी,
आपस में  तकरार बढ़ी यूं,
पल में ही तोड़ दे खामोशी।

सलामत रहे हुस्न ए जिंदगी,
मय्यत में दफन-ए-खाक हो,
क्यों बनी इजहार-ए-खामोशी ,
उठा दो जनाजा जो खामोशी।।

इजहार-ए-मुहब्बत बात,
जब मुंह से निकली पति ,
इजहार-ए-खामोशी पत्नी,
बढ़ाई निज काम की गति।

इजहार-ए-खामोशी कहते,
तन-मन को आराम देना,
तान किसी के नहीं सहना,
निज मन में मस्त रहना।

अपनों के आगे चुप्पी साधे,
समझ नहीं पाये जन आधे,
ठहरा न सकता कोई दोषी,
कहते इजहार-ए-खामोशी।

पत्नी ने कहा जोर से-सुनो,
चुप रहो मन के तराने बुनो,
दिखाओ ना अब गर्मजोशी,
कर दो इजहार-ए-खामोशी।

बताते लोग, हजारों फायदे,
कहते  इजहार-ए-खामोशी,
शांत रहना लाभकारी होता,
नहीं रखा कुछ हो गर्मजोशी।

मरहम का काम कर जाती,
कहते हैं इजहार-ए-खामोशी,
प्रेम अनुभूति मन पैदा होता,
जन का प्यार मिले गर्मजोशी।

डांट डपट से आहत हुआ,
किया इजहार-ए-खामोशी,
बोलने की सजा-ए-दर्द है,
निज को ही कहता हूं दोषी।
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Sunday, October 25, 2020

रावण/लंकेश/दशानन/दशकंधर/केकसी सुत....इत्यादि
विधा-दोहे
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असली रावण मर चुका, नकली रावण शेष।
जला रहे हैं आज भी, ढूंढ रहे अवशेष।।

नारी का अपमान कर, हुआ दशानन अंत।
महिला का सम्मान कर, कहते जग के संत।।

देख लंकेश जल रहा, ज्ञान हुआ बेकाम।
नारी के अपमान से, मानव हो बदनाम।।

घूम रहे हैं आज भी, रावण जैसे लोग।
चरित्र से वो गिर चुके, पर नारी का भोग।।

रावण बनकर लूटते, नारी इज्जत मान।
समाज में ही घूमते, इनको लो पहचान।।



अपने आप से कहता हूं

विधा-कविता
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अपने आपसे कहता हूं , रावण अभी जिंदा मरा नहीं,
घूम रहा है गलियों में वो मिल जाये यहां वहां कहीं,
कितनी नारियों पर आज रावण कर रहे हैं अत्याचार,
दुर्भाग्य इस देश में राम नहीं रावण को मिलता प्यार,
एक दिन आयेगा जब ये रावण जग से मिट जाएंगे,
अपने मन से कहता हूं वो दिन अब जल्दही आएंगे।।


अपने आपसे कहता हूं , रावण अभी जिंदा मरा नहीं,
घूम रहा है गलियों में वो मिल जाये यहां वहां कहीं,
कितनी नारियों पर आज रावण कर रहे हैं अत्याचार,
दुर्भाग्य इस देश में राम नहीं रावण को मिलता प्यार,
एक दिन आयेगा जब ये रावण जग से मिट जाएंगे,
अपने मन से कहता हूं वो दिन अब जल्दही आएंगे।।




विधा----कविता
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सिद्धिदात्री
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नौ रूपों में पूजते,
मां दुर्गा है नाम,
हर जन खुश रहे,
सुबह और शाम।

नौवां सिद्धिदात्री,
करे मंगल भारी,
भक्तों की रक्षा हो,
कष्ट मिटेंगे सारी,

सरस्वती का रूप,
जन मन लुभाता,
मां की कृपा रहे,
दुख नहीं सताता।

कमल,गदा, शंख,
हाथ सुदर्शन रखे,
दुष्टों का अंत करे
दानव से ना डरे।

कन्या मां रूप है,
करो उनकी सेवा,
सभी कष्ट मिटते,
मिलेगी बड़ी मेवा।
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कविता / सबल नारी
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कहते जिसको नारी,
वो लगती है बेचारी,
दुख- दर्द जहां मिले,
कष्टों से वो न हारी।

