दोहा
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उड़ा रहा उपहास है, दिल पर लगती चोट।
अपने अंदर झाँक ले, भरे बहुत हैं खोट।।
लुट पिटकर अब हो रहा, जागरूक इंसान।
गुण विशेष अर्जित करो, बने जगत पहचान।।
धरती नभ को खोज कर, जन पहुँचा पाताल।
जागरूक बन देश में, बजा रहा वो ताल।।
समय थपेड़े खा चुका, मिली तब पहचान।
जागरूक बन देश में, खूब बढ़ाई शान।।
लूट लिया जब देश को, तब आया जन ज्ञान।
जागरूक इंसान ने, दी भारत पहचान।।
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दोहा
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उड़ा रहा उपहास है, दिल पर लगती चोट।
अपने अंदर झाँक ले, भरे बहुत हैं खोट।।
लुट पिटकर अब हो रहा, जागरूक इंसान।
गुण विशेष अर्जित करो, बने जगत पहचान।।
धरती नभ को खोज कर, जन पहुँचा पाताल।
जागरूक बन देश में, बजा रहा वो ताल।।
समय थपेड़े खा चुका, मिली तब पहचान।
जागरूक बन देश में, खूब बढ़ाई शान।।
लूट लिया जब देश को, तब आया जन ज्ञान।
जागरूक इंसान ने, दी भारत पहचान।।
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वादा
विधा-गजल
212 212 212 212
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देख लो यँू कभी मत सजा दीजिये।
दूर से आ गये मत खपा कीजिये।।
*
एक वादा हमें हर समय याद है,
यूं हमें तुम कभी ना सजा दीजिये।
*
खेलते कूदते आ गये पास में,
दुख हुआ तो हमें ना खता कीजिये।
*
मानते सोचते साथ हो खेल में,
बस हमें ना यहां से दफा कीजिये।।
***********************
स्वरचित नितांत मौलिक रचना
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रोटी दाल भी महंगी अब
विधा-कविता
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बाट जोह रहे रामराज की,
पता नहीं वो आयेगा कब,
महंगाई सिर चढ़ बोलती,
रोटी दाल भी महंगी अब।
पांच रुपये खाना थाली का,
लिये बैठे देश गरीब सपना,
लगता 500 रुपये में मिलेगी,
फिर कहो अब वक्त अपना।
मेहमान कभी, आते घर में,
गाना गाते थे जोर जोर लगा,
दाल रोटी खाओ,अरे खाओ,
अब तो प्रभु गुण होठ सजा।
तेल,सब्जी,आटा हुआ महंगा,
तेज हुआ कुर्ता पजामा लहंगा,
अभी महंगाई का दानव आये
फिर देखना कितना वो सताए।
चलना,फिरना,हंसना रोना भी,
आ गये महंगाई की चपेट में,
अब तो मरना भी पड़े महंगा,
बिना अन्न के लोगों के पेट में।
महंगाई अब कालिया नाग है,
देखे कब श्रीकृष्ण जग आएगा,
भूख प्यास जन की मिटेगी तब,
परंतु रोटी दाल भी महंगी अब।
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फेर समय का
विधा-कविता
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फेर समय का जब आता,
बदहाल हो जाता इंसान,
राजा से वो रंक बन जाये,
खोता जग में अपनी शान।
फेर समय का आया जब,
हरिश्चंद्र मरघट रखवाली,
फेर समय का जब आया,
सुग्रीव के हाथों मरा बाली।
फेर समय का आया जगत,
अर्जुन का गांडीव चला नहीं,
गोपियां लूटी जब भीलों तब,
अर्जुन रोता मिला यहीं कहीं।
फेर समय जब आया मंथरा,
मारी फूंक, एक केकैई कान,
भरत को राज्याभिषेक मिला,
रुलता फिरा, राम बियाबान।
उदाहरणों से भरा पड़ा यहां,
किस किसका मैं बखान करूं,
सोच सोच समय के फेर को
घर में छुपा हूं मैं बहुत डरूं।।
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उड़ा रहा उपहास है, दिल पर लगती चोट।
अपने अंदर झाँक ले, भरे बहुत हैं खोट।।
