Thursday, January 30, 2020

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वाह हरियाणा
हिंदी, अंग्रेजी बोल न सके
पढऩा उनके लिए बहुत दूर
मिड डे मिल खा घर जाए
कापी किताब कर देते चूर,...
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तंबाकू जिसे निकोटियाना नाम से जाना जाता है। इसके प्रयोग का इतिहास करीब सवा चार सौ वर्ष पुराना मिलता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार तंबाकू एकमात्र सबसे अधिक मौत का कारण बन रहा है। उत्पादन में चीन एक नंबर पर भारत दूसरे नंबर पर है। यूं तो यह बिच्छू, मधुमक्खी काटने, कीटनाशी आदि के काम आता है। इसे बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चिलम, सिगार, हुलास, गुटखा, चबाने का तंबाकू आदि के रूप में प्रयोग कर रहे हैं।
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मित्रगणों, गत दिनों बथुआ पर विचार दिए थे उसको पढ़कर कुछ फोन भी मुझे आए और एक ने तो लिखा कि गलत जानकारी दी गई है। डाक्टर हरी सब्जी खाने की सलाह देते हैं किंतु वे शायद जानने की भूल कर रहे हैं कि बाथू सर्दियों में रबी फसल के साथ पैदा होता है उस वक्त मौसम में सर्दी होती है और बाथू की तासीर गर्म होने से शरीर के लिए लाभप्रद होता है किंतु मैंने गर्मियों में खड़े बथुआ का हवाला दिया है जो इस वक्त अनाप शनाप खड़ा है। इसका स्वाद इस वक्त कड़वा होता है जो शरीर के लिए गर्मी देगा तो गर्मी मे...
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  • Rajpal Singh मैं सर से पढ़ा हुआ हूँ सर कभी भी गलत जानकारी नहि देते है
    सर पहले नवोदय विद्यालय करीरा में पढ़ाते थे तब से मै सर को जानता हूँ लगभग 1990 से
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बाथू या बथुआ जिसे वैज्ञानिक भाषा में चिनोपोडियम एलबम नाम से जाना जाता हे। सर्दियों में गरीब एवं अमीर जन की बेहतर हरी सब्जी है जो किसान का खरपतवार कहलाती है। इसमें कार्बोहाइड्रट, प्रोटीन, विटामिन बी, सी, कैल्शियम, लोहा, मैग्रेशियम, मैंग्रीज, फास्फोरस, पोटाशियम, जिंक, सोडियम आदि खनिज लवण पाए जाते हैं। इसकी तासीर गर्म होती है। यह गर्मियों में भी भारी मात्रा में मिलने लगा है किंतु स्वाद में कड़वा होता है। इसको गर्मी के दिनों में सोच समझकर खाए क्योंकि तासीर गर्म है। गर्भवती महिला को तो अवश्य इससे बचना चाहिए।
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गांवों में जिसे अकसंड कहा जाता है उसे वैज्ञानिक भाषा में वाइथनिया सोम्निफेरा नाम से जाना जाता है। अश्वगंध नाम भी प्रचलित है जिसका अर्थ है घोड़े जैसी बदबू वाला। भारतीय गीनसेग भी कहा जाता है। करीब 3000 वर्षों से इसे काम में ले रहे हैं। पाक, घृत तथा कई अन्य रूपों में प्रयोग होता है किंतु ध्यान रहे यह लाभकारी तो है ही किंतु लंबे समय तक प्रयोग अनेकों बीमारियां उत्पन्न कर देता है। शारीरिक कमजोरी, बालों की समस्या, पशु रोग, कैंसर, खून में चीनी का नियंत्रण, त्वचा के रोग, गठिया उपचार तथा शुक्र संबंधित रोगों में उपयोगी दवाएं बनाई जाती हैं। इस क्षेत्र में यह झाड़ीनुमा पौधा पर्याप्त मात्रा में मिलता है।