ऊंचे पहाड़ चढऩा है,
या फिर दिनभर काम,
कहने को अबला हो,
पर पूरे जगत में नाम।

बच्चे को, वो पालती,
शरीर से बेशक क्षीण,
सुख दुख की है साथी,
रखे नहीं भावना हीन।

अपना पेट पालती वो,
भूखी प्यासी करे काम,
इसलिए तो नारी जगत,
अनमोल बड़ी है बेदाम।

कोमल शरीर, बेशक है,
भार उठाती है वो भारी,
लाख मुसीबत आ जाये,
संकट देख नहीं वो हारी।

आज नारी का जगत में,
सबसे ऊंचा जग में नाम,
अंगुली दांतो तले दबाते,
देख देख उसका काम।।


Saturday, October 24, 2020

कुछ देर में जब
विधा-कविता

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कुछ देर में जब, रावण होगा दहन,
बुराइयां जल जाएंगी, मन हर्षाएंगी,
अगले वर्ष फिर रावण,सब जलाएं,
रावण खत्म न हो,कोई तो बतलाए?

कुछ देर में जब, बम होता विस्फोट,
बे-मौत मर जाते, उनका क्या खोट,
कब तक आतंकवादी,यूं ही सताएंगे,
आतंकवाद को कब जन मिटा पाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते हैं बलात्कार,
फिर गई एक औरत जिंदगी ही हार,
कब तब ये तमाशा देखते रह जाएंगे,
कोई बताए, बलात्कारी मिट पाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते हुआ शहीद,
एक-एक कब तक शहीद हो जाएंगे,
बैर भाव सीमा पर बढ़ता जा रहा है,
इस बैर भाव को कैसे हम मिटाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते हैं भ्रूण हत्या,
एक लिंग जांच गिरोह, और पकड़ा,
भ्रूण हत्या का पाप कैसे हम हटाएंगे,
देश के दरिंद्रों को कैसे हम मिटाएंगे?

कुछ देर में जब, औरत फांसी खाई,
आखिरकार ऐसी क्या नौबत है आई,
औरत अस्मिता को कैसे हम बचाएंगे,
अत्याचारियों को, कैसे मार गिराएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते एक समाचार,
एक औरत करवाती थी, देह व्यापार,
श्रीकृष्ण की भूमि ऐसा हो अत्याचार,
बताओ कैसे मिले नारी आदर सत्कार?

कुछ देर में जब, पकड़ते रिश्वतखोर,
श्रीराम की भूमि, ऐसा पाप करे घोर,
रिश्वत से कब उनके, पेट भर जाएंगे,
कब इनको भारत देश से मिटा पाएंगे?

कुछ देर में जब, कर डाली है हत्या,
वार कर दिया,  वो था जब निहत्था,
बेटे ने बाप को ही मारा,समाज हारा,
हत्यारों से कैसे बुजुर्गों को बचाओगे?

कुछ देर में जब,सुनते ठगी का काम,
ठग लिया जन दाम, रगड़ो बस बाम,
चोर और ठग, कैसे पकड़ में आएंगे,
कोई जवाब दे,कैसे इन्हें मिटा पाएंगे?

कुछ देर में जब, आएगा बड़ा तूफान,
गिर जाएंगे मकान, खत्म हो जन शान,
कैसे जग के जन, सुरक्षित बच पाएंगे,
लाख प्रयास करो फिर कुछ मर जाएंगे?

कुछ देर में जब,जन की हो जाती मौत,
कहते सुना लोगों से, भरा था तन खोट,
सारी धन दौलत पड़ी, मुफ्त में खाएंगे,
बताए, कैसे इस मौत को मात दे पाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते साधु व्याख्यान,
मौत अटल है सुन, जन बहुत हर्षाएंगे,
मान लेंगे उसे जाना था वो चला गया,
बताए, मन पर कैसे कोई काबू पाएंगे?

