कविता यादों का सफर
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यादों का सफर, होता है विशाल,
यादें जिंदा रखे,बनती कभी काल,
यादों के सहारे तो,कट जाए साल,
यादें नहीं छोड़ती,रहों किसी हाल,
यादों के सफर में बीते कई साल।
यादें बचपन की, खिला देती मन,
यादों के सहारे ही, तर रहता तन,
यादें जवानी की,ला दे एक जोश,
यादों के बल पर, बढ़े जनