दोहा
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पत्रकारिता बन गई, झूठ कपट व्यापार।
देख सचाई रो रही, स्वार्थ भरा संसार।।
बारिश जब होती कभी, टिड्डे करते शोर।
नभ के बादल देखकर, नाचे वन में मोर।।
रणभेरी की तान पर, थिरके पैर जवान।
मारे काटे दुष्ट को, तब होती पहचान।।
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स्वरचित/मौलिक
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दोहा
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पत्रकारिता बन गई, झूठ कपट व्यापार।
देख सचाई रो रही, स्वार्थ भरा संसार।।
बारिश जब होती कभी, टिड्डे करते शोर।
नभ के बादल देखकर, नाचे वन में मोर।।
हो अपनापन प्रीत मेें, बढ़े जगत में प्यार।
जब विज्ञापन दान का, पुण्य कर्म बेकार।।
रणभेरी की तान पर, थिरके पैर जवान।
मारे काटे दुष्ट को, तब होती पहचान।।
पत्रकारिता सो रही, चिरनिद्रा में आज।
झूठ कपट ही कर रहे, सच्चाई पर राज।।
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विषय-मेरा इकलौता इश्क है तू
विधा-कविता
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दिल से लगाया है तुमको,
नहीं बची है कोई आरजू,
मन प्रफुल्लित हो जाता सुन,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
हुस्न कहे निज इश्क से,
सब कुछ अर्पित कर दूं,
सारी तमन्नाएं पूर्ण होती,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
हुस्न के किस्से सुनते खूब,
हुस्न की सदा बचती रूह,
हुस्न जब इश्क से कहता,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
हुस्न इश्क की चर्चा मिले,
कहे बढ़कर आगोश में लू,
मरकर अमर हो जाते जब,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
मिटा नहीं इश्क कभी भी,
कभी आये थे लैला मजनूं,
सदियों तक वो याद रहेंगे,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
है अमर इस जगत अभी,
कितने ही आशिक मजनू,
कहीं शीरी फरियाद कहा,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
सोहनी महिवाल हुये जग,
वो नजारे आँखों में भर लू,
सोहनी फिदा होकर कहे,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
अमरदीप है नाम हुस्न का
इश्क जहां का राज लिखूं,
सदा बसे हुस्न इश्क दिल,
मेरा इकलौता इश्क है तू।
इश्क कहे खुश होकर अब,
हुस्न की खाली झोली भर दूं,
हुस्न कहती अपने इश्क से,
मेरा इकलौता इश्क है तू।।
,मेरा इकलौता इश्क है तू,
तेरी हर इच्छा पूरी कर दूं,
जग में आनंद ही आनंद हैं,
बस आनंद से झोली भर लूं।।
हुस्न चले कभी अंगड़ाई ले,
देख देख दुनिया जले धूं-धूं,
सबके मन में ख्वाब मिलेगा,
मेरा इकलौता इश्क है तू।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
विषय-परवाना
विधा-क्षणिकाएं
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1.
शमा देख आया परवाना,
इस दुनिया में बुरा जमाना,
कोई हँसता देख रहा है,
हमने तो अब पहचाना।।
2
परवानों की क्या बात करे,
वो आग में जल जाते हैं,
कभी कभी तो वो मरकर,
फिर से अमर हो जाते हैं।





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