कुछ देर में जब, मन को यूं बहलाएंगे,
दुनिया जब तक रहेगी, बुराइयां रहेंगी,
बिछुड़े हुये का दर्द दुख फिर भुलाएंगे,
जिंदगी बीताकर जन,यूं ही चले जाएंगे।

कलियुग की विपत्तियां आएंगी वो घोर,
बढ़ते ही जाएंगे, भविष्य का नहीं छोर,
कुछ देर में जब, कहेंगे, जो हो होने दे,
काम सरकार का है,हमें नींद में सोने दे।।  
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कुछ देर में जब
विधा-कविता
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कुछ देर में जब, रावण होगा दहन,
बुराइयां जल जाएंगी, मन हर्षाएंगी,
अगले वर्ष फिर रावण,जब जलाएं,
रावण खत्म न हो,कोई तो बतलाए।

कुछ देर में जब, बम होता विस्फोट,
बे-मौत मर जाते, उनका क्या खोट,
कब तग आतंकवादी, यूं ही सताएंगे,
आतंकवाद को कब तक जला पाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते हैं बलात्कार,
फिर गई एक औरत जिंदगी ही हार,
कब तब ये तमाशा देखते रह जाएंगे,
कोई बताए, बलात्कारी मिट पाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते हुआ शहीद,
एक एक कब तक शहीद हो जाएंगे,
बैर भाव सीमा पर बढ़ता जा रहा है,
इस बैर भाव को कैसे हम मिटाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते हैं भ्रूण हत्या,
एक लिंग जांच गिरोह, और पकड़ा,
भ्रूण हत्या का पाप कैसे हम हटाएंगे,
देश के दरिंद्रों को कैसे हम मिटाएंगे?

कुछ देर में जब, औरत फांसी खाई,
आखिरकार ऐसी क्या नौबत है आई,
औरत अस्मिता को कैसे हम बचाएंगे,
अत्याचारियों को, कैसे मार गिराएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते एक समाचार,
एक औरत करवाती थी, देह व्यापार,
श्रीकृष्ण की भूमि ऐसा हो अत्याचार,
बताओ कैसे मिले नारी आदर सत्कार?

कुछ देर में जब, पकड़ते रिश्वतखोर,
श्रीराम की भूमि, ऐसा पाप करे घोर,
रिश्वत से कब उनके, पेट भर जाएंगे,
कब इनको भारत देश से मिटा पाएंगे?

कुछ देर में जब, कर डाली है हत्या,
वार कर दिया,  वो था जब निहत्था,
बेटे ने बाप को ही मारा,समाज हारा,
हत्यारों से कैसे बुजुर्गों को बचाओगे?

कुछ देर में जब,सुनते ठगी का काम,
ठग लिया जन दाम, रगड़ो बग बाम,
चोर और ठग, कैसे पकड़ में लाएंगे,
कोई जवाब दे,कैसे इन्हें मिटा पाएंगे?

कुछ देर में जब, आएगा बड़ा तूफान,
गिर जाएंगे मकान, खत्म हो जन शान,
कैसे जग के जन, सुरक्षित बच पाएंगे,
लाख प्रयास करो फिर कुछ मर जाएंगे?

कुछ देर में जब,जन की हो जाती मौत,
कहते सुना लोगों से, भरा था तन खोट,
सारी धन दौलत पड़ी, मुफ्त में खाएंगे,
बताए, कैसे इस मौत को मात दे पाएंगे?

कुछ देर में जब, सुनते साधु व्याख्यान,
मौत अटल है सुन, जन बहुत हर्षाएंगे,
मान लेंगे उसे जाना था वो चला गया,
बताए, मन पर कैसे कोई काबू पाएंगे?

कुछ देर में जब, मन को यूं बहलाएंगे,
दुनिया जब तक रहेगी, बुराइयां रहेंगी,
बिछुड़े हुये का दर्द दुख फिर भुलाएंगे,
जिंदगी बीताकर जन,यूं ही चले जाएंगे।

कलियुग की विपत्तियां आएंगी वो घोर,
बढ़ते ही जाएंगे, भविष्य का नहीं छोर,
कुछ देर में जब, कहेंगे, जो हो होने दे,
काम सरकार का है,हमें नींद में सोने दे।।  
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स्वरचित/नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
दुर्गा/जननी/अंबे/जगदंबे......इत्यादि
विधा-कविता
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मां दुर्गा को पूजते,
करती है बेड़ा पार,
सारे जगत का मां,
कहलाती आधार।

मां से बड़ा जग में,
देवी नहीं है कोई,
मां चाहे वो होती,
ना चाहे ना होय।

मेरी अर्ज सुन लो,
मां दुर्गा मां अंबे,
जीवन दुख मिटा,
मां देवी जगदंबे।

महागौरी कहाती,
जगत पालन हार,
तेरे दर्शन सदा हो,
जन्म मिले हजार।।
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पंखुड़ी
विधा-चोका
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फूल खिलता








