दोहे
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उड़ा नहीं उपहास जन, कहे इसे सब आग।
परीक्षित एक भूल ने, तक्षक काटा नाग।।
धन से अमीर बन रहे,मन में बैठा पाप।
हरदम पैसों की रटे, भूले प्रभु का जाप।।
देख रहे हैं लोग तो, सपने जगत महान।
द्रोपदी चीर हर रहे, लोग बुरे शैतान।।
नाग रूप में जन कई, रहे जगत को काट।
जैसे भारत देश को, नेता रहे हैं चाट।।
काम क्रोध को दूर से, हरदम कहो सलाम।
प्रेम,प्रीत को पास रख, जग में बनते काम।।
साथ नहीं कोई मिले, जाना होता दूर।
पैर थके जब राह में, पूरा घटे गरूर।।
विषय-कर्तव्य या अधिकार
विधा-कविता
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कहीं जीवन कही मिले प्यार,
मिले हुए जन मूल अधिकार,
कत्र्तव्य अपने निभाते चलना,
बिना इनके जीवन है बेकार।
एक ही सिक्के के दोनो पहलु,
फैले देश में कत्र्तव्य,अधिकार,
संविधान में हैं दोनो वर्णित ये,
करो अब कत्र्तव्यों से भी प्यार।
मूल अधिकार जो मिले जन,
सर्वोच्च न्यायालय करता रक्षा,
मौलिक कत्र्तव्य जन से संबध,
करते हैं ये जन जन की सुरक्षा।
अनुच्छेद बारह से पैंतीस तक,
हैं सात मौलिक अधिकार दिये,
44 वां संशोधन किया 1978 में,
संपत्ति अधिकार बदलाव किये।
समता,समानता,शोषण के विरुद्ध,
संस्कृति, संवैधानिक और शिक्षा,
न्याय योग्य ये अधिकार कहलाए,
मांगों नहीं इनके लिए कोई भिक्षा।
दस होते पहले मूल कर्तव्य जन,
ग्यारह हो गये हैं 86वें संशोधन,
पालन करना इंसान का फर्ज है,
अर्पित करो इनके लिए तन मन।
संविधान के भाग चार में लिखे,
51 क कहलाता है वो अनुच्छेद,
जब ये पूरे नहीं हो पाते कभी तो,
जन को होता तब बड़ा ही खेद।
राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर,
उच्च आदर्श का मत करो निरादर,
देश की एकता,अखंडता की रक्षा,
देश और प्रभुता का कर लो आदर।
भ्रातृभाव का सदा कर लो निर्माण,
संस्कृति का कर लो सदा संरक्षण,
पर्यावरण रक्षा,वैज्ञानिक दृष्टिकोण,
सार्वजनिक संपत्ति का कर संरक्षण,
छह से 14 साल के बच्चे शिक्षा ले,
व्यक्तिगत क्षेत्रों का विकास कर लो,
सामूहिक गतिविधियां उत्कर्ष करो,
कहलाते मूल कत्र्तव्य सीने में भरलो।
मूल कत्र्तव्यों का पालन करना पड़े,
पालन न हो ना दण्ड के अधिकार,
कभी कभी बड़े बन जाएंगे कत्र्तव्य,
इसलिये कत्र्तव्यों से सदा करो प्यार।
रूसों ने कहा है बहुत ही सोचकर,
मानव जगत में पैदा हुआ आजाद,
हर जगह किंतु वो बंधन में मिलता,
करता रहता हर जगह वो फरियाद।
कौन बड़ा है, कौन है देश में छोटा,
बहुत बार जन को संदेश ने कचोटा,
कभी-कभी कत्र्तव्य बड़ा बन जाता,
कभी कभी अधिकार भी पड़े छोटा।
देश में जीना है मिलकर सभी जन,
सोच समझकर करे जगत में काम,
बिना सोचे समझे जो करता रहता,
हो जाता है वो एक दिन बदनाम।
संशय ना हो अधिकार या कत्र्तव्य,
हर इंसान को मिलता बड़ा ही ज्ञान,
मूल अधिकार कौन से हैं भारत में,
अपने कत्र्तव्यों की बस कर पहचान।
सभी को मिले अधिकार कत्र्तव्य है,
पालन कर लो बनेगा ये देश महान,
सभ्यता संस्कृति में सदा आगे रहा है,
श्रवण कुमार बालक जगत की शान।।
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विषय-शिक्षा
कविता
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लगे छोटी बड़ा उपहार,
कर लो शिक्षा से प्यार,
पाई जिसने शिक्षा अपार,
नहीं हुआ जीवन बेकार।
निर्धन, कुरूप या अपंग,
पाकर शिक्षा हुआ नाम,
हार नहीं हुई कहीं भी,
रोजगार में पाया है नाम।
विदेश हो या अपना देश,
शिक्षा से ऊंचा होता नाम,
सभ्य, सुशील कहलाएगा,
पढ़ाई से जो रखता काम।
आओ पाए अच्छी शिक्षा,
शिक्षा होती है एक गहना,
शिक्षा के लिए कष्ट सहना,
बुजुर्गों का बस यह कहना।
