दोहा
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आजादी अब रो रही, भूल रहे हैं मोल।
लाखों सैनिक जिंदगी, दी थी पल में तोल।।
स्वतंत्रता जब से मिली, वीरों पर है नाज।
उन्हें भूल सकते नहीं, खुशी मनाए आज।।
हुई अनुभूति जब हमें, नमन किया हर वीर।
दे कुर्बानी देश को, जन की हरते पीर।।
इस सुरभित संसार में, वीर लगे ज्यों फूल।
कर लो वंदन देश का, चंदन मानो धूल।।
तिरस्कार जन का नहीं, लाखों कहते संत।
बड़ी भूल जग मानता, होगा वरना अंत।।
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विषय-आजाद परिंदा
विधा-कविता
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पिंजरे में बंद पंछी,
रोता मिले दिनरात,
स्वतंत्रता मन लिये,
बुरे होते हैं हालात।
कौन सुने पीर तब,
घुट घुट बहता नीर,
परतंत्रता बड़ी बुरी,
कोई नहीं हरे पीर।
दम तोड़ देता कभी,
रातभर मिले न चैन,
आजादी को तरसते,
सुबह शाम तब नैन।
तड़पे पंछी दिनरात,
परतंत्रता बुरी बताई,
खाना पीना हराम है,
दर्द से मन भर आई।
आजाद जब पंछी हो,
खुशी का नहीं है ठोर,
देख देख आजादी को,
मन के नाच उठे मोर।
नीले अंबर में उड़ता,
मन में भरा हो जोश,
खाना मिले या नहीं,
नहीं कोई अफसोस।
जहां भी इच्छा होती,
परिंदा भरता उड़ान,
पंख होते अति सुंदर,
पंछी की यही शान।
कोई उसे ना रोकता,
कोई करे न उपहास,
चेहरे पर मुस्कान हो,
नहीं मिले वो उदास।
नभ उसका है संसार,
करता पेड़ों से प्यार,
कई किलोमीटर उड़े,
दिल में खुशी हजार।
ठीक यही हालात है,
जब कोई हो परतंत्र,
खुशी ठिकाना न हो,
होता जब वो स्वतंत्र।
भारत भी परतंत्र था,
पिंजरबंद ज्यों परिंदा,
अंग्रेजी शासन लगा,
जैसे हो कोई दरिंदा।
वीर देशभक्त आये थे,
खाई कितनी ही फांसी,
देख -देख अंग्रेजों की,
बंद हो गई सारी हाँसी।
एक दिन भारत के जन,
अंग्रेजों ने किये आजाद,
वो आजादी का दिन है,
भारतवासी बने फौलाद।
भारत आज आजाद है,
जैसे आजाद हो परिंदा,
जश्न मना रहे आजादी,
मार भगाये गौरी दरिंदा।
आजाद परिंदे देशवासी,
आजादी का मचा शोर,
स्वच्छंद उड़ रहे सभी,
मन में सभी हैं विभोर।
आजाद परिंदा देख लो,
बच्चे -बच्चे की जुबान,
आजादी दी बहादुरों ने,
पूरे जग में उनका नाम।
हर जन आजाद परिंदा,
भारत देश अब आजाद,
भरो नभ में ऊंची उड़ान,
दुनिया रखेगी तुम्हें याद।
दुनिया रखेगी............।।
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भरत के वीर कविता
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देशभक्तों की भूमि भारत, हर बच्चा एक पहचान है,
वीर,शहीद,देशभक्त इसके,भारत मां की सुंदर शान हैं,
नमन आज उन वीरों को,जिन्होंने दिया बलिदान है,
भारत शहीदों का धाम है,मेरे वीरों का एक पैगाम है।
जतींद्र नाथ दास हुये हैं,जिन्हें जेल में जान गंवाई थी,
