विषय-शृंगार
विधा-मुक्तक
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1.मात्राभार-25
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जब राधा शृंगार किया, आये मोहन पास।
मुरली पर बजती है धुन, निकले स्वर कुछ खास।।
राधा-कृष्ण की जोड़ी सलामत रहे जग में,
श्रीकृष्ण राधा जोड़ी रचाती है जग रास।।
2.मात्राभार-15
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राधा करती शृंगार है।
मोहन का उनसे प्यार है।।
यमुना नदी मिलते दोनो,
कृष्ण के दर्शन उधार है।।
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जन्माष्टमी
विधा-कविता
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अत्याचार और पाप का,एक दिन निश्चित है अंत,
रावण, कंस जग से गये,कह गये कितने ही संत।
जब जब अत्याचार बढ़े, आता है वो लेकर अवतार,
दुष्टों का अंत कर देता है,बढ़ा देता लोगों में प्यार।
कंस के अत्याचार बढ़े, लिया श्रीकृष्ण तब अवतार,
चुन चुनकर दुष्ट मारता, साधु संतों में जगा प्यार।
मथुरा के कारावास में, देवकी ने तब दिया जन्म,
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, कहलाए है पर्व जन्माष्टमी।।
द्वापर युग की बात है, उग्रसेन के जन्म ले कंस,
श्रीकृष्ण ने मारा उन्हें, मिटा दिया बस समूल वंश।
रोहिणी नक्षत्र में जन्म, टूट गये जेल के ताले रोज,
बंदीगृह खुल गया तब, कृष्ण का फैलाजग में ओज।
वसुदेव फिर चल पड़े, सूप में रखकर यमुना पार,
यशोदा नंद की पुत्री ले, वसुदेव पहुंचे तब बंदीद्वार।
पुत्री को मारा कंस ने, हुआ बहुत ही दुष्ट तबखुश,
पता चला कृष्ण जिंदा, जमकर हुआ था बड़ा दुख।।
लाख प्रयास किये कंस, हुआ नहीं श्रीकृष्ण अंत,
आया एक दिन फिर वो, कंस का हो गया अंत।
करनी का फल मिलता, कह गये कितने ही संत,
जन्माष्टमी का पर्व श्रीकृष्ण, महिमा उनकी अनंत।।
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मिसरा-कन्हैया तुम्हारा सहारा बहुत है
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कहा हो कन्हैया पुकारा बहुत है।
कहीं तो मिलोगे किनारा बहुत है।
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दुखों में हमी को दिखाई पड़ोगे।
सदा ही तुम्ही को पुकारा बहुत है।
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ढूंढा है कभी जब तुम्हारा सहारा,
बने तुम हमारा किनारा बहुत है।
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कहीं भी तुम्हारा मिलेगा ठिकाना,
मिली है अनोखी खुशी तब बहुत है।।
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दोहा
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हाथ सने हैं खून के, फिर नैतिकता बात।
सिर पर गठड़ी दोष की,करे पाप दिनरात।।
जाना है जग छोड़कर,ममता मोह हजार।
हक लोगों का मार ले, है जीना बेकार।।
नैतिकता अब मर चुकी,खत्म हुये सुविचार।
मात पिता को दे रहे, घर में दर्द हजार।।
मात पिता को पीटता, नहीं पत्नी से प्यार।
नैतिकता के नाम पर, गीत गाये हजार।
समय नहीं है रुक सका, लाखों करे प्रयास।
वक्त झुकाये ना झुके, बने नहीं यह दास।
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विषय-कृष्णा(प्रेम, विरह)
विधा-कविता
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प्रेम गीत---
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बसों मेरे दिल में गोपाल ,
तुमने ही रास रचायो,
पूजे दुनिया सारी तुमको,
जगत को तुमने हंॅसायो।।
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मेरे प्राणों में आ जाओ,
तुम ही हो देव हमारे,
तेरे दर्शन के प्यासे हैं,
अभी राह खड़े तुम्हारे।
बसों मेरे दिल में.........................
जब कभी तुमको है पुकारा,
पाये हैं दर्शन सारे,
अब विनति करते हैं तुमसे,
जन कहते तुम्हें हमारे,
बसों मेरे दिल में..................
प्रेम-
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बसों मेरे दिल में गोपाल ,
तुमने ही रास रचायो,
पूजे दुनिया सारी तुमको,
जगत को तुमने हंॅसायो।।
लाख उल्हाना दे रही,
गोपियां मिलकर सारी,
कहती यशोदा माता से,
सुन लो ये अर्ज हमारी,
कृष्ण छेड़ता हैं हमको,
आ जाता नदी किनारे,
जब हम नहाए जल में,
कपड़े उठाता है हमारे,
राधा सुन सुन हंस रही,
कैसी करती बातें सारी,
मां यशोदा भी हंस रही,
लगती सूरत अति प्यारी।
खूब उल्हाना सुनकर वो,
पूछेंगी वो बातें ये सारी,
बस अबकी आने दे तो,
माफ करो अबकी बारी।
प्रेम एवं विरह--
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वसुदेव चल पड़े ले
श्रीकृष्ण को उठाय,
यमुना बहा पूरा था,
पैर लगा तो बचाय।
गोकुल में पहुंचे तो,
नंद को दिया सौंप,
देख देख मन प्रसन्न,
राधा, नंद और गोप,
यशोदा की लड़की,
लेकर आया जेल,
प्रभु की माया चली,
कैसा खेला था खेल,
देवकी का पुत्र कहे,
पले वो नंद के द्वार,
कंस का अंत किया,
पल में गया वो हार।
विरह-
गोपियां डूबी दर्द में,
मथुरा चले गोपाल,
राधा प्रेम में लीन थी,
हो गया बुरा हाल।
यशोदा और देवकी,
रो रही देखकर लाल,
जा रहे कंस के पास,
न जाने क्या हो हाल।
मथुरा की ओर चले,
रो रहे हैं ग्वाल बाल,
दूसरी तरफ कंस भी,
बजा रहा खड़ा ताल।
प्रेम कृष्ण के डूब रहे,
छोटे नटखट नंदलाल,
करेगा कंस से युद्ध तो,
हो जाएगा बुरा हाल।
जीत हुई श्रीकृष्ण की,
मथुरा भी तब हर्षाया,
पूरे मथुरा और देश में,
हर जन फूल बरसाय।।





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