सुनो
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अकसर कहते हैं कि पढ़ लिखकर डाक्टर, वकील, शिक्षक एवं अधिकारी बनों किंतु संत करते हंै कि बनना ही है तो पढ़ लिखकर इंसान बनो।
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विधा-दोहा
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दर्द लिये संसार का, होठों पर मुस्कान।
ऑँँखों में आंसू भरे, नारी की पहचान।।
फूल कमल सा खिल रहा, बालक की पहचान।
बच्चे की मुस्कान पर, होता फिदा जहान।
जब दुख जन को घेरते, आता पतझड़ मास।
सूखे पेड़ नजर आये, आते कभी न रास।।
बहा रहे हो व्यर्थ में, आएगा दिन घोर।
जल बिन जीना कल्पना, नहीं मिलेगा ठोर।।,
पैदा जब इंसान हो, मिलता ऋण का भार।
लाख शीश के दान से, सकता नहीं उतार।।
चित्रलेखन
विधा-कविता
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सुदामा सख निराला आया,
रुकमणि,श्रीकृष्ण मन भाया,
कान्हा ने उन्हें गले लगाया,
चरण कमल हाथों धुलाया।
भगवन दौड़कर पानी लाया,
हाथों से उन्हें खुद पिलाया,
पूछा घर का हालचाल तब,
आंसू पोंछे मन में दर्द छाया।
ऐसा सखा कभी नहीं देखा,
उनके लिए वो खाना लाया,
हाथों से निज उन्हें खिलाया,
खुद हंसा और उन्हें हंसाया।
प्रभु की लीला प्रभु ही जाने,
दरिद्रता दूर कर, दे निवाला,
कहता सारा जग ऊपरवाला,
मन में नहीं खोट और काला।
प्रभु जिनका पूरा जग कहता,
वो सेवा करे, अपने सुदामा,
दौड़कर देख रही सत्यभामा,
आज वो श्रीकृष्ण कभी रामा।
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प्रतीक्षा
विधा-घनाक्षरी
मनहरण घनाक्षरी वर्ण संख्या 31(16+15)
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प्रतिक्षा अब हो चुकी,
अब और मत करिये,
आ गई है अब घड़ी,
मन को हंसाइए।
वर्षों से था इंतजार,
रामराज्य से है प्यार,
भक्त हो चुके तैयार,
चलो आप आइए।
अयोध्या में सज रहा,
पत्ता पत्ता फूल सब,
इंतजार हो चुका है,
भूमि तो पूजाइए
आ गया है वो समय,
प्रभु श्री राम आ रहे,
बड़ा हवन हो रहा,
आप तो आ जाइए।



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