Friday, August 26, 2022

                       कैफियत

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विधा-कविता   
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कैफियत के लिए गये, वो मिला भला चंगा,
चाहे कोई काम करो, पर लेना कभी न पंगा।
जाना होता इस जग से, जगत हो एक सराय,
जीवन ऐसा हो इंसान, जैसे पवित्र होती गंगा।।

कैफियत गये अस्पताल,मिला अति परेशान,
रोग दूर नहीं हो रहा, निकल रही थी जान।
एक दिन ऐसा आता है, साथ कोई न देता,
हंसते गाते सो जाये, चादर एक लंबी तान।।

चार दिनों की जिंदगानी, पूछो सबका हाल,
पता नहीं किस दिन,बदले जमाने की चाल।
आज हम लो हँस रहे, कहल होंगे बदहाल,
पता नहीं किस घड़ी, होता जन मालामाल।।

जितना हंसना होता है,उतना ही रोना पड़ता,
धन दौलत पास मिले,पर फिर पड़ता सडऩा।
मात पिता और गुरुदेव समक्ष,कभी न अडऩा,
कपोल कल्पित बातें जग,कभी नहीं है घडऩा।।

कैफियत जानों मात पिता, जिन्हें तुमको पाला,
ऐसे कष्ट बताएंगे वो, मुंह पर लग जाये ताला।
सदा समदृष्टि रखो,हटा लेना आंखों का जाला,
संशय की बात चले जब,कहते दाल में काला।।

दर्द में डूबा मिलता है जन,किसको क्या कहेंगे,
जब तक यह दुनियादारी है, सुख दुख यूं रहेंगे।
दोस्त बना अपनों को, पराया कोई नहीं होता है,
एक दिन जब वो बिछुड़ जाये,नयन यूं ही बहेंगे।

राजा हो या रंक सभी को, जाना होता है जरूर,
फिर किस बात पर है, किस चीज का हो गरूर।
मिल जाये जैसा चाहा, खुशनसीबी कहलाती है,
अच्छे दिन जब आ जाये, मुख पर आता है नूर।।

कैफियत की बात सुनी, आया मन एक विचार,
जहां में कितने लोग हैं, देते हर जन को प्यार।
मुंह फुलाये घूम रहे जन, कैसी होती जिंदगानी,
प्रेम प्रीत इस जहां में कहलाती है जन आधार।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400




 

Wednesday, August 24, 2022

 कोमलता
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विधा-कविता   
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कोमलता वो गुण जहां,
समक्ष खुश होत इंसान।
सच्चे,साधु जन की यह,
बन जाती बड़ी पहचान।।

कोमलता देख सुकुमार,
भ्रमर आते हैं बड़े पास।
बस एक इस गुण कारण,
बन जाते हैं कितने दास।।

कोमलता सर्वोच्च गुण है,
पत्थर का कर देता मोम।
वाह वाह मुख से निकले,
पुलकित होता रोम रोम।।

कोमलता जिस दिल बसे,
पूर्ण कर लेता जग काम।
बस इक सुंदर गुण से ही,
हो जाता है जगत में नाम।।

कोमलता के नाम पर जन,
लेते नाम जग के ही फूल।
कोमलता को कम आंकना,
जन की होती है बड़ी भूल।।

कोमल होता जब मन जन,
दया, रहम के करता काम।
जिसके दिल में रहम मिले,
वो जाता है बस स्वर्ग धाम।।

कोमल हृदय जब हो नहीं,
पाप,अधर्म के करता काम।
अहित, अत्याचार दिनरात,
हो जाता है जगत बदनाम।।

कभी नहीं मुख मोडऩा है,
कोमलता गुण के सामने।
देवत्व गुण के समान हो,
हर जन लगे इसे जानने।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव



मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400


Tuesday, August 23, 2022

 सांवला रंग
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विधा-कविता   
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सांवला रंग मन को लुभाये,
कभी हँसे कभी मुस्कुराये।
श्रीकृष्ण सी बांसुरी अधर पे,
कितनी गोपियों को लुभाये।।

सांवला रंग पक्का होता जन,
सांवले की हो अजब अदायें।
सांवला मोहन हर दिल बसे,
हर जन के मन को भा जाये।।

सांवला रंग जगत में प्रसिद्ध,
कहकर गये कितने ही कवि।
और चमक आ जाती है जब,
चमके दमके नभ पर वो रवि।।

सांवला रंग हर दिल अजीज,
सांवले पर कर लेना विचार।
सांवली मूरत जब भी मिलती,
मन में उभरेगा अनहद प्यार।।

सांवला रंग देव जग रखवाला,
विष्णु और मनमोहन हैं एक।
अटल इरादे हर जन के खातिर,
दूर कर देते जब कष्ट हो अनेक।।

राधा प्रसन्न देखकर मनमोहन,
होती है प्रसन्न मन ही वो मन।
विष्णु के आठवें अवतार वो,
प्यारे लगते जग के जन जन।।

देवकी, वासुदेव के हैं प्रिय,
यशोदा और नंद के हैं प्यारे।
गीता का उपदेश दे दिया वो,
पापी जन को भी पार उतारे।।

सांवला रंग द्योतक जग देव,
नहीं कोई उनसे महान होगा।
जिसने उनकी महिमा सुन ली,
उसने ही स्वर्ग का सुख भोगा।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01



कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

Sunday, August 14, 2022

 घर से थे चले

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विधा-कविता   
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घर से चले थे, दोस्त के घर तक,
मिले थे कितने,लोग इस राह में।
कितनों ने पूछा, हाल अपना तो,
बहुत से मिले मित्रवत, चाह में।।

घर से चले थे, मिलने किसी से,
पहुंच गये तब,शिवभोले के द्वार।
प्रभु भजन में लीन हो गये इतने,
साधु संत संगति से हुआ प्यार।।

घर से चले थे,स्कूल की खातिर,
मिल गये पुराने मेरे गुरु भी वहां।
ज्ञान विज्ञान से भर दिया मुझको,
मुझको तो याद आया पूरा जहां।।

घर से चले थे,सिनेमा देखने को,
फिल्म लगी थी शहर में शहीद।
वीरों की कुर्बानी याद रहेगी हमें,
सेवा करते हैं दीपावली और ईद।।

घर से चले थे,वीरों से तब मिलने,
आयी देश के शहीदों की तब याद।
सोचा कि आजादी मिली मुश्किल,
अंग्रेज भी इंसां नहीं थे वो जल्लाद।।

घर से चले थे, वन गमन को तो,
मिले अनेकों पेड़,जीव और फूल।
मन में उमंग भर दी चहुं हरियाली,
याद आई हमको वो पुरानी धूल।।

घर से चले थे, यादों के बस सहारे,
कहीं लोग मिले थे साथी सम प्यारे।
मन में आया कि इनसे करूं यूं बात,
बहुत प्रिय होते थे कभी बुजुर्ग हमारे।।

घर से चले थे, आजादी जश्र मनाने,
तिरंगा लिये मिले लोग जाने पहचाने।
खो गये हम वीर,शहीदों की यादों में
कैसे दिन बीताये होंगे उन्हें प्रभु जाने।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400




Friday, August 12, 2022

राखी

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विधा-कविता   
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यम यमी का नाम, लेते लोग हर बार,
रक्षासूत्र यमी बांधा,मिला एक वरदान।
बहन भाई को राखी बांधे,बनूंगा रक्षक,
पूरे जहां में उसकी ही,बनी रहेगी शान।।

शीशुपाल वध किया, द्रोपदी बांधा चीर,
कृष्ण जी ने चीर हरण,हर ली थी पीर।
तब से रक्षा बंधन चला,आज भी चलता,
बहन भाई के दिल में, अनहद प्रेम पलता।

