जरा सुनो
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वक्त आ गया, पितरों को कर लो याद।
तर्पण के दिन आये, निकालो घर श्राद्ध।
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दोहा ****************************
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सम्मानित जन रो रहे, झूठा है संसार।
पापी जग में बढ़ गये, धन दौलत से प्यार।।
सम्मानित जन कह रहे, कर लो थोड़ा गौर।
बूढ़े जन बेघर हुये, कहीं न उनको ठौर।।
भाई भाई लड़ रहे, घटी है प्रेम प्रीत।
ओछे जन से प्यार है, जहां की यहीं रीत।।
खेल कूद में नाम हो, पाए शिक्षा रूप।
सबके मन को भा रहा, बनो जगत में भूप।।
विधा- कविता
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पानी को चली पलिहारी,
घड़ा उठाकर की तैयारी,
बातें करने की है बीमारी,
देख करतब दुनिया हारी।
चर्चा चली त्योहार मनाएं,
घर में जाके चौका लगाएं,
झाडू पौचा लगा लगाकर,
घर को निज साफ बनाये।
दो पनिहारी जब कुएं गई,
आगे से दो, वापिस आई,
हुई भेंट जब उन चारों की
घंटों बातें चली और हंसाई,
सिर पर दो घड़ हाथ घड़ा,
बातों का फिर तूफान बढ़ा,
अंत में सूर्य अस्त हो आया,
आया तब काम उन्हें बड़ा।
महिलाओं की बात निराली,
नाजुक तन की भोलीभाली,
कभी चांद से दुल्हन बनती,
कभी लगे को साक्षात काली।
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वक्त आ गया, पितरों को कर लो याद।
तर्पण के दिन आये, निकालो घर श्राद्ध।
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दोहा ****************************
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सम्मानित जन रो रहे, झूठा है संसार।
पापी जग में बढ़ गये, धन दौलत से प्यार।।
सम्मानित जन कह रहे, कर लो थोड़ा गौर।
बूढ़े जन बेघर हुये, कहीं न उनको ठौर।।
भाई भाई लड़ रहे, घटी है प्रेम प्रीत।
ओछे जन से प्यार है, जहां की यहीं रीत।।
खेल कूद में नाम हो, पाए शिक्षा रूप।
सबके मन को भा रहा, बनो जगत में भूप।।
विधा- कविता
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पानी को चली पलिहारी,
घड़ा उठाकर की तैयारी,
बातें करने की है बीमारी,
देख करतब दुनिया हारी।
चर्चा चली त्योहार मनाएं,
घर में जाके चौका लगाएं,
झाडू पौचा लगा लगाकर,
घर को निज साफ बनाये।
दो पनिहारी जब कुएं गई,
आगे से दो, वापिस आई,
हुई भेंट जब उन चारों की
घंटों बातें चली और हंसाई,
सिर पर दो घड़ हाथ घड़ा,
बातों का फिर तूफान बढ़ा,
अंत में सूर्य अस्त हो आया,
आया तब काम उन्हें बड़ा।
महिलाओं की बात निराली,
नाजुक तन की भोलीभाली,
कभी चांद से दुल्हन बनती,
कभी लगे को साक्षात काली।





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