मन तब हरता
सोच डरता
भंवरा भी मरता
चीज अजब
देती खुशबू जन
प्रसन्न मन
पंखुड़ी का जीवन
लगे सुहाना
चार दिन जीकर
वापस घर जाना।


Friday, October 23, 2020

चुनरी /दोहा छंद
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चुनरी मां की लाज है,
कहता जन संसार।
चुनरी ओढ़े मां कभी,
बढ़े जगत में प्यार। 2।
    *   *     *
चुनरी औरत ओढ़ती,
लज्जा इसको मान।
चुनरी में सजकर चले,
शादी उत्सव जान। 4।
*      *      *
नई नवेली नार जब,
चुनरी ओढ़े लाल।
शादी को इंगित करे,
हो मतवाली चाल। 6।
*      *      *
औरत सजती है कभी,
चुनरी उसकी लाज।
बाबुल यादें मन बसे,
खूब छुपाती राज। 8।
*     *      *

ओढ़ा चुनरी मात को,
बनते बिगड़े काम।
पाप हरेगी भक्त के,
स्वर्ग मिलेगा धाम। 10।


कन्या पूजन
विधा-कविता
*********************

कन्या एक वरदान है,
कर लो इसकी पूजा,
सबसे बड़ा धर्म होता,
नहीं बड़ा काम दूजा।

कन्या का संसार बड़ा,
मन को सभी सुहाता,
वो घर स्वर्ग बनता है,
जब कन्या कदम पाता।

कन्या को, देखो अब,
गर्भ में रहे हैं जन मार,
कन्या पालते जो जन,
मिलता है प्यार अपार।

कन्या घर में शोभा है,
साक्षात देवी का रूप,
कन्या की पूजा करता,
वो लगता है जन भूप।

कन्या जग में धर्म है,
आओ करे सब पूजा,
पुण्य से तन भर जाये,
नहीं धर्म इससे दूजा।।
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अमृत****************

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घोल दिया था अमृत तूने,
जीवन में बड़ा निराश था,
जब तुम बन भार्या आई,
मिला खुशबू अहसास था।

दिनरात एक चाहत होती,
चैन नहीं मिल, पाया था,
जिस दिन मायके गई तुम,
अन्न पानी ना लुभाया था।

शकुन मिलता था तुझ से,
जब तुम पास आती मेरे,
मैं तुमको घेरे रखता था,
ज्यों भंवरा फूल को घेरे।

हंसते मिल खाना खाते थे,
कभी रोने की सोची नहीं,
पर ऐसी बदकिस्मत बने,
सोचा था नहीं होगी कहीं।

छोड़ गई मझधार में तुम,
किससे हम दिल लगाये,
दुख का पहाड़ टूटा पड़ा,
दुख के बादल घिर आये,

महज आठ वर्ष साथ रहे,
छीन ली प्रभु ने तुम हमसे,
किसको सुनाऊं व्यथा निज,
दिल भरा हुआ है गम से।।
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कविता/

पढ़ाई 

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वाह वाह! क्या जमाना आया
आधुनिक पढ़ाई ने समझाया,
खाना पीना,हंसाना रोना गाना,
बस एक साथ ही मन लगाया।

कभी एकांत में पढ़ते थे छात्र,
मन लगाकर होता सब काम,
मेहनत के बल आगे बढ़ते थे,
होता था देश विदेश में नाम।

दिनरात एक कर देते थे सब,
अव्वल आते थे परीक्षा खूब,
मां बाप आशीर्वाद देते फिर,
पिलाते थे उन्हें घी और दूध।

बदल गया आज तो जमाना,
पढ़ रहे सुनते गाना संग संग,
मुंह से अपना खाना खा रहे,
टीवी देखते नहीं ध्यान भंग।

बालक हैं या बने कंप्यूटर,
क्या बुद्धि उन्होंने अब पाई,
बस पढ़ाई का तरीका देख,
सारी दुनिया बड़ी ही हर्षाई।

Thursday, October 22, 2020

 


नक्श- ए- पा    
विधा-दो दोहे
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मानव बनजा राम के,नक्श- ए- पा को देख।
तू  सीख  पाएगा  तभी , मर्यादा  के  लेख ।।