खुशियां लेकर आता, राखी का त्योहार,
भाई बहना हँस रहे, बढ़े सदा यूं प्यार।
जब तक भाई रहेगा,तब तक रहे बहना,
भाई की खातिर करें, बहना जग हजार।।

अटूट बंधन प्रेम का, राखी का त्योहार,
इस राखी में बंधा है, भाई बहना प्यार,
ऐसा पर्व कभी नहीं,आता ले लो हजार,
बेहना की रक्षा खातिर,भाई खड़ा तैयार।

एक वर्ष में आता है, बेसब्री से इंतजार,
राखी के पर्व में,यम यमी सा बंधा प्यार,
बहन जाती या भाई जाए, जाएगा जरूर,
मन खुशी से भरा हाता, नहीं होता गरूर।

एक एक धागे में, लाखों भरे आशीर्वाद,
इस राखी, इस बंधन को, रखते हैं याद,
यमराज भी देखकर प्यार,झुकता एकबार,
बहना के प्यार पर, कुर्बान जीवन हजार।

रक्षा पर्व यह कह रहा, उम्र हो वर्ष हजार,
हर वर्ष यह पर्व आये, बढ़ाये जन में प्यार,
बहन भाई को दे कहे, जीओ सालों साल,
जिंदगी में जीत मिले, कभी मिले नहीं हार।।

मेवाड़ की कर्णवती, भेजी हुमायू को राखी,
हुमायू ने लाज की खातिर,पहुंचा था मेवाड़।
रानी कर्णवती जौहर हुई, पूरे जगत में नाम,
रक्षा बंधन जब आये, आती याद यह शाम।।

सिकंदर पत्नी ने, पोरस को भेकजी थी राखी,
महाभारत युद्ध में, सैनिकों को बांधी राखी।
गुरुकुल में रक्षासूत्र, राखी का होता है रूप,
राखी वचन निभाते, चाहे प्रजा या हो भूप।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

Thursday, August 11, 2022

 सोने की चिडिय़ां

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विधा-कविता   
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चहुं ओर खुशहाली थी, हर घर में दीवाली थी,
स्त्री पुरुष नित हँसते जाये,रातें काली काली थी।
शिक्षा का प्रचार चहुं ओर, विदेशों तक था नाम,
धर्म कर्म में लीन सभी हो, दूध भरी थाली थी।।

विदेशों तक नाम देश का,तक्षशिला और नालंदा,
विदेशी जन पढऩे आये, ऐसा भारत देश महान।
शान और शौकत भरी हुई,हँसते मिलते हैं लोग,
कत्र्तव्यनिष्ठ हाली व पाली,जगत अनोखी शान।।

जयकारे गूंजते निस दिन,तिरंगा ऊंची रखे शान,
बच्चा बच्चा सुसभ्य लगता,कोई नहीं है अज्ञान।
देख देखकर यौवन जन का, माथे आये पसीना,
पेड़ और पौधे यूं लहराते, लगते नहीं हैं अंजान।।

नेता, वेत्ता, हर मुख पर,रामायण और महाभारत,
युवा, बेटियां देश मेरे की, ज्ञान विज्ञान में हैं रत।
श्रवण जैसे सुसंकारी, लगता देश मेरा है महान,
मेरे देश की खुशियों से,नहीं रहा है अब अज्ञान।।

सोने की चिडिय़ां होता था, आज भी हैं प्रमाण,
राम और सीता के उदाहरण, लक्ष्मण होता भाई।
धन-दौलत के भरे खजाने, ऐसा  मेरा होता देश,
देख देखकर जन की सुरक्षा, कुछ भी नहीं शेष।

शाम हुई तो चोरी ना डर, खुले पड़े सब दरवाजे,
कहीं भी देखो सुर बजते,बज रहे हैं ढोल व ताशे,
हर इंसान के दिल में रहता,एक बड़ा सा खटका,
देख ले भारत की सुंदरता,उसका ही दिल अटका

