दोहा
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उदय हुआ है देश का, एक नया इतिहास।
गरीब जन को आस है, अब होगा धन पास।।
काव्य रूप है कल्पना, तन में भरे उमंग।
उग्र भाव इंसान केे, मन में छेड़े जंग।।
पकी फसल को देखकर, प्रसन्न हुये किसान।
मेहनत के बल नाम है, है जग में पहचान।।
गणेश पूजन हो रहा, समृद्धि मिले हजार।
सबसे पहले पूजते, देव ऋण है उधार।।
शराब सिगार पी रहे, बढ़ जहाँ में रोग।
वृद्धि हुई है देश में, हुक्का,बीड़ी भोग।।
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वृक्ष एक लाभ अनेक
विधा-स्वतंत्र
कविता -शीर्षक
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रामू गया स्कूल में सुनकर आया गीत,
रामलाल शिक्षक ने, सिखाई जन प्रीत,
कहा सामने पेड़ देखो,ये होते उपकारी,
आज अभी इसी वक्त करो इनसे यारी।
शाक,झाड़ी ,वृक्ष ये तीन रूपों में मिलते,
कुछ सर्दी में फलते,कुछ गर्मी में फलते,
कुछ पौधों पर तो कोई फूल नहीं लगते,
कुछ पौधों पर बड़े फूल, सुंदर खिलते।
सदा ही उपकार करे, जरूरत पूरी करते,
रोटी,कपड़ा और मकान,इनसे ही मिलते,
आक्सीजन बिन मुश्किल हो जाए जीना,
सेवा करो पेड़ पौधों की, चौड़ा हो सीना।
फल, सब्जी, अनाज, सभी पौधे हमें देते
मसाले,चाय,काफी,हमसे कभी नहीं लेते,
औषधियां और खाद प्रदान ये पेड़ करते,
आश्रय देते जीवों को, छाया भी पेड़ देते।
जहां मिले पेड़ अधिक, होती वर्षा वहां,
पेड़ों से हरा भरा लगे, वन मिलते हैं जहाँ,
आंधी,बाढ़,अपरदन रोके, हो बड़े निराले,
दोस्त बना लो इनको, जीवन करो हवाले।
ताउम्र ये सेवक होते, मत ना इनको काटो,
चिपको आंदोलन चला,कटने से इन्हें डाटो,
हरी भरी धरा बन जाए,आएगा आनंद खूब,
मन में बात बिठा लो,उपकारी हैं घास दूब।
खूब गिनाये लाभ, शिक्षक ने कसम उठवाई,
पेड़ लगाएंगे जीवन में, बस करो यह भलाई,
वरना वो दिन दूर नहीं, घुट घुटकर मर जाए,
बचा लो वक्त अभी है, वरना वो दिन आये।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
विषय-चित्र पर आधारित आयोजन
विधा-कविता
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उदित नारायण, उदित नई भोर,
उड़े पंछी नभ, करते मिल शोर,
उषा की लालिमा, मन हर्षाती,
ताल तलैया पर खग करे विभोर।
उदय हुआ सूरज, दे रहा पैगाम,
उठो, जागो दौड़ों, कर लो काम,
कर्म ही पूजा ईमान, कर्म महान,
मेहनत मजदूरी से बनती पहचान।
स्वतंत्र खग,नभ में उड़ रहे अब,
दे रहे, हर जन को, सुंदर पैगाम,
पिंजरबंद क्या खाक जीवन होता,
कुर्बानी देकर बस,पा जाओ नाम।
आजादी की खुशी, बड़ी निराली,
परतंत्रता बेडिय़ां,रातें होती काली,
आजाद हुये पैदा, आजादी मिली,
आजादी की दिनरात हो निराली।
दूर दूर तक समुद्र, नदी व पहाड़,
हीं हिमालय की लगती है आड़,
आओ उन्मुक्त गगन में उड़ चले,
क्या रोकेगा पंछी, किवाड़ बाड़।





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