लुट पिटकर अब हो रहा, जागरूक इंसान।
गुण विशेष अर्जित करो, बने जगत पहचान।।
धरती नभ को खोज कर, जन पहुँचा पाताल।
जागरूक बन देश में, बजा रहा वो ताल।।
समय थपेड़े खा चुका, मिली तब पहचान।
जागरूक बन देश में, खूब बढ़ाई शान।।
लूट लिया जब देश को, तब आया जन ज्ञान।
जागरूक इंसान ने, दी भारत पहचान।।
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दोहा
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उड़ा रहा उपहास है, दिल पर लगती चोट।
अपने अंदर झाँक ले, भरे बहुत हैं खोट।।
लुट पिटकर अब हो रहा, जागरूक इंसान।
गुण विशेष अर्जित करो, बने जगत पहचान।।
धरती नभ को खोज कर, जन पहुँचा पाताल।
जागरूक बन देश में, बजा रहा वो ताल।।
समय थपेड़े खा चुका, मिली तब पहचान।
जागरूक बन देश में, खूब बढ़ाई शान।।
लूट लिया जब देश को, तब आया जन ज्ञान।
जागरूक इंसान ने, दी भारत पहचान।।
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वादा
विधा-गजल
212 212 212 212
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देख लो यँू कभी मत सजा दीजिये।
दूर से आ गये मत खपा कीजिये।।
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एक वादा हमें हर समय याद है,
यूं हमें तुम कभी ना सजा दीजिये।
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खेलते कूदते आ गये पास में,
दुख हुआ तो हमें ना खता कीजिये।
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मानते सोचते साथ हो खेल में,
बस हमें ना यहां से दफा कीजिये।।
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स्वरचित नितांत मौलिक रचना
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रोटी दाल भी महंगी अब
विधा-कविता
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बाट जोह रहे रामराज की,
पता नहीं वो आयेगा कब,
महंगाई सिर चढ़ बोलती,
रोटी दाल भी महंगी अब।
पांच रुपये खाना थाली का,
लिये बैठे देश गरीब सपना,
लगता 500 रुपये में मिलेगी,
फिर कहो अब वक्त अपना।
मेहमान कभी, आते घर में,
गाना गाते थे जोर जोर लगा,
दाल रोटी खाओ,अरे खाओ,
अब तो प्रभु गुण होठ सजा।
तेल,सब्जी,आटा हुआ महंगा,
तेज हुआ कुर्ता पजामा लहंगा,
अभी महंगाई का दानव आये
फिर देखना कितना वो सताए।
चलना,फिरना,हंसना रोना भी,
आ गये महंगाई की चपेट में,
अब तो मरना भी पड़े महंगा,
बिना अन्न के लोगों के पेट में।
महंगाई अब कालिया नाग है,
देखे कब श्रीकृष्ण जग आएगा,
भूख प्यास जन की मिटेगी तब,
परंतु रोटी दाल भी महंगी अब।
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फेर समय का
विधा-कविता
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फेर समय का जब आता,
बदहाल हो जाता इंसान,
राजा से वो रंक बन जाये,
खोता जग में अपनी शान।
फेर समय का आया जब,
हरिश्चंद्र मरघट रखवाली,
फेर समय का जब आया,
सुग्रीव के हाथों मरा बाली।
फेर समय का आया जगत,
अर्जुन का गांडीव चला नहीं,
गोपियां लूटी जब भीलों तब,
अर्जुन रोता मिला यहीं कहीं।
फेर समय जब आया मंथरा,
मारी फूंक, एक केकैई कान,
भरत को राज्याभिषेक मिला,
रुलता फिरा, राम बियाबान।
उदाहरणों से भरा पड़ा यहां,
किस किसका मैं बखान करूं,
सोच सोच समय के फेर को
घर में छुपा हूं मैं बहुत डरूं।।




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