पतिव्रता अनगिनत नारी, भरा हुआ है भारत देश,
साधु संतों का लगे अखाड़ा,ज्ञान की बहती गंगा।
हर घर पर नक्काशी कही है,फहरे जहां पे तिरंगा,
चुस्त दुरुस्त हर इंसान,बुजुर्ग भी लगे भला चंगा

सोने की चिडिय़ां था सचमुच, मिलते हैं प्रमाण,
विदेशी ताकत झांक के न देखे,बहुत बड़ा नाम।
हर घर में मंदिर होता, लगता है बड़ा यह धाम,
सुनहरी भोर यहां आती, सुनहरी होती है शाम।।
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स्वरचित/मौलिक
******************
* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

Wednesday, August 10, 2022

 जहां तक हो



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विधा-कविता   
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जहां तक हो, कर लो गरीब की सेवा,
जिंदगी भर दुआ देंगे, वो काम आएगी।
पता नहीं पल भर का, क्यों इतराते हो,
एक बुलबुले सम,यह यूं चली जाएगी।।

जहां तक हो सके, बना प्यार की राह,
दुश्मनी जीवन भर, जन को सताएगी।
प्यार मुहब्बत में लुट जा, है काम की,
कमा ले धन दौलत,ये धरी रह जाएगी।।

जहां तक हो सके,कर ले जन का हित,
पाप,अधर्म बस तेरा नाश कर कर देंगे।
ये दोस्त तेरा छोड़ देंगे साथ, जरा सोच,
मौका मिला तो झट से धन छीन लेंगे।।

जहां तक हो सके तो, इंसान बनना है,
दुनिया में हजारों तो बन हैवान रहते हैं।
अच्छाई का फल मिलता मरने के बाद,
जग के लाखों साधु संत यही कहते हैं।।

जहां तक हो सके,भज ले नाम ईश्वर का,
यही वो सच्चा मित्र है, जो साथ देता है।
जहान में जिस पर घमंड, तुझे मिलता है,
वहीं जन एक तुझे पल में लूट लेता है।।

जहां तक हो सके,दुखा न दिल जन का,
बांट दे यह धन, बस आशीर्वाद पा लेना।
जिंदगी छोड़के जाना है,उस प्रभु के पास,
वहां कुछ साथ न जाये,हिसाब सब देना।।

जहां तक हो सके, सम्मान करना सीखो,
अपमान से दूर रहो,यूं नहीं कभी झीखो।
दर्द होता है कभी,खुद पर आन पड़ती है,
कभी ऐसी ही दास्तान,खुद की ही लिखो।।

जहां तक हो सके, खुशियां से घर भरो,
अगर कहीं हो सके,उस दाता से ही डरो।
एक दिन सब कुछ यहीं पड़ा रह जायेगा,
मौत भी गर आ जाए तो शान से तुम मरो।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400






Tuesday, August 09, 2022

                   चिट्ठी
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विधा-कविता   
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कागज का एक टुकड़ा, लाता है जब संदेश,
चिट्ठी जिसका नाम पड़ा,बदले पल में भेष।
अच्छे बुरे शब्दों से भरी, स्वर्णअक्षर भरे हुये,
हजारों किमी जाए, भारत हो या हो विदेश।।

अब नहीं आती चि_ियां, अब आते हैं संदेश,
चिट्ठियों ने बदला अब, मोबाइल का भेष।
युवा,बुजुर्ग,औरत हर इंसान, बन गया हैं फैन,
कहते सुना गया है, युवाओं ने बिगाड़ा है देश।।

कभी आती थी चिट्ठियां, गम और खुशी साथ,
पढ़ते रहते थे उसे घंटों, एक और दूजे के हाथ।
वीर गये मां की सेवा में, हो गये जाकर शहीद,
कभी कभी तो बच्चे भी हो जाते थे तब अनाथ।।

