Wednesday, August 12, 2020


अगमान
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आजादी मिली जब, हँस हँस खाई फांसी,
सीने पर दर्द झेले, भूल गये खुशी व हाँसी,
लग रहा था आजादी, अंग्रेजों की है दासी,
मिली आजादी एक दिन, मिट गई उदासी।।
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विषय-उपहास
विधा-सायली
शब्द विधान-   1+2+3+2+1
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1.
उपहास,
ना उड़ाओ,
कभी किसी का,
वरना मिले,
दर्द।
2.
मत
नहीं कभी,
करना कोई उपहास,
यही विश्वास,
अटल।
3.
अच्छा,
नहीं है,
उपहास कोई करना,
सदा डरना,
जगत।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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मुक्तक दिवस ***********************
मात्राभार-12/10   
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एकता  का  नाम  लो, करो  सच्चा  काम।
एकता कहीं मिलती , जगत  में  हो नाम।।
हर जगह चल रहा है, जन मतभेद आज,
एकता जिस जगह हो, वो कहाए धाम।।
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-कविता

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लीलाधर की लीला देखो,
सबको नचा रहा है नांच,
यशोदा मां समझ ना पाई,
पकड़ ना पाई झूठ सांच।

बंदीगृह  में, पैदा  होकर,
खोल डाले सारे ही द्वार,
कंस दुष्ट पापी नष्ट किया,
दुश्मन से मानी नहीं हार।

द्वापर युग में अवतार लियो,
दो माताओं का नाम कियो,
विष्णु के तुम रूप कहलाए,
गोकुल स्वर्ग से उतार दियो।

खेल दिखाये सारे जग को,
कितने नाम जगत पुकारता,
जब पाप अत्याचार बढ़ते,
सारा जगत तुम्हें निहारता।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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सुंदर घाटी
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सुंदर घाटी देख नजारा,
बालक हुआ मन खुश,
सामने पेड़ पौधे सुनहरे,
प्रकृति का कहाए सुख।

सुबह सुबह  का वक्त,
मन हुआ अति विभोर,
पक्षी चहचहाने लगे थे,
स्वर सुनाई दिया मोर।

बारिश का पानी बहता,
आ चुका  पैरों के पास,
खुश हुआ रामू आज तो,
दुख दर्द का हुआ नाश।

घाटी का यह नजारा तो,
मन में भरता एक जोश,
प्रकृति के ये प्यारे नजारे,
कम हो चले अफसोस!
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विषय-चित्रलेखन
विधा-कविता
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हे कृष्ण मुरारी, जग के रक्षक,
रास रचाओ यमुना तट आओ,
राधा, गोपी को संग में लाओ,
दुख दर्द मिटाओ,जग हँसाओ।

जग में बढ़ गये पापी कंस हैं,
अत्याचार और बढ़ गये पाप,
लूटपाट और  अत्याचार बढ़े ,
रट रहे बस तुम्हारा ही जाप।

कालयमन को मारा था तुमने,
पापी ढोंगी कर दिया था नाश,
धर्म आड़ में, रचते कुछ रास,
मरणासन्न, अटका हुआ सांस।

अवतार लो अब अवतार लो,
देर ना करो प्रभु, आओ पास,
देर हुई तो धरा पर बचेगा ना,
जन को जगत नहीं आये रास।
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विषय-मैला आंचल
विधा-कविता
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पाप और अत्याचार बढे,
बढ़ गए हैं जग में दरिंदे,
नोच रहे कली फूल को,
मसल रहे वो उड़ते परिंदे,

अभी कली का रूप थी,
खिल खिलाती गलियां,
नोच डाली दरिंदे आज,
है मैला आंचल कलियां।

वहशी जगत में बढ़ रही,
कुछ भी नहीं अनुकूल है,
बाग होते जिस जगह पर,
उड़ रही अब वहां धूल है।

कितने मैले आंचल लेकर,
घूम रही वो घर आंगन में,
कहां जाएं किसको दिखाएं,
कितने दाग लगे आंचल में।।

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