Saturday, August 29, 2020




 दोहा
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1. शब्द-प्रस्तावना
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जब देखी प्रस्तावना, पुस्तक किया विभोर।
शब्दों की माला सुनी, मन का नाचे मोर।।
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2. शब्द-उपयोगिता
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सीखो धन उपयोगिता, मत करना बर्बाद।
खाली होती जेब जब, बहुत सताये याद।।
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3. शब्द-सेहतमंद
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जमकर खाओ सेब तुम, होते सेहतमंद।
घटिया भोजन भर रहा,तन मन में ही गंद।।
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4. शब्द-कट्टरता
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कट्टरता मन की बुरी, कहते सारे संत।
नहीं छोड़ता जब कभी, जन का होगा अंत।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विषय-
बरसात/वर्षा
विधा-दोहे
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होती जब बरसात है, भॅँवरे गाते गीत।
बादल नभ पर देख कर, मन में जागे प्रीत।।

बारिश जब होती कभी, टिड्डे करते शोर।
नभ के बादल देखकर, नाचे वन में मोर।।

समाचार आया अभी, बारिश होगी आज।
प्रगति देश की हो रही,मोदी का है राज।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विधा-दोहा

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देश बुलंदी छू चुका, हाकी खेल जहान।
ध्यानचंद के नाम पर, भारत की पहचान।।

फांसी पर चढ़ वीर ने, दिया एक पैगाम।
हो शहीद तू देश पर, जग में होगा नाम।।

काम बुलंदी का करे, तब बनती पहचान।
मिसाल इसकी एकता,भारत देश महान।।

धन दौलत किस काम के, आये ना जब काम।
पोट बांधकर देखते, आयेगी फिर शाम।।

पंगु कर दिया फोन ने, लगा रहे जन कान।
ध्यान कहीं हो जब कभी, जा सकती है जान।।







विषय-रोटी की भूख
विधा-कविता
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मन की भूख प्यार है,
रोटी की भूख  शरीर,
ना मिले जन अंत हो,
कह गये संत कबीर।

करते रहते दिनभर वो,
तन मन से बहुत काम,
रोटी की चाहत बढती,
होती जब सुबह शाम।

इंसान पहुंचा चांद पर,
जहान का लिये पैगाम,
रोटी, पानी जरूर मिले,
वरना हो आखिरी शाम।

रोटी से ही जग प्यार है,
रोटी कहाए यह संसार,
नहीं मिलेगी रोटी कभी,
लगता बुरा घर परिवार।

रोटी पेट की भूख मान,
रोटी से मानव पहचान,
रोटी पानी जहां मिलता,
वो घर देवालय समान।

रोटी की भूख जन को,
करवाती कठिन  काम,
रोटी तन में ऊर्जा भरदे,
रोटी हो प्रभु का धाम।

रोटी की भूख ने जग,
मरवा डाले कई लोग,
रोटी समय  पर मिले,
कहलाता वह संजोग।

श्रमिक जाए काम पर,
पत्नी करे घर रखवाली,
करे किसान काम खेत,
पेट ना रहे कभी खाली।

एक भरी सभा में भीड़,
बजा रही जमकर ताली,
रोटी के लिए भाषण दे,
सींचता पौधों को माली।

वैज्ञानिक,डाक्टर सैनिक,
शिक्षक,वकील करे काम,
भूखा नहीं रहे पेट कभी,
रोटी मिले साथ सम्मान।

मजदूर जन सेवा करता,
सोये नहीं दिन और रात,
रोटी की चिंता लगी रहे,
खाली पेट जब अनाथ।

कष्ट सह रही नारी अब,
साधु संत भज रहा रब,
सैनिक युद्ध में जा रहा,
रोटी मिलती उन्हें जब।

चारों ओर हा-हाकार है,
भरा नहीं गरीब का पेट,
दिनभर परिश्रम थक मरे,
धन खा गया मोटा सेठ।

धर्म,कर्म,पाप और पुण्य,
रोटी जन की चलाती है,
रोटी की भूख कसूती हो,
जन को बहुत तड़पाती है।

जगत में सारे रिश्ते नाते,
रोटी के कारण चलते हैं,
रोटी की भूख सता रही,
पेट को खूब वे मलते हैं।

जगत टिका,  देखो आज,
रोटी की महिमा है न्यारी,
रोटी की भूख मिट जाए,
घर में पत्नी लगती प्यारी।

रोटी की भूख कह रही,
जगत का आधार रोटी,
गोल गोल,मोटी ,छोटी
मिले ना किस्मत खोटी।

कहा खो गये प्यारे अब,
रोटी की महिमा अपार,
रोटी की भूख लगे सभी,
रोटी है जग का आधार,
रोटी है..................।

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