Sunday, August 09, 2020


विषय-कान्हा/कन्हैया/मोहन/माखनचोर
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कान्हा बंशी जब बजे, फिर रचते हैं रास।
गोपी आये दौड़ती, राधा मिले उदास।।

मोहन मुरली बाजती, बढ़ जाता है प्यार।
दुश्मन पल में नष्ट हो, कभी न होती हार।।

कन्हैया तेरी बाँसुरी, मन में भरे उमंग।
यमुना तट पर रास हो, लेती गोपी रंग।।

मोहन मेहर राखियो, देना दर्शन रोज।
तन मन मेरा खुश रहे, घर में होए मौज।।

मोहन कहते आपको, कहते माखनचोर।
जग की विपदा दूर कर, पंख रहे सिर मोर।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विषय-एकता की शक्ति
विधा-कविता
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हिंदु, मुसलिम,सिख और ईसाई,
महिला, पुरुष, लोग और लुगाई,
करे मेहनत खाते हैं निज कमाई,
नहीं बैर, आपस में हैं भाई भाई।

एकता की मिसाल भारत है देश,
एकता के कारण, विदेशी न शेष,
बेशक ढोंगी बदले,कई कई रूप,
एकता से डरते,राजा,प्रजा व भूप।


पापी,नीच,पाखंडी धर्म आड़ में,
बना रहे भाई भाई में एक खाई,
सारा हिंदुस्तान हमारा,लगे प्यारा,
इसकी तस्वीर, आंखों में बसाई।

इतिहास गवाह है, मिलकर लड़े,
अंग्रेजों के विरुद्ध चली थी आंधी,
जब नेहरु,भगत सिंह,सुभाष आये,
गांधी लेकर आया, था एक डांडी।

एकता की मिसाल रहा, जगत में,
नाम लेते हैं, डरते दुश्मन थर थर,
देशभक्ति की मिसाल कायम की,
देशभक्त, जवान मिलते हैं घर घर।

पहले था,आज है,आगे भी रहेगा,
एकता का पाठ , रग-रग में भरा,
भरत के नाम पर पड़ा देश नाम है,
सदियों से चमन, रहा यूं हरा भरा।

मन का धागा प्यार , कातो दिनरात,
गरीब दुखिया मिले,बढ़ा अपने हाथ,
प्यार बांट जगत में,कर दिन जो रात,
हो नहीं पाये कोई, जगत में अनाथ।

सिखलाया था, गांधी ने  चरखा सूत,
एकता मिसाल थी, पुख्ता  हैं सबूत,
तन को ढको,  सूत कात बना कपड़े,
कृत्रिम वस्त्र आये, कई मिले लफड़े।

भारत की भूमि पर, होए खूब कपास,
किसान की रोटी रोजी,फसल है खास,
देशी चीजें अपना,विदेशी के मत दास,
अंग्रेज विदेशी थे, किया जिन्होंने नाश।

जहां एकता नहीं मिले, वो घर बर्बाद,
जिस देश में एकता, सदा  रहेगा याद,
आपस में जहां फूट,करते वो फरियाद,
एकता की मिसाल,हर जन जब साथ।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव


विषय-शहादत को नमन
विधा-कविता
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शहादत दी लाखों, वीर जवान,
पूरे जग में होती,उनकी पहचान,
शहादत को नमन, करे मिलकर,
आओ गाये उनका, गौरव गान।

दे गये कुर्बानी मांगा नहीं मोल,
वीरों का जीवन होता अनमोल,
मातृभूमि पर लुटा देते जान भी
मिट न पायेंगे उनके मधुर बोल।

धरा समक्ष झुका उनका शीश,
बस दिल में बसा था जगदीश,
यादें उनकी बहुत  तड़पाती हैं
दिल में आ नभ में छा जाती हैं।

वो सीने पर गोली खाते रहते
अपने दर्द सदा वे  ही छुपाते,
मरते दम तिरंगा  शान बचाते,
माटी देश की माथे पर लगाते।

शत-शत नमन वीरों को आज,
भारत मां के होते वो  सरताज,
जब तक जहां दिलों पर राज,
हर देशवासी को उन पर नाज।।

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