डाकिया लाकर देता था, करते घर घर इंतजार,
पढऩे की खातिर बुलाते, लिखा पढ़ा जो इंसान।
गम और खुशी शब्दों में भरी, कभी आता प्यार,
परदेश गये पतिदेव का, नारी करती रहे इंतजार।।

खत,चिट्ठी या लिफाफा, पूरे लबालब होते भरे,
एक एक शब्द में जान डाल दे, होते शब्द खरे।
कभी सुनने वाले प्रसन्न हो, कभी लगे डरे डरे,
कभी युद्ध की बात मिले, कितने साथी यूं मरे।।

क्या अजब जमाना था, फोन नहीं कभी होते,
कभी फौजी को गम में देख, दिल से ही रोते।
तीन चार दिन लग जाते, चिट्ठी आने जाने में,
पाक चिट्ठी मन प्रसन्न,छाती से लगाकर सोते।।

बदल गया है अब युग, चिट्ठी गधे का सींग,
जैसे खत्म कर दी जन, सावन की अब पींग।
पर वो जमाना बेहतर था, बुजुर्गों ने भी झेला,
अब तो हर जन को बस,देखा फोन झमेला।।

आने वाली पीढ़ी, चिट्ठी सुनकर हँसा करेगी,
कागज पर कलम चलाने से, वो हरदम डरेगी।
पर बुजुर्ग भुला नहीं सकते, चिट्ठी का संदेश,
सदियों तक याद रहेगा, मेरा सुंदर भारत देश।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

Sunday, August 07, 2022

 हरा रंग
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विधा-कविता   
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हरा रंग हरियाली का द्योतक,
सस्य धरती पर हो हरी भरी।
सब रंगों में नेक है यह रंग,
घस, दूध, फसल हरी हरी।।

सुग्राही रंग कहलाता हरदम,
घास पर चलो आंखों में दम।
खेत क्यार अगर पीले पड़ते,
जन को होता जमकर ही गम।।

हरियाणा में पार्टी की पगड़ी,
हरे रंग की धारण वे करते।
हरे रंग मेुं प्रकाश संश£ेषण,
हर प्राणी के कष्ट वो हरते।।

हरित क्रांति नाम पड़ा जब,
ई-बोरलोंग व नार्मन आये।
इतनी हरियाली धरा कर दी,
हरित क्रांति वो नाम कहाये।।

हरी पत्तेदार बाजार में मिले,
सब्जियां मन को लुभाती हैं।
वन्य जीव भी हरियाली ढूंढे,
हरियाली मन को तड़पाती है।।

सावन की जब बारिश होती,
चहुं ओर हरियाली छा जाये।
कृषक चले हल उठाके देखो,
हर इंसान के मन को हर्षाये।।

हरियाली हरे रंग का प्रतीक,
हर प्राणी के मन को लुभाये।
हरी डाल पर बैठकर पक्षी भी,
कितने ही सुरीले गीत सुनाये।

हरियाली से प्रेम जो करते हैं,
प्रकृति प्रेमी जग में कहलाते।
नहीं कभी घटने हरा रंग पाये,
हरे रंग जन जन को बहलाते।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400


Thursday, August 04, 2022


अब नहीं आती चिट्ठियां
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कविता
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अब नहीं आती चिट्ठियां, अब आते हैं संदेश,
चिट्ठियों ने बदला अब, मोबाइल का भेष।
युवा,बुजुर्ग,औरत हर इंसान, बन गया हैं फैन,
कहते सुना गया है, युवाओं ने बिगाड़ा है देश।।
कभी आती थी चिट्ठियां, गम और खुशी साथ,
पढ़ते रहते थे उसे घंटों, एक और दूजे के हाथ।
वीर गये मां की सेवा में, हो गये जाकर शहीद,
कभी कभी तो बच्चे भी हो जाते थे तब अनाथ।।
डाकिया लाकर देता था, करते घर घर इंतजार,
पढऩे की खातिर बुलाते, लिखा पढ़ा जो इंसान।
गम और खुशी शब्दों में भरी, कभी आता प्यार,
परदेश गये पतिदेव का, नारी करती रहे इंतजार।।
खत, चिट्ठी या लिफाफा, पूरे लबालब होते भरे,
एक एक शब्द में जान डाल दे, होते शब्द खरे।
कभी सुनने वाले प्रसन्न हो, कभी लगे डरे डरे,
कभी युद्ध की बात मिले, कितने साथी यूं मरे।।
क्या अजब जमाना था, फोन नहीं कभी होते,
कभी फौजी को गम में देख, दिल से ही रोते।
तीन चार दिन लग जाते, चिट्ठी आने जाने में,
पाक चिट्ठी मन प्रसन्न,छाती से लगाकर सोते।।
बदल गया है अब युग, चिट्ठी गधे का सींग,
जैसे खत्म कर दी जन, सावन की अब पींग।
पर वो जमाना बेहतर था, बुजुर्गों ने भी झेला,
अब तो हर जन को बस,देखा फोन झमेला।।
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स्वरचित एवं नितांत मौलिक
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-डा होशियार सिंह यादव
कनीना, जिला-महेंद्रगढ़, हरियाणा

फोन 09416348400

Wednesday, August 03, 2022

 घर घर तिरंगा
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विधा-कविता
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रामराज का सपना दिल में है,
क्या अजब राज होगा वो चंगा।
आजादी की खशियां दिल में,
फहराएगा अब घर घर तिरंगा।।

वीरों ने कुर्बानी झेली हैं जब,
मिली तिरंगे की बड़ी सौगात।
घर घर में तिरंगा अब फहरेगा,
मदभावन बन गई यह हालात।।

अंग्रेजी सितम कितने सहे हैं,
अब भारतवासी आजाद हुये।
तिरंगा खुशी से फहराएंगे यूं,
कितने ही आंसू जन के बहे।।

घर घर तिरंगा फहरा देना,
आजादी का जश्र मनाएंगे।
वीरों की गाथा सुन सुनकर,
हर जन को यह सुनाएंगे।।

काश वो आकर देखे वीर,
मिट जाए उनकी तन पीर।
तिरंगा घर घर देखकर वो,
बनके नाचेंगे यूं रांझा हीर।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400





Tuesday, August 02, 2022

 

तोल

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विधा-कविता
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गजब तमाशा देखते, कैसे कैसे लोग,
जिगर,दिमाग को तोलते,कैसा है रोग।
जिगर,दिमाग का संबंध मिलता बड़ा,
कहते हैं जगवाले इसको ही संजोग।।

जब तक दिमाग नहीं चलता कभी,
जिगर में नहीं बैठती जब कोई बात।
दोनों की जोड़ी बेहतर नहीं बनती है,
तब तक बनी रहती है बुरी हालात।।

तराजू के दो पलड़ों में कभी तोलो,
दिमाग और मस्तिष्क दोना बराबर।
दिल को बहुत सताता देखा गया है,
जब दिमाग में बैठ जाता कोई डर।।

विकसित देशों में अब तो चलता,
जिगर, मस्तिष्क का बड़ा व्यापार।
जिसके पास दोनों ही महान मिले,
उसे जहां में मिल जाता बड़ा प्यार।।

आओ स्वस्थ रखे जिगर, दिमाग,
दोनों बिना जीवन है जन अधूरा।
दोनों में अगर समन्वय मिल जाये,
जल्द से जल्द हो सब कुछ पूरा।।
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मौलिक/स्वरचित
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*होशियार सिंह यादव
वार्ड नंबर 1, मोहल्ला मोदीका
कनीना -123027
जिला-महेंद्रगढ़, हरियाणा
09416348400