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उड़ा नहीं उपहास जन, कहे इसे सब आग।
परीक्षित एक भूल ने, तक्षक काटा नाग।।
धन से अमीर बन रहे,मन में बैठा पाप।
हरदम पैसों की रटे, भूले प्रभु का जाप।।
देख रहे हैं लोग तो, सपने जगत महान।
द्रोपदी चीर हर रहे, लोग बुरे शैतान।।
नाग रूप में जन कई, रहे जगत को काट।
जैसे भारत देश को, नेता रहे हैं चाट।।
काम क्रोध को दूर से, हरदम कहो सलाम।
प्रेम,प्रीत को पास रख, जग में बनते काम।।
साथ नहीं कोई मिले, जाना होता दूर।
पैर थके जब राह में, पूरा घटे गरूर।।
विषय-कर्तव्य या अधिकार
विधा-कविता
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कहीं जीवन कही मिले प्यार,
मिले हुए जन मूल अधिकार,
कत्र्तव्य अपने निभाते चलना,
बिना इनके जीवन है बेकार।
एक ही सिक्के के दोनो पहलु,
फैले देश में कत्र्तव्य,अधिकार,
संविधान में हैं दोनो वर्णित ये,
करो अब कत्र्तव्यों से भी प्यार।
मूल अधिकार जो मिले जन,
सर्वोच्च न्यायालय करता रक्षा,
मौलिक कत्र्तव्य जन से संबध,
करते हैं ये जन जन की सुरक्षा।
अनुच्छेद बारह से पैंतीस तक,
हैं सात मौलिक अधिकार दिये,
44 वां संशोधन किया 1978 में,
संपत्ति अधिकार बदलाव किये।
समता,समानता,शोषण के विरुद्ध,
संस्कृति, संवैधानिक और शिक्षा,
न्याय योग्य ये अधिकार कहलाए,
मांगों नहीं इनके लिए कोई भिक्षा।
दस होते पहले मूल कर्तव्य जन,
ग्यारह हो गये हैं 86वें संशोधन,
पालन करना इंसान का फर्ज है,
अर्पित करो इनके लिए तन मन।
संविधान के भाग चार में लिखे,
51 क कहलाता है वो अनुच्छेद,
जब ये पूरे नहीं हो पाते कभी तो,
जन को होता तब बड़ा ही खेद।
राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर,
उच्च आदर्श का मत करो निरादर,
देश की एकता,अखंडता की रक्षा,
देश और प्रभुता का कर लो आदर।
भ्रातृभाव का सदा कर लो निर्माण,
संस्कृति का कर लो सदा संरक्षण,
पर्यावरण रक्षा,वैज्ञानिक दृष्टिकोण,
सार्वजनिक संपत्ति का कर संरक्षण,
छह से 14 साल के बच्चे शिक्षा ले,
व्यक्तिगत क्षेत्रों का विकास कर लो,
सामूहिक गतिविधियां उत्कर्ष करो,
कहलाते मूल कत्र्तव्य सीने में भरलो।
मूल कत्र्तव्यों का पालन करना पड़े,
पालन न हो ना दण्ड के अधिकार,
कभी कभी बड़े बन जाएंगे कत्र्तव्य,
इसलिये कत्र्तव्यों से सदा करो प्यार।
रूसों ने कहा है बहुत ही सोचकर,
मानव जगत में पैदा हुआ आजाद,
हर जगह किंतु वो बंधन में मिलता,
करता रहता हर जगह वो फरियाद।
कौन बड़ा है, कौन है देश में छोटा,
बहुत बार जन को संदेश ने कचोटा,
कभी-कभी कत्र्तव्य बड़ा बन जाता,
कभी कभी अधिकार भी पड़े छोटा।
देश में जीना है मिलकर सभी जन,
सोच समझकर करे जगत में काम,
बिना सोचे समझे जो करता रहता,
हो जाता है वो एक दिन बदनाम।
संशय ना हो अधिकार या कत्र्तव्य,
हर इंसान को मिलता बड़ा ही ज्ञान,
मूल अधिकार कौन से हैं भारत में,
अपने कत्र्तव्यों की बस कर पहचान।
सभी को मिले अधिकार कत्र्तव्य है,
पालन कर लो बनेगा ये देश महान,
सभ्यता संस्कृति में सदा आगे रहा है,
श्रवण कुमार बालक जगत की शान।।
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विषय-शिक्षा
कविता
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लगे छोटी बड़ा उपहार,
कर लो शिक्षा से प्यार,
पाई जिसने शिक्षा अपार,
नहीं हुआ जीवन बेकार।
निर्धन, कुरूप या अपंग,
पाकर शिक्षा हुआ नाम,
हार नहीं हुई कहीं भी,
रोजगार में पाया है नाम।
विदेश हो या अपना देश,
शिक्षा से ऊंचा होता नाम,
सभ्य, सुशील कहलाएगा,
पढ़ाई से जो रखता काम।
आओ पाए अच्छी शिक्षा,
शिक्षा होती है एक गहना,
शिक्षा के लिए कष्ट सहना,
बुजुर्गों का बस यह कहना।





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