बेर रसीले
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बेर रसीले आए हैं
खाएंगे मिलके हम
सेहतमंद कहलाते
सेब से नहीं हैं कम,
बागों के बेर मोटे हैं
मिलता मिठास कम
झाड़ी बेर हो छोटे से
पचेरी बेर में हो दम,
गरीबों के होते सेब
मिलते खनिज लवण
मुंह में चबा चबाकर
स्वस्थ करो तन मन,
सस्ते में मिल जाते हैं
मिल जाए हर स्थान
बेर जरूर ही खाइये
तुच्छ वस्तु नहीं मान।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
ब्याह रचाने
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सेवानिवृत्ति पर रामू को साफा बांधकर रुपयों की माला पहनाकर बैंड बाजे के साथ घर तक छोडऩे जब घर की ओर घोड़ी पर बैठाकर रवाना किया तो महिलाएं छत से खड़ी समझ नहीं पाई कि यह सेवानिवृत्त हो रहा है या फिर और..? महिलाओं ने हंसकर कहा-बुरा वक्त आ गया है कि इतना बूढ़ा भी ब्याह रचाने निकल पड़ा। इसे शर्मा आनी चाहिए। इसके तो बेटे पोतों की शादी की जानी चाहिए थी। इतना सुनकर रामू को हंसी आ गयी। उससे रहा नहीं गया और कहा-मैं अपनी पत्नी से पुन: ब्याह रचाने चला हूं। उसका यह कथन सुनकर महिलाएं मौन हो गई।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
पेड़
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काट काटकर बेच रहे
घटते जाए वन जंगल
यदि पेड़ अधिक होंगे
जंगल में ही हो मंगल,
आरा चला रहा इंसान
सोच रहा बढ़ती शान
जब आक्सीजन ना हो
टूट जाए यह अभिमान,
हरी भरी ये प्रयोगशाला
इनको कभी ना काटिये
ये जीवन का आधार हैं
यह दर्द सभी से बांटिये,
जब तक इंसान रहता है
तब तक पेड़ पौधे रहेंगे
धरा पर अधिक पेड़ हो
हर जुबान से ये कहेंगे।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
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बेर रसीले आए हैं
खाएंगे मिलके हम
सेहतमंद कहलाते
सेब से नहीं हैं कम,
बागों के बेर मोटे हैं
मिलता मिठास कम
झाड़ी बेर हो छोटे से
पचेरी बेर में हो दम,
गरीबों के होते सेब
मिलते खनिज लवण
मुंह में चबा चबाकर
स्वस्थ करो तन मन,
सस्ते में मिल जाते हैं
मिल जाए हर स्थान
बेर जरूर ही खाइये
तुच्छ वस्तु नहीं मान।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
ब्याह रचाने
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सेवानिवृत्ति पर रामू को साफा बांधकर रुपयों की माला पहनाकर बैंड बाजे के साथ घर तक छोडऩे जब घर की ओर घोड़ी पर बैठाकर रवाना किया तो महिलाएं छत से खड़ी समझ नहीं पाई कि यह सेवानिवृत्त हो रहा है या फिर और..? महिलाओं ने हंसकर कहा-बुरा वक्त आ गया है कि इतना बूढ़ा भी ब्याह रचाने निकल पड़ा। इसे शर्मा आनी चाहिए। इसके तो बेटे पोतों की शादी की जानी चाहिए थी। इतना सुनकर रामू को हंसी आ गयी। उससे रहा नहीं गया और कहा-मैं अपनी पत्नी से पुन: ब्याह रचाने चला हूं। उसका यह कथन सुनकर महिलाएं मौन हो गई।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
पेड़
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काट काटकर बेच रहे
घटते जाए वन जंगल
यदि पेड़ अधिक होंगे
जंगल में ही हो मंगल,
आरा चला रहा इंसान
सोच रहा बढ़ती शान
जब आक्सीजन ना हो
टूट जाए यह अभिमान,
हरी भरी ये प्रयोगशाला
इनको कभी ना काटिये
ये जीवन का आधार हैं
यह दर्द सभी से बांटिये,
जब तक इंसान रहता है
तब तक पेड़ पौधे रहेंगे
धरा पर अधिक पेड़ हो
हर जुबान से ये कहेंगे।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**






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