सरस्वती
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मां मेरी सुन लो आज
मैं हूं ज्ञान का मोहताज
नैया मेरी पार लगा दो
या दे दो ज्ञान का ताज,
अज्ञानी का बनके ज्ञान
मन के अंधेरे मिटाओ
मेरी वाणी का तेज बन
अमिट ज्ञान से सजाओ,
कण कण में तू विराजे
तेरे कारण विद्वान साजे
ज्ञान का नाम कमाता है
उसकी वाणी में विराजे,
एक बार दर्शन दे देना
धन्य हो जाए तन-मन
बस ज्ञान का पिपासा हूं
नहीं चाहिए कोई धन।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
बापू
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वाह! बापू किए कमाल
ला दिया देश में भूचाल
अंग्रेज भाग जान बचाए
बदल दी देश की शान,
जब जब आंदोलन छेड़ा
अंग्रेज कांप उठे थर थर
तेरे को बापू नाम पुकारा
खुशियां मनी थी घर घर,
असहयोग, डांडी यात्रा
कभी चलाया असहयोग
सविनय अवज्ञा छेड़ा तो
जाग उठे देश के लोग,
अमर है बापू अमर रहो
जग में हो सुंदर मिशाल
जब जब धरा पर संकट
आना बनकर महाकाल।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
ताऊ ताई संवाद
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ताई बोली ताऊ से......
मां सरस्वती की पूजा करेंगे
फिर बनाएंगे पीला पकवान
पीले वस्त्र पहन कर निकले
बढ़ जाए बसंत पंचमी शान।
ताऊ बोला ताई से............
मोनू को पढऩे बैठाएंगे आज
यह शुभ दिन आया है आज
पढ़ लिखकर महान बन जा
फिर दिलों पर करेगा वो राज,
चारो ओर पीतांबर ओढ़कर
दूर दूर तक पीला नजर आए
एक दूजे के गले मिलकर लो
बसंत पंचमी का पैगाम दे जाए।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
सोच
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दोनों कई देर से झगड़ रहे थे। युवक बुजुर्ग से बार बार कह रहा था कि बीड़ी बंद कर दो क्योंकि इसकी धुआं प्रदूषण फैला रही है किंतु बुजुर्ग बार बार जिद पर डटा था कि तेरे बाप ने बीड़ी थोड़े दी है। मेरे पैसे लगे हैं और मैं तो इसे पूरे कस तक पीऊंगा। उधर से गुजरने वाले हर शख्स के कानों में जब बात पड़ती तो बस यही कहते-युवक ठीक कह रहा है किंतु बुजुर्ग के समझ नहीं आ रही थी जिसके चलते झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था। आखिरकार युवक घर को चला गया और कहा-ये लोग अनपढ़ हैं और इनके समझ में कुछ नहीं आता, अनपढ़ को समझाना अति कठिन कार्य है।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**










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