विधा- गजल
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दूर कोई अपना होगा।
जान से प्रिय सपना होगा।।
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इंतजार मेंं बैठे कभी।
सच एक वो सपना होगा।।
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साँसों की डोर लंबी है।
उल्टे राह बचना होगा।।
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एक दिन आयेंगे वो पास,
तभी तो सच सपना होगा।।
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खेल अभी बहुत खेलना है।
दूर नहीं किनारा होगा।।
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*होशियार सिंह यादव
विषय-धरती/धरा
विधा- क्षणिका
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माता समान धरा पर,
अत्याचारी मारा जाये
जीवन की परवाह नहीं,
वो आगे कदम बढ़ाये।
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धरती पर स्वर्ग मिले,
यूँ धरती मां कहलाए,
मन में उमंग भर देती,
अमृत देके जन हर्षाये।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
विषय-गृहस्थी
विधा- कविता
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बहुत कठिन डगर बताई,
जिसने भी गृहस्थी बसाई,
पहाड़ सम कठिनाइयोंं में,
जिसकी जिंदगी मुस्कुराई।
साधु, संत जगत के सारे,
कह गये एक सरल बात,
गृहस्थ कठोर तपस्या हो,
गृहस्थ आश्रम थामा हाथ।
कभी दुख दर्द हजार हो,
कभी फूलों संग प्यार हो,
कभी गृहस्थ सुंदर बनता,
हर मोड़ पे कभी हार हो।
देव,असुर,दानव ही सारे,
खेले कूदे संग में परिवार,
गृहस्थ जीवन में जो बंधा,
मिला उसे जग का प्यार।
पुण्यकर्म गृहस्थी जीवन,
गृहस्थ हो जगत आधार,
जिसने न बसाई गृहस्थी,
उसका जीना जग बेकार।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
दोहा
भूखे को रोटी मिले, फिर बूढ़ों को प्यार।
साधु संत का दुख मिटे, फिर से लो अवतार।।
धर्म निष्ठ संसार में, मात पिता अवतार।
पाप जनित जग मिले, मनवा दर्द हजार।।
दोहा शब्द-अवतार
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पाप झूठ का चल रहा, नीच कर्म व्यापार।
ढोंगी खुद को मानते, कलियुग के अवतार।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
दोहा
शब्द-अवतार
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पाप झूठ का चल रहा, नीच कर्म व्यापार।
ढोंगी खुद को मानते, कलियुग के अवतार।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
जरा सुनो
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हिम्मत वो हथियार है जिसके आगे दुखों का पहाड़ आसानी से काटा जा सकता है। इस हथियार को पास रखो।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
दोहा
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जीवन में माँ बाप का, जन को मिलता प्यार।
जीव भरे संसार में, वो बनते अवतार।
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दोहा
दोहा
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जीवन में माँ बाप का, जन को मिलता प्यार।
जीव जगत संसार में, कहलाए अवतार।





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