Wednesday, January 29, 2020

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  • Mohan Singh शुभ दीपावली
    मान मिले सम्मान मिले,
    सुख - संपत्ति का वरदान मिले.
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बेहतर बारिश होने के बाद धरती के देवता किसान की बाजरे की फसल पकने लगी है। फसल पकने की खुशी में कनीना क्षेत्र में पतंगबाजी का पर्व मनाया जा रहा है जिसे हरियाली तीज नाम से जाना जाता है। आइये किसानों के महान पर्व हरियाली तीज में शरीक होकर लुत्फ उठाए तथा किसान की शान बढ़ाएं।
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यह हरी भरी लहलहाती फसल उपयोगी कम अनुपयोगी अधिक है। यह कंटीली चौलाई की फसल लहलहा रही है। किसानों के खेतों में खरपतवार बन गई है। कांग्रेस घास का स्थान इसी खरपतवार ने ले लिया है। परंतु इसको कुछ पशु एवं कुछ लोग सब्जी के रूप में प्रयोग करते हैं। सड़क के किनारे बहुत अधिक मिलती है।
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  • Repoter Sunill कुलदीप जी बस स्टैंड की नहीं सीनियर सैकेंडरी की फोटो है ये
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यह मौसम की मार कहे या कृषि वैज्ञानिकों का करिश्मा, अब बैंगन अब बैंगनी नहीं रहे हैं। उनका विभिन्न रंग मनमोहक होता है। लेखक होशियार सिंह के किचन गार्डन में कई रंग के बैंगन लगे हुए हैं परंतु उनमें बैंगनी कोई भी नहीं है।
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  • Sonu Thakur || राम राम जी ||
    अपना नया सोंग 🔊 Bhola Pive Pyali Pe Pyali 🔊 आ चुका है , सोंग कती कसुता अर जबरदस्त है,आप सबने बहुत पसंद आवेगा |
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रेतीले इलाके में पके हुए पीले पीले मधुर आम लगना कोसों दूर की बात नहीं रही है अपितु किसानों की जी तोड़ मेहनत ने कामयाबी हासिल कर ली है। कनीना में ही भीम कनीना मंडी, राजेंद्र सिंह नजदीक गैस एजेंसी, सिहोर वाटर पंप कनीना में मधुर पके हुए पीले आम पेड़ पर पके देख सकते हैं। अन्य कई जगहों पर आम के पेड़ खड़े हैं। जब पेड़ है तो आम भी लगेंगे ही।
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खीप या खीफ जिसे वैज्ञानिक भाषा में लेप्टाडिनिया स्पीशीज नाम से जाना जाता है, लगभग खेतों से लुप्तप्राय है। मिट्टी को जोड़े रखने में अहं योगदान होता है। रस्सी बनाई जाती है तथा ऊंट का बेहतर चारा है। सब्जी में भी काम में लेते हैं। इस पर पत्ते न के बराबर होते हैं तथा तना हरा होने के कारण पूरा तना भोजन बनाता है। रेगिस्तानी इस पौधे को यदा कदा कहीं खेतों में देखा जा सकता है। इसकी टहनियों को तोड़कर प्राप्त दूध को कपड़े पर लगाया जाता है तथा दूसरी ओर से फूंक मारने पर गुब्बारे जैसी आकृतियां मनमोहक लगती हैं।
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बताया जाता है गुरू मछेंद्रनाथ नें गोरक्षनाथ को कुरड़ी से 12 वर्षों बाद निकाला था तभी से कहावत है 12 सालों में कुरड़ी भी बावैड़े। वैसे भी कुरड़ी में पहले अपना धन दौलत एवं अंग्रेजों के समय हथियार छुपा लेते थे ताकि कोई शक न करें। भोला युग था चला गया किंतु अब फिर से कुरड़ी पेठे उगाने के लिए मशहूर होने लगी हैं।अधिक पेठे उगाने हो तथा बेहतर पैदावार लेनी हो तो कुरड़ी पर उगाओ और आम के आम गुठली के दाम पाओ।
ऐसी ही एक किसान परिवार से ओतप्रोत कांता पत्नी अजय मोड़ी ने बुद्धि का प्रयोग कि...
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बिन बादल बरसात और बिन ब्याई गाय दे रही है दूध, सुनने में अटपटे लगते हैं परंतु यह हकीकत है कि एक गाय बिना आगे की हुए तथा बिना ब्याई अचानक दूध देने लग गई है। परिवार के वारे न्यारे हो गए हैं। लोग आकर देख रहे हैं। तांता लग गया है। पशु चिकित्सक इसे संभव बता रहे हैं।
गांव नांगल मोहनपुर निवासी रोशन पुत्र जीतराम अपने ट्यूबवेल पर कृषि आदि से गुजर बसर करते हैं। उनके पास पहले से ही देशी नस्ल की गाय है जो डेढ़ वर्ष पूर्व दूध देना बंद कर चुकी थी। ऐसे में घर का गुजर बसर करने के लिए रोशन...
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बुजुर्गों के समय खरीफ फसल बतौर श्रीआई बहुत प्रसिद्ध शाक होती थी। अब यह महेंद्रगढ़ जिले में नजर नहीं आती है। रोहतक, रेवाड़ी के जैनाबाद, कोसली क्षेत्र व अन्य राज्यों में मिलती है। इससे साग व विभिन्न प्रकार की सब्जी बनाकर खून की कमी तथा पेट के रोग भगाते थे। रायता एवं कोफता लजीज बनता था। बुजुर्ग याद करके यादों में खो जाते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम सिल्वर कोकसकोंब है।
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चौलाई को आयुर्वेद में औषधीय पौधा माना जाता है तथा अरक्तता के रोगियों के लिए बेहतर होता है। शहरों में यह बिकती है परंतु चौलाई न होकर चौलावा होता है।
खरीफ फसल में उगने वाली खरपतवार चौलाई अब बहुत कम हो गई है। इसका स्थान चौलावा जिसे अमरंथस कहते हैं ने ले लिया है। अक्सर बारिश के मौसम में पैदा होने वाली चौलाई खाटा का साग, भाजी, पराठे, कढ़ी, विभिन्न सब्जियों में डालकर काम में लेते हैं।
कभी घर में मां बाप एवं बुजुर्गों की कद्र होती थी तथा प्रथम देव गणेश की पूजा की जाती रही है परंतु वक्त ने ऐसी करवट बदली है कि मां बाप एवं बड़ों को भुला दिया गया है वहीं गणेश जी को खेतों की रखवाली बैठा दिया है। अब उन्हें घर से बाहर निकाल दिया है। यह कैसी विडंबना है?

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