Wednesday, August 26, 2020



जरा *****************

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जंगल में खड़ी दूब घास भी एक शिक्षा देती है कि तूफान एवं आंधी आए तो लचीला बनकर मुकाबला कर सकते हैं वरना सूखे पेड़ की भांति अंत हो जाएगा।
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---होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़,हरियाणा

दोहा
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पापी ढोंगी बढ़ गये, सजे रोज दरबार।
बड़े बड़े जन पूजते, धरती पर वो भार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़,हरियाणा

हँसकर हरते चीर अब, रोज सजे दरबार।
लोग फूल बरसा रहे, दाता सुनो पुकार।।

भूल रहे हैं पुण्य को , पाप सजे दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ढोंगी खड़े कतार।।

हँसकर हरते चीर अब, सजे रोज दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ईश्वर लो अवतार।।



विधा-दोहा

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हँसकर हरते चीर अब, सजे रोज दरबार।
नारी शोषण हो रहा, ढोंगी खड़े कतार।।

समझ बूझ जन खो रहे, ओछे करते काम।
ना जाने किस मोड़ पर, हो जाएगी शाम।।

आम दूध में ले मिला, आये दिल में जोश।
सौंफ मिला नीर पी, फिर आयेगा होश।।

पापी ढोंगी बढ़ गये, सजे रोज दरबार।
बड़े बड़े जन पूजते, धरती पर वो भार।।

हँसकर हरते चीर अब, रोज सजे दरबार।
लोग फूल बरसा रहे, दाता सुनो पुकार।।







तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया
विधा-कविता
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मन विभोर होता था जब मिलते थे दोनो,
भूल जाते थे तन व मन के दुख दर्द सारे,
बैठे दिल से दिल बातें करते थे हँस हँस,
दिल तोड़ा तुमने अब मन मेरा दुखा दिया,
कितने ही खत लिखते थे हम छुप छुपके,
रखोगी पल पल मुझको दिल से लगा के,
उन सब यादों को तेरी पल में भुला दिया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।

क्या ख्वाब लेकर हम आये थे दुनिया में,
सोचा था कोई होगा, अपना भी जगत में,
नहीं देगा धोखा, नहीं तकेगा कभी मौका,
दामन पकडेंग़े जीवन भर चलेगा वो साथ,
मरमरी हाथों से छूयेंगे कांपेंगे तब वो हाथ,
लिखेंगे खत का जवाब भी एक खत से ही,
तकेंगे उस पथ को तू आएंगी जिस पथ से,
क्या कर डाला तुमने, वो रास्ता भूला दिया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।

याद आता वो पीपल का पेड़ वादे किये थे,
कसमें खाई थी दोनों ने, साथ जीएंगे मरेंगे,
प्यार के सागर डूबे होते हम दोनों के दिल,
कहते थे हम निडर बड़े जग से नहीं डरेंगे,
तूफान बनकर आया दोनों के बीच ये जगत,
देखते ही देखते दोनों की हो गई फिर दुर्गत,
आखिर तुमने यह कैसा, मुझसे वफा किया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।

साँसें नहीं रुकी मेरी फिर तुम क्यों रूठ गई,
मिलती थी जब खुशबू आती तेरे रंगत की,
एक दिन तूफान आया और अंगुली छूट गई,
लाख ढूंढा तुझे पहाड़, बन और गलियों में,
सुबह सवेरे जागे थे चलते रहे यह सांझ भई,
बिछुड़े भी तो ऐसे कि गलियां लगती है नई,
अब सोचो तुमने मुझको क्यों यह दगा दिया,
तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।।
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अब किसे पुकारूं, हा! किसको कहूं अपना,
वो यादें वो,कसमें वो दिन,बन गये हैं सपना,
आंखें भी पथरा गई, नैन थक गये पुकार कर,
जोर से पुकारता हूं तो लगता है जग का डर,
यह सच है जगत में नहीं कोई रहता है अमर,
एक दिन छोड़ के जाना होगा यह प्रभु का घर,
तेरी प्यारी सारी यादों को दिल से लगा लिया,
हां,तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।

आएंगे एक दिन तुमसे हम मिलने उस जहां में,
कश्ती टूटी,मांझी घायल, लडऩा बस तूफान में,
जिस जालिम ने छीना, तुझे निज जिस हाथ से,
कसम तुम्हारी सोया नहीं कभी भी उस रात से,
वीरान सा हो गया,फिजा ने छीन है मेरा साथी,
राह तक रहे हैं वो, मूक खड़े घोड़े और हाथी,
उनको जीवों को तुमने, यह कैसा सिला दिया,
सच,तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।

रोते रोते सुन ले, यह मेरा आखिरी तुझे पैगाम,
फिर जन्म धरा पर लेकर याद करना मेरा धाम,
याद रखना अपने दिल में होशियार सिंह नाम,
अब बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो गया निष्काम,
कैसी मंजिल मिली, जिस घड़ी छोड़ा है साथ,
मां बाप भी छोड़ गये अब कर गये हैं अनाथ,
अब बेदर्द जमाने को अब दिल से भगा दिया,
हा! तेरे नाम का आखिरी खत भी जला दिया।।



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