Sunday, August 23, 2020


 सुना
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इंसान धन दौलत को पाकर धनवान नहीं बनता अपितु इंसानियत से धनवान बनता है जिसकी कमी अकसर झलकती है।
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-होशियार सिंह यादव कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा




दोहा
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भली फूल की जिंदगी, हो चाहे दिन चार।
माला सुंदर गूंधते, हर जन मिलता प्यार।
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-शब्द-अमरत्व
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आग हवा जल नभ धरा, शरीर के ये तत्व।
साथ छोड़ दे एक दिन, नहीं मिला अमरत्व।।
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-होशियार सिंह यादव कनीना,महेंद्रगढ़, हरियाणा

 दोहा ****************

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दोहा नंबर-01
प्रमाणित
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करो प्रमाणित बात को, झूठ मिले अपमान।
बातें सच्ची बोलकर, जन की बढ़ती शान।।




विषय-आखिरी गीत
विधा-कविता
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जिंदगी बड़ी हसीन, करो नहीं अधिक प्रीत,
नहीं पता किस मोड़ पर, बने आखिरी गीत,
जिंदगी को जमकर गाय, होगी उसकी जीत,
जीत सुनहरा वो पल बने, बने मन का मीत।

एक शायर गाता जा रहा, जिंंदगी है खराब,
नशा करती जोर का, होती हैअंग्रेजी शराब,
आखिरी गीत शबाब का, हुस्न के मन भाए,
जिंदगी भी क्या गीत है, हँसे और ये हँसाए।

गीत गा रहे हैं आखिरी, होकर मन में खुश,
नहीं पता किस मोड़ पर, मिले बड़े ही दुख,
गाते गाते मौत आए, बन जाए आखिरी गीत,
जग एक दरिया ऐसा है, नहीं करे कभी प्रीत।

देश का मशहूर फनकार, रफी नाम कहाया,
अंतिम गीत गा रहा था,  दोस्त तू आसपास,
उनका अंतिम गीत आज, बन गया है खास,
पर दोस्ती में दगा बढ़ गया,करती है विनाश।

एक लेखक कह रहा था, जिंदगी  काम की,
गरीब जन से पूछो लगती, दर्द एक शाम की,
रोटी की खातिर तड़पता, चली जाती है जान,
आखिरी गीत बन जाएंगे, जिंदगी में हो नाम।

एक कवि गुनगुना रहा, जिंदगी एक गीत है,
प्यार के इस गीत से, हर इंसान को प्रीत है,
कभी कभी प्रीत भी, बन जाए  अंतिम गीत,
पर निभानी पड़ती है, दुनिया  की यही प्रीत।

अंतिम गीत जिंदगी का, होता  सुनहरा पल,
मौत भी क्या अजब है, ढूंढ नहीं पाया हल,
कहते चले जाते हैं, कल आज नहीं ये कल,
समय पर जो काम करेगा, होगा वही सफल।

कुछ भी हर इंसान को, जीना  जिंदगी मस्त,
दुख के किले समाने हो, करो उनको ध्वस्त,
एक दिन इंसान का सूरज, होता जरूर अस्त,
भावी समस्या जानकर, कभी ना होना त्रस्त।

रावण आये चले गये,सिकंदर का सूर्य अस्त,
पापी, अजामिल गये, हो गये मौत से परस्त,
आखिरी गीत कभी न कहना, रहो सदा मस्त,
कल का सूरज देखेंगे,रहकर जीवन में स्वस्थ।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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विधा-कविता
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एक समय था जब होते,
हट्टे -कट्टे सभी जवान,
पूरे जग में होती थी तब,
पहलवान रूप पहचान।

दारा सिंह थे शक्तिशाली,
ग्रेट मंगोल को हराया था,
भारत के बच्चे -जवान ने,
पूरे जग में नाम पाया था।

दूध और घी खाते थे वो,
ताकत का भरा था शरीर,
अपने तन के बल से वो,
हर लेते थे जन की पीर।

अनेकों उदाहरण मिलते,
सुन सुनकर खुश हो मन,
न जाने किसकी बददुआ,
नहीं मिलता आज वो तन।

फास्ट फूड खाते देखे हैं,
घी दूध से भागते हैं दूर,
कांचल मरियल हो गये,
चलते जैसे हो तन गरूर।

आज के युवा लगते बूढे,
कब आएगी वो जवानी,
कलियुग में ओछे धंधे हैं,
करते रहते वो मनमानी।

कार्टून सा बन गया तन,
उठा नहीं पाते एक जूता,
भार लेकर चलना दूर है,
बीड़ी शराब से न अछूता।

गाय, भैंस गांवों से घटी,
दूध का पड़ा खूब टोटा,
इसलिए शरीर कमजोर,
कैसे होगा युवक मोटा।

आने वाले  समय में तो,
और भी बुरा वक्त आए,
देख देख युवा पीढ़ी को,
तन और मन अति हर्षाये।

बचा लो युवा पीढ़ी को,
नहीं तो बन जाए संकट,
तन में जान नहीं मिलेगी,
समस्या बने फिर विकट।।

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