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बोतल को साफ करने वाली ब्रश जैसे फूल जिस पौधे पर लगते हैं वह बोतल ब्रश कहलाता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में कैलिस्टेमाइन एक्युमिनेटस नाम से जाना जाता है। इसके पत्तों की चाय बनाई जाती है वहीं पशु के पेट के कीड़ों के लिए पत्ते काम आते हैं वहीं पौधा कीटों को दूर भगाने वाला, एंटी बायोटिक, एंटी आक्सीडेंट, एंटी फंगस के रूप में जाना जाता है जिसका अर्थ है कि आक्सीडेंट का विरोधी है, कीटो का विरोधी एवं फंगस का विरोधी गुण है। इस वक्त बहुत सुंदर लाल, पीले, संतरी, सफेद आदि फूल लगे हुए हैं।
अजरेटम कोनीजोइड्स एक गोट विड, चिक विड, व्हाइट विड नाम से जाना जाने वाला जहरीला पौधा है जो आमतौर पर गंदगी के आस पास मिलता है। यह जहरीला खरपतवार है जो कोढ़ व गठिया के इलाज में भी काम आता है। विस्तार से मेरे ब्लाग पर देखे।
hoshiarwriter.blogspot.in
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  • Ajit Sharma bina padhe to aaye 80%,se upper,padhene walo ki akal ho jaye kharab..............
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कनीना के सरकारी स्कूल में लोकसभा चुनावों में मधुमक्खियों के धावे में एक कुत्ते का पिल्ला, दो शिक्षक एवं अन्य काट खाने से घायल हुए थे। एक छत्ते में आमतौर पर 30 हजार मधुमक्खियां होती हैं जिनमें से केवल एक मादा जो प्रतिदिन 2,000 तक अंडे देती है, हजारों नर, कई हजार कुली मधुमक्खियां होती हैं। कुली सबसे अधिक काम करती हैं जो शहद लाला, बच्चों की देखभाल, डंक मारना आदि काम करती हैं। रेशम का कीट व मधुमक्खी ऐसे कीट हैं जो इंसान के काम आते हैं। इनकी एकता विश्व में प्रसिद्ध है। इंसान को इनसे सीख लेनी चाहिए।
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बव्वा की शीतला माता पर 11 मार्च को विशाल बासोढ़ा मेला लगा था, 18 मार्च को लगा है और 25 मार्च को अंतिम बार लगेगा। यहां बाल उतरवाने, शीतला मां की पूजा का विधान है। जो व्यक्ति गुडग़ांव की मां के दर्शन नहीं कर पाते वे यहां आते हैं।
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बेरी जिसे वनस्पति शास्त्र में जिजिप्स मौरिटियाना कहते हैं के फल बेर गरीबों के सेब कहलाते हैं जिनमें बहुत मात्रा में विटामिन सी व बी पाई जाती है। प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, चीनी, कैल्शियम, लोहा तथा फास्फोरस मिलता है। गरीब व अमीर को जरूर खाने चाहिए।
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भारत देश में ही नहीं वरन विदेशों तक योग की धूम मचा चुके एवं कनीना खंड के मोहनपुर नांगल में जन्में एवं लिखे पढ़े डा ओमप्रकाश महाराज योगिराज 12 से 15 मार्च तक मुफ्त योग शिविर नांगल स्कूल में लगाकर जन सेवा कर रहे हैं। हर वर्ष अपने जन्म दिन पर अपनी जन्म भूमि पर इस प्रकार का शिविर लगाते आ रहे हैं।
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कहने को तो यह पौधा सरसों का मामा या आक का मामा कहलाता है किंतु यह हकीकत में ओरोब्रांक है जिसका पौधा होने पर भी हरा रंग नहीं होता और यह परपोषी जीव है अर्थात आक या सरसों की जड़ों पर उगता है और उसका भोजन चूस जाता है। जिस प्रकार पशु या जन के पेट में जून जीव पाया जाता है या अमरबेल होती है ठीक उसी प्रकार यह परपोषी है। इस मामा को खेत में न जमने दे।

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