दिया विभीषण भेद तो  , राघव पाई जीत ।
बतलाओ हनुमान जी ,अनुचर है या मीत ।।
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नक्श-ए-वस
     दोहे
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मानव बनजा राम के,नक्श- ए- पा को देख।
तू  सीख  पाएगा  तभी , मर्यादा  के  लेख ।।

दिया विभीषण भेद तो  , राघव पाई जीत ।
बतलाओ हनुमान जी ,अनुचर है या मीत ।।
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   दोहे
मां चरणों में बैठकर, मिटे पाप संताप।
नक्श-ए-पा सदा चलो,माता हरती पाप।।

माता मेरी अर्ज है, सिर पर रखना हाथ।
पाप कर्म से दूर रख, हरदम देना साथ।।

मां कात्यायनी
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कात्यायन ऋषि के यहां, लिया जन्म मां रूप।
महिषासुर को मार कर, किये खुश देव भूप।।

मां का इस संसार में, सदा रहा है प्यार।
आशीर्वाद कभी मिले,कभी नहीं हो हार।।

देव खड़े संसार में, जोड़े दोनों हाथ।
मां के दर्शन चाहते, मात चाहते साथ।।



परिवार
विधा-कविता
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मिलता जहां का प्यार,
हर सदस्य का ऐतबार,
मुसीबत सहकर हजार,
बनता है सुंदर परिवार।

एकता की हो मिसाल,
पिता माता जाने हाल,
हुये विघटित परिवार,
लुप्त हैं संयुक्त परिवार।

कहीं भी जाये नाम हो,
मिलकर सब काम हो,
परिवार बनता धाम हो,
मिल बैठे जब शाम हो।

जगत की कहो इकाई,
महिमा दिल में बसाई,
ऐसा जग कमाये नाम,
कभी नहीं हो हंसाई।।

मिलती हरदम एकता,
तन से मिले अनेकता,
करते मिलजुल काम,
जगत में होता है नाम।

दूर दराज फैलती हो,
खुशबू जिस परिवार,
नाम कमाता है सदा,
साथ मिलेगा संसार।
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रावण मारीच संवाद
कविता
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हुई बुद्धि रावण भ्रष्ट,
पहुंचा मारीच पास,
बोला पास आ मेरे,
बात बड़ी ही खास।

सोने का मृग बनो,
सीता सम्मुख जा,
राम तेरे पीछे चले,
सीता को मैं लूं पा।

मारीच ने समझाया,
रावण आया तहस,
काट दूंगा सिर तेरा,
अगर करेगा बहस।

कहता हूं वैसा मान,
दूंगा तुमको उपहार,
नाम कर दूंगा  तेरा
मिले जहां का प्यार

आखिर मान गया वो,
बनकर सोने का हिरण,
रावण सीता हर लाया,
मौत को बुला लाया।।
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   कविता

महाषासुर था अभिमानी,
देव कर डाले थे परेशान,
देवों को तंग करना बनी,
महिषासुर  की पहचान।

कात्यायन ऋषि तपस्वी,
माता से की उन्हें पुकार,
उनकी पुत्री रूप में माता,
आई थी जग में ले प्यार।

महिषासुर को मार डाला,
देवता किये थे सभी खुश,
तीनों लोकों में प्यार फैला,
मिटाया पल में सारा दुख।

कात्यायन ऋषि के यहां,
जन्म लिया पली थी मां,
कात्यायनी वो कहलाई,
उनकी छवि मन बसाई।

सभी कष्ट दूर हो जाये,
जो रटते माता का नाम,
दुख दरिद्रता खत्म हो,
पल में पूर्ण सभी काम।
*********************

    कविता

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सबरी की भक्ति सुफल,
पहुंचे चलकर श्री राम,
सीता की खोज कर रहे,
आये थे सबरी के धाम।

प्रसन्न हुई सबरी देखकर,
खिला डाले झूठे ही बेर,
चलते चलते श्रीराम कहा,
आयेंगे हम चलकर फेर।

सबरी की भक्ति सफल,
पहुंची प्रभु के ही धाम,
सदियों तक चलता रहे,
सबरी श्रीराम का नाम।

प्रेम में शक्ति अपार है,
भक्त-प्रभु का है मेल,
सदियों तक याद रहे,
दिखाये प्रभु ने खेल।।