जरा सुनो
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जीना तो पेड़ पौधों से सीखना चाहिए जो जीवनभर फल, फूल छाया देते हैं और सूखने के बाद भी ईंधन के तथा राख बनने पर भी खाद के काम आता है।
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-होशियार सिंह यादव, लेखक,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
शीर्षक- देश/वतन/राष्ट्र
विधा -कविता
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सब देशों से प्यारा है,
मेरा अपना भारत देश,
अंग्रेज मार मार भगाए,
दुश्मन बचा नहीं शेष।
बापू गांधी ने सींचा है,
सुभाष का अति प्यारा,
इसकी रक्षा मिल करें,
बनता है फर्ज हमारा।
कभी ना झुकने वाला,
वीर शहीदों का वतन,
आओ उनको याद करे,
खिल उठेगा ये चमन।
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स्वरचित/मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
साहित्य संगम संस्थान
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देख लो जागरूकता,बढ़ी देश की शान।
पूरे विश्व में हो गई, भारत की पहचान।।
जागरूकता आ गई, चीन का माल बंद।
बुरा माल वो बेचकर, रखता बात बुलंद।।
जागरूकता जब हुई,नेता हुये बेहाल।
चोर लुटेरे सोचकर, बदली अपनी चाल।।
जागरूकता कम हुई, जमकर खाया माल।
मोटे मोटे सेठ भी, बजा रहे हैं ताल।।
शीर्षक- जिंदगी
विधा -कविता
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समझ नहीं पाया कोई,
जिंदगी है क्या झमेला,
कभी ये मन खुश करे,
कभी लगे एक मेला।
जिंदगी के रस को भी,
कम लोग पी पाते है,
दुखी जगत में आते हैं,
दुखी जगत से जाते हैं।
जिंदगी गम का दरिया,
कह गये कितने ही संत,
ना जाने किस मोड़ पर,
चलते चलते होता अंत।
जिंदगी एक गीत होता,
गाओ जमकर दिन रात,
खूब मजे से जी लेना है,
जब तक देती है साथ।।
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स्वरचित/मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
विषय-कोरोना
विधा-कविता
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गुजर रही थी सही सलामत,
प्रसन्नता भरी सुंदर घडिय़ां,
मन में उमंग, जोश लिये थे,
चल रही थी फूलझडिय़ां।
तभी नागिन से चेहरा लेकर,
आया डसने कोरोना रोग,
हक्का बक्का भुला दिये सभी,
भागदौड़ में फंस गये लोग।
लाखों जन मारे गये जग में,
लाखों बेघर हो गये आज,
कोरोना रोग दवा नहीं मिली,
रहस्य है और बना राज।
हा हाकार मचा है जगत में,
बंद हुये उद्योग और धंधे,
कितने बेघर बाट जोह रहे,
पड़ गये कारोबार ये मंदे।
बच्चे,युवा और बुजुर्ग रो रहे,
अब तो छोड़ दे चीन यम,
कब जग से विपत्ति मिट जाए,
बढ़ता जा रहा दर्द व गम।
कोरोना का भूत सिर चढ़ कहे,
समय है भाग दौड़ ले आज,
एक दिन ऐसा वो समय आएगा,
खुल जाएंगे मेरे सारे ही राज।






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