Friday, January 03, 2020


ताऊ ताई संवाद
ताई बोली ताऊ से.......
पीली धरा को देखकर
मन लेता बहुत अंगड़ाई
ऐसा लगता ईश्वर आज
करे धरती मां की बड़ाई।
ताऊ बोला ताई से.....
गेहूं हरेभरे लहलहा रहे
भंवरों का  मचा  है शोर
बसंत अब आने वाला है
जंगल में नृत्य करता मोर,
धरती मां ले रही अंगड़ाई
पेड़ पौधों पर छाया नशा
यौवन में डूबी  है सरसों
भंवरों ने नाग सा है डसा।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**




                      मां का अहसास
16 वर्ष का होते ही राम का जन्म दिन मनाया जा रहा था। सभी प्रसन्न चित उन्हें गिफ्ट प्रदान कर रहे थे किंतु राम की नजरें आज उस हाथ को ढूंढ रहे थे जो सिर पर रखकर सच्चे मन से लंबी उम्र की दुआएं देते थे। आज वो हाथ कैंसर जैसी घातक बीमारी ने सिर से छीन लिए थे। अब तो महज दिखावा रह गया। सामने अपनी मां की टंगी तस्वीर को निहार राम ने उनसे आशीर्वाद पाते हुए मन ही मन कहा कि वे आज 16 साल के हो गए हैं। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी मां उनके सामने आकर कह रही थी-बेटा, मैं जग में बेशक नहीं किंतु आपको दिल में बसाकर आपकी लंबी उम्र की कामना करती हूं। राम के चेहरे पर रौनक लौट आई।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**



 स्तुति
हर जन चाहे स्तुति
करते फिर भी बुराई
ऐसे ऐसे काम करते
होती जग में  हंसाई,
चाहते सभी प्रशंसक
दूर भगा देते  दुश्मन
चाहते हो जन पवित्र
खुद का अशुद्ध मन,
बहा रहे हैं क्रोधाग्रि
चाहते जग की शांति
हाथ मिलते खुशी से
मन में रखते हैं क्रांति,
कब तक चलेगा यह
दोगले पन का नजारा
हमको तो  मिले धूर्त
धूर्त दोस्त नहीं हमारा।
**होशियार सिंह, लखक,कनीना,हरियाणा**


पेड़
हरे भरे खड़े हुए
पेड़ कितने  सुंदर
धरा के  शृंगार हैं
पेड़- पौधे, समुद्र,
मीठे  मीठे बेर है
खट्टे खट्टे हैं सेव
सबको अच्छे लगे
यादव हो  या मेव,
कहीं काजू  बिखरे
कहीं बिखरे बादाम
सबके मन को भाए
रस भरे पीले आम,
कांटे तो कहीं पुष्प
कहीं रंगीन हैं फल
उत्तम, सेहत मंद हैं
स्वास्थ्य का है हल।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**




कहानी
कक्षा में  शिक्षक ने
सुनाई सुंदर कहानी
क्यों बर्बाद कर रहे
घटता जा रहा पानी,
खाने पीने  में बर्बाद
बहा रहे जल बेकार
अपनी समझते जीत
परंतु बनेगी यह हार,
कपड़े, बर्तन  धो रहे
कर रहे  जल खराब
जल की  बचत करो
वरना पछताना जनाब,
जल अमृत, जल घृत
जल  जग का आधार





जल बचाओ हर घर
वरना मृत्यु को तैयार।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,महेंद्रगढ़**





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