विषय-पर्दा विधा-कविता
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पुराने समय से चली आई,
महिलाएं करती आई पर्दा,
लाभ के साथ हानि होती,
पर्दे की होती आई स्पर्धा।
समय बीता फिर आया है,
पर्दा हटता गया चेहरे का,
दूर से पता लग जाता अब,
स्त्री का कौन परिवार डेरा।
पर्दा प्रथा बहुत बुरी रही है,
कितनी महिलाएं चढ़ी भेंट,
पर्दा करके पहचान न होती,
जब तक घर में घुसे न ठेठ।
पर्दा कभी अच्छा भी होता,
लोकलाज की हो पहचान,
हर घर में नारी की कद्र हो,
पर्दा बड़ों से रखता है राज।
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दोहा
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लोग आस्तीन सांप बन, करते पहले प्यार।
देखा मौका डस लिया , अजब गजब संसार।।
ख्याल करे वो रात दिन, खुल जाती है पोल।
जन की कीमत जान लेे, जीवन है अनमोल।।
प्यास धरा की जब मिटे, होती बारिश खूब।
दादुर गाये गीत तो , हरी भरी हो दूब।।
सोच बुरी मत लाइये, होता है बदहाल।
खान पान अब हो गया, मानव का ही काल।
आस्तीन के सांप तो, घूमे फिरे हजार।
नजर उठा कर देख लो, धोखा है संसार।।
विषय-बचपन की यादें
विधा-कविता
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तितली से उड़े,जोश उर में भरे, नहीं फरियादें,
खिलौने हाथी, मन को सताती,बचपन की यादें।
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नाव का खेल,डंडे से मेल,कंची खेले शहजादे,
पतंग उड़ाना,पेच लड़ाना, वो बचपन की यादें।
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झिरनी खेल,मां की गोद,बापू प्यार,शोर मचादे,
बच्चों संग खेल,दंगा फसाद,वो बचपन की यादें।
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तख्ती लेखन,बारहखड़ी रटना,पेट कभी फूलाते,
शिक्षक मार,खेल में हार,दोस्त बेकार हैं वो यादें।
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बनके मोर, करते शोर, शरारत कर नाम लगादे,
कभी सिपाही कभी चोर,देखते मोर,बाकी यादें।
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लुक्का छिपी,चांदनी खेल,बच्चों से मेल,मार भगादे,
हंसना रोना,वो बिछौना, बाकी हैं जहन में यादें।
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यादें वो बचपन,उम्र हैं पचपन,अब तो बस भुला दे,
रोते हैं अब,यादों में अब,मरते दम तक बाकी यादें।।
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विषय-शरारत
विधा-कविता
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शरारत होती है बुरी,
कभी नहीं करना है,
शरारत करने से सदा,
जन को ही डरना है।
शरारत बने मजाक तो,
इंसान की होती है हार,
शरारत करने पर शिष्य
पाता है शिक्षक की मार।
शरारती बच्चा भी जग,
खा जाता है कभी मार,
शरारत जान पर बनती,
जीवन बन जाए बेकार।
शरारत से तोबा कर लो,
शरारत से न चले काम,
शरारत बुरी बताई जगत,
शरारत से नाम बदनाम।





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