Saturday, December 21, 2019

                                लघुकथा कुर्सी
'सर, आप रोजाना हमें चावल में एक घिया, पाव टमाटर, मिर्च डालकर मिड डे मील के नाम पर खिला रहे हो। कभी तो पौष्टिक खाना खिलाओ। पिछले मिड डे मील इंचार्ज बहुत कुछ पकवान बनाकर खिलाया करते थे। विद्यार्थियों ने मुख्याध्यापक से कहा।
मुख्याध्यापक ने रोषपूर्ण लहजे में कहा-सरकार एक बच्चे के प्रतिदिन छह रुपये 71 पैसे खाने के देती है। उसमें मैं क्या तुम्हें दूध जलेबी खिला दूं। रही बात बेहतर खाने की, मैं बेहतर खाना खिला रहूं। उस पर देखों मैंने एक आरामदायक बढिय़ा अपने लिए कुर्सी भी खरीदनी थी। जब एक नेता को कुर्सी पसंद हैं तो मुझे अपने आफिस में बैठने के लिए कुर्सी नहीं चाहिए?
....तो इसका मतलब हमारे खाने के पैसों से अपने लिए कुर्सी खरीदी है। कुछ जेब भर ली और कुछ पैसों की कुर्सी खरीदकर बच्चों के साथ क्या न्याय किया-बच्चे आपस में खुसर फुसर कर रहे थे।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**

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