खुदीराम बोस ने देखो , हंँस हँसकर फांसी खाई थी,
अशफाक चढ़े फांसी पर, बिस्मिल ने तान सुनाई थी।
उनकी कुर्बानी के बल पर, जगत में ही नाम कमाई थी।
धोखा देकर, गद्दारी कर, पीठ पर वो वार करते हैं,
जांबाजों का नाम सुनकर, दुष्ट गीदड़ भांति डरते हैं,
माटी को जब सलाम करे, देशभक्त जो आगे बढ़ते हैं
दुश्मन को वे पकड़ पकड़,कीड़ों की भांति मसलते हैं।
तिरंगा हमारा झुकने न पाये, माटी को सींचा खून से,
उनकी कुर्बानी रंग लाती है,देश प्रेम के एक जुनून से,
सोने की चिडिय़ा होता था, सभ्यता संस्कृति से भरपूर,
तगड़े, छैल गबरू,जवान हैं,भारतवासी को होता गरूर।
ऋणी रहेगा बिस्मिल का,देशभक्ति की बनते मिसाल,
दुश्मन तो क्या उन्हें छू पाये,नहीं छू पाए उनको काल,
चलती रहेगी परंपरा यूं, भूला नहीं पायेगा यह जहान,
सोने की चिडिय़ा फिर बनेगा, बच्चा बच्चा गायेगा गान।।
याद आता है बीता वो जमाना,बिस्मिल फांसी खाई थी,
भारत के बच्चे बच्चे ने, अपने सीने पर गोली खाई थी,
आजादी पाने की खातिर, जन जन की बलि चढ़ाई थी,
तब आजाद हुई मातृभूमि, हर जन ने खुशी मनाई थी।
आजादी का जश्र मनाये, बस करो, बिस्मिल को याद,
एक दीया याद में जला दो, बस इतनी है मेरी फरियाद,
दीवाली,होली ईद मनाते, उनका भी कुछ करो यशगान,
है सौगंध तुम्हें नहीं भूलेंगे, देश की हो सच्ची पहचान।।
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आजादी अब रो रही, भूल रहे हैं मोल।
लाखों सैनिक जिंदगी, दी थी पल में तोल।।
स्वतंत्रता जब से मिली, वीरों पर है नाज।
उन्हें भूल सकते नहीं, खुशी मनाए आज।।
हुई अनुभूति जब हमें, नमन किया हर वीर।
दे कुर्बानी देश को, जन की हरते पीर।।
इस सुरभित संसार में, वीर लगे ज्यों फूल।
कर लो वंदन देश का, चंदन मानो धूल।।
तिरस्कार जन का नहीं, लाखों कहते संत।
बड़ी भूल जग मानता, होगा वरना अंत।।
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विषय-आजाद परिंदा
विधा-कविता
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पिंजरे में बंद पंछी,
रोता मिले दिनरात,
स्वतंत्रता मन लिये,
बुरे होते हैं हालात।
कौन सुने पीर तब,
घुट घुट बहता नीर,
परतंत्रता बड़ी बुरी,
कोई नहीं हरे पीर।
दम तोड़ देता कभी,
रातभर मिले न चैन,
आजादी को तरसते,
सुबह शाम तब नैन।
तड़पे पंछी दिनरात,
परतंत्रता बुरी बताई,
खाना पीना हराम है,
दर्द से मन भर आई।
आजाद जब पंछी हो,
खुशी का नहीं है ठोर,
देख देख आजादी को,
मन के नाच उठे मोर।
नीले अंबर में उड़ता,
मन में भरा हो जोश,
खाना मिले या नहीं,
नहीं कोई अफसोस।
जहां भी इच्छा होती,
परिंदा भरता उड़ान,
पंख होते अति सुंदर,
पंछी की यही शान।
कोई उसे ना रोकता,
कोई करे न उपहास,
चेहरे पर मुस्कान हो,
नहीं मिले वो उदास।
नभ उसका है संसार,
करता पेड़ों से प्यार,
कई किलोमीटर उड़े,
दिल में खुशी हजार।
ठीक यही हालात है,
जब कोई हो परतंत्र,
खुशी ठिकाना न हो,
होता जब वो स्वतंत्र।
भारत भी परतंत्र था,
पिंजरबंद ज्यों परिंदा,
अंग्रेजी शासन लगा,
जैसे हो कोई दरिंदा।
वीर देशभक्त आये थे,
खाई कितनी ही फांसी,
देख -देख अंग्रेजों की,
बंद हो गई सारी हाँसी।
एक दिन भारत के जन,
अंग्रेजों ने किये आजाद,
वो आजादी का दिन है,
भारतवासी बने फौलाद।
भारत आज आजाद है,
जैसे आजाद हो परिंदा,
जश्न मना रहे आजादी,
मार भगाये गौरी दरिंदा।
आजाद परिंदे देशवासी,
आजादी का मचा शोर,
स्वच्छंद उड़ रहे सभी,
मन में सभी हैं विभोर।
आजाद परिंदा देख लो,
बच्चे -बच्चे की जुबान,
आजादी दी बहादुरों ने,
पूरे जग में उनका नाम।
हर जन आजाद परिंदा,
भारत देश अब आजाद,
भरो नभ में ऊंची उड़ान,
दुनिया रखेगी तुम्हें याद।
दुनिया रखेगी............।।
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भरत के वीर कविता
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देशभक्तों की भूमि भारत, हर बच्चा एक पहचान है,
वीर,शहीद,देशभक्त इसके,भारत मां की सुंदर शान हैं,
नमन आज उन वीरों को,जिन्होंने दिया बलिदान है,
भारत शहीदों का धाम है,मेरे वीरों का एक पैगाम है।
जतींद्र नाथ दास हुये हैं,जिन्हें जेल में जान गंवाई थी,
खुदीराम बोस ने देखो , हंँस हँसकर फांसी खाई थी,
अशफाक चढ़े फांसी पर, बिस्मिल ने तान सुनाई थी।
उनकी कुर्बानी के बल पर, जगत में ही नाम कमाई थी।
धोखा देकर, गद्दारी कर, पीठ पर वो वार करते हैं,
जांबाजों का नाम सुनकर, दुष्ट गीदड़ भांति डरते हैं,
माटी को जब सलाम करे, देशभक्त जो आगे बढ़ते हैं
दुश्मन को वे पकड़ पकड़,कीड़ों की भांति मसलते हैं।
तिरंगा हमारा झुकने न पाये, माटी को सींचा खून से,
उनकी कुर्बानी रंग लाती है,देश प्रेम के एक जुनून से,
सोने की चिडिय़ा होता था, सभ्यता संस्कृति से भरपूर,
तगड़े, छैल गबरू,जवान हैं,भारतवासी को होता गरूर।
ऋणी रहेगा बिस्मिल का,देशभक्ति की बनते मिसाल,
दुश्मन तो क्या उन्हें छू पाये,नहीं छू पाए उनको काल,
चलती रहेगी परंपरा यूं, भूला नहीं पायेगा यह जहान,
सोने की चिडिय़ा फिर बनेगा, बच्चा बच्चा गायेगा गान।।
याद आता है बीता वो जमाना,बिस्मिल फांसी खाई थी,
भारत के बच्चे बच्चे ने, अपने सीने पर गोली खाई थी,
आजादी पाने की खातिर, जन जन की बलि चढ़ाई थी,
तब आजाद हुई मातृभूमि, हर जन ने खुशी मनाई थी।
आजादी का जश्र मनाये, बस करो, बिस्मिल को याद,
एक दीया याद में जला दो, बस इतनी है मेरी फरियाद,
दीवाली,होली ईद मनाते, उनका भी कुछ करो यशगान,
है सौगंध तुम्हें नहीं भूलेंगे, देश की हो सच्ची पहचान।।




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