दोहाक्षरी
विधा-दोहा
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सूप-
*****
सूप टमाटर पीजिये, रोग करो सब दूर।
करें विटामिन फायदा, तन पर आये नूर।।
थोथा-
थोथा जग में बाजता, अंदर होती खाक।
जगत चले इस राह पर, बने एक दिन राख।।
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दोहा
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साधु रूप इंसान का, करे जगत उपकार।
प्यार सभी में बाँटकर, तन मन करे सुधार।।
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विधा-दोहा
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नियति कभी न छोड़ती, राजा हो या रंक।
परीक्षित के प्रताप को, तक्षक मारा डंक।।
यश-अपयश दो मूल हैं, जीवन नहीं विराम।
संकट सारे दूर हो, मन से भज ले राम।।
नियति कभी न छोड़ती, करो बेशक प्रयास।
झुकता है संसार भी, तब होता अहसास।।
जीवन मरण चला सदा, मत ना सोच विचार।
अटल सत्य को जान ले, जीवन मिला उधार।।
एक वक्त इंसान को, मिलते दोस्त हजार।
कभी कहीं तो जीव को, मिलता कभी न प्यार।।
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विधा-कविता
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बह रहा जल कह रहा,
पल पल जगत कहानी,
आना मत कभी सामने,
करना कभी न मनमानी।
अंबर से जल बरसता,
भरता जोहड़, तालाब,
पानी पेड़ों को मिलता,
आएगी पल पल आब।
कई रूपों में मिलता है,
जोहड़ नदी, महासागर,
कोई प्रसन्न हो देखकर,
कोई भर रहा है गागर।
पांच तत्व हैं जगत के,
उनमें से एक हो जल,
दर्द, रोग सब दूर हो,
पीलो जमकर ही जल।।
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विधा-कविता
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वसुदेव चल पड़े ले
श्रीकृष्ण को उठाय,
यमुना बहा पूरा था,
पैर लगा तो बचाय।
गोकुल में पहुंचे तो,
नंद को दिया सौंप,
देख देख मन प्रसन्न,
राधा, नंद और गोप,
यशोदा की लड़की,
लेकर आया जेल,
प्रभु की माया चली,
कैसा खेला था खेल,
देवकी का पुत्र कहे,
पले वो नंद के द्वार,
कंस का अंत किया,
पल में गया वो हार।
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उल्हाना
विधा-कविता
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लाख उल्हाना दे रही,
गोपियां मिलकर सारी,
कहती यशोदा माता से,
सुन लो ये अर्ज हमारी,
कृष्ण छेड़ता हैं हमको,
आ जाता नदी किनारे,
जब हम नहाए जल में,
कपड़े उठाता है हमारे,
राधा सुन सुन हंस रही,
कैसी करती बातें सारी,
मां यशोदा भी हंस रही,
लगती सूरत अति प्यारी।
खूब उल्हाना सुनकर वो,
पूछेंगी वो बातें ये सारी,
बस अबकी आने दे तो,
माफ करो अबकी बारी।
विधा-दोहा
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सूप-
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सूप टमाटर पीजिये, रोग करो सब दूर।
करें विटामिन फायदा, तन पर आये नूर।।
थोथा-
थोथा जग में बाजता, अंदर होती खाक।
जगत चले इस राह पर, बने एक दिन राख।।
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दोहा
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साधु रूप इंसान का, करे जगत उपकार।
प्यार सभी में बाँटकर, तन मन करे सुधार।।
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विधा-दोहा
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नियति कभी न छोड़ती, राजा हो या रंक।
परीक्षित के प्रताप को, तक्षक मारा डंक।।
यश-अपयश दो मूल हैं, जीवन नहीं विराम।
संकट सारे दूर हो, मन से भज ले राम।।
नियति कभी न छोड़ती, करो बेशक प्रयास।
झुकता है संसार भी, तब होता अहसास।।
जीवन मरण चला सदा, मत ना सोच विचार।
अटल सत्य को जान ले, जीवन मिला उधार।।
एक वक्त इंसान को, मिलते दोस्त हजार।
कभी कहीं तो जीव को, मिलता कभी न प्यार।।
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विधा-कविता
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बह रहा जल कह रहा,
पल पल जगत कहानी,
आना मत कभी सामने,
करना कभी न मनमानी।
अंबर से जल बरसता,
भरता जोहड़, तालाब,
पानी पेड़ों को मिलता,
आएगी पल पल आब।
कई रूपों में मिलता है,
जोहड़ नदी, महासागर,
कोई प्रसन्न हो देखकर,
कोई भर रहा है गागर।
पांच तत्व हैं जगत के,
उनमें से एक हो जल,
दर्द, रोग सब दूर हो,
पीलो जमकर ही जल।।
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विधा-कविता
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वसुदेव चल पड़े ले
श्रीकृष्ण को उठाय,
यमुना बहा पूरा था,
पैर लगा तो बचाय।
गोकुल में पहुंचे तो,
नंद को दिया सौंप,
देख देख मन प्रसन्न,
राधा, नंद और गोप,
यशोदा की लड़की,
लेकर आया जेल,
प्रभु की माया चली,
कैसा खेला था खेल,
देवकी का पुत्र कहे,
पले वो नंद के द्वार,
कंस का अंत किया,
पल में गया वो हार।
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उल्हाना
विधा-कविता
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लाख उल्हाना दे रही,
गोपियां मिलकर सारी,
कहती यशोदा माता से,
सुन लो ये अर्ज हमारी,
कृष्ण छेड़ता हैं हमको,
आ जाता नदी किनारे,
जब हम नहाए जल में,
कपड़े उठाता है हमारे,
राधा सुन सुन हंस रही,
कैसी करती बातें सारी,
मां यशोदा भी हंस रही,
लगती सूरत अति प्यारी।
खूब उल्हाना सुनकर वो,
पूछेंगी वो बातें ये सारी,
बस अबकी आने दे तो,
माफ करो अबकी बारी।





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