अधूरा सफर
विधा-दोहे
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सफर अधूरा यूँ लगे, कैसे होगा खत्म।
टेढ़ी मेढ़ी राह में, कब निकले जन दम।।
भाग दौड़ की जिंदगी, लगे नहीं आराम।
सफर अधूरा देख के, बचा बहुत है काम।।
जग की हालत से लगे, सफर अधूरा आज।
जो मंजिल पर जा चुके, उन पर हमको नाज।।
राह मुसाफिर चल रहे, मंजिल लगे अनेक।
धीरे चलना काम है, सफर अधूरा नेक।।
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दोहा
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विज्ञापन वो कर रहे, हमने किये विकास।
भूख प्यास दम तोडऩे, तन में अटका साँस।।
हो अपनापन प्रीत मेें, बढ़े जगत में प्यार।
जब विज्ञापन दान का, पुण्य कर्म बेकार।।
कान्हा बंशी जब बजे, तब रचते हैं रास।
गोपी आये दौड़ती, राधा मिले उदास।।
समय नहीं है रुक सका, लाखों करे प्रयास।
वक्त झुकाये ना झुके, बने नहीं यह दास।
मोहन मेहर राखियो, देना दर्शन रोज।
तन मन मेरा खुश रहे, घर बाहर है मौज।।
विषय-व्यवहारिक कुशलता
विधा-कविता
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बड़ी बहुत जिंदगी बड़ा बहुत संसार,
जिंदगी बेकार बने, सीखा न व्यवहार,
व्यवहार कुशल होना,होती बड़ी बात,
इससे जीवन मोल है,जन्मभर दे साथ।
दो प्रकार के लोग, मिलते इस संसार,
बुद्धिमान को लोग, करे जमकर प्यार,
एक तो वो ज्ञानी, कहलाते जगत में,
दूजे जो है पागल, मिलते कई हजार।
पागल उनको जानिये, न जाने व्यवहार,
मार पीटकर दम ले, नहीं माने वो हार,
बुद्धिमान वो कहलाते,कुशल व्यवहार,
हर काम को पूरा करे, जन से हो प्यार।
व्यवहार कुशल जो, इस जहान में हो,
व्यवहारिक कुशलता का जिनको ज्ञान,
ऐसे जन सदा सफल हो हर जगह पर,
अच्छे बुरे की मिलती उसको पहचान।
भूख मरेगा वो जग, कुशल न व्यवहार,
पैसे लेकर लौटाये ना, करता ऐसे कार,
एक बार तो दे देंगे, धन, वस्तु व्यापार,
भूले से फिर ना मिले, लोगों का प्यार।
गरीब वहीं कहलाते, जाने ना व्यापार,
या फिर उनका, कुशल नहीं व्यवहार,
लाख प्रयास फिर करे, डूबे कारोबार,
अपना सगा उसको, देगा नहीं उधार।
सीखो जगत में कुशलता, बनेंगे काम,
व्यवहार कुशल फिर बनो,होगा नाम,
व्यवहारिक कुशलता, होता एक धाम,
इस गुण के बिना तो,रगड़ो खूब बाम।
व्यवहारिक कुशलता, बेहतर गुण है,
जिससे अवगुण जाते जन,सभी भाग,
दुष्ट प्रवृत्ति अगर पैदा होगी जन जब,
व्यवहारिक कुशलता बन जाए नाग।
पूरे जगत में मांग बढ़ी, कहाता गुण,
व्यवहार कुशलता से, खत्म अवगुण,
चलते रहो, बढ़ते रहो, सीखो ये गुण,
व्यवहारिक बात पर, रुके ना अवगुण।
सफल जीवन हो, सीख ले व्यवहार,
नहीं काम आएंगे, अवगुण भरे हजार,
व्यवहारिक कुशलता से जन जग को,
सृष्टि में मिलता रहेगा सदा ही प्यार।।
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विषय-छलकते अश्क
विधा-कविता
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छलकते अश्क, कह देते हैं,
मन में मचल रहा, दर्द जहां,
सुख दुख की, पहचान होते,
आंखों से बहे अश्क बेजान,
खुदगर्जी का, जगत है सारा,
कोई किसी का ना सुनता है,
दर्द में रो रोकर, मर जाते हैं,
जन अपना ही ताना बुनता है।
नारी के अश्क जब बहते है,
तब आता जगत में तूफान है,
महाभारत का युद्ध होता तब,
युद्ध तांडव बनती पहचान है।
रावण,दुर्योधन मारे गए जग,
अबला के अश्क, बहाये थे,
विगत इतिहास, नजर डालो,
सीता,द्रोपदी अश्क बहाये थे।
जब अश्क बहते,गरीब जन,
आ जाता है प्रलय महामारी,
हा-हाकर मच जाता जग में,
रोती देखी तब, दुनिया सारी।
करो कद्र इस जगत में प्यारे,
अश्क नहीं कभी बहने पाये,
प्रेम, प्रीत,प्यार बांट दो जग,
गिरते जन को गले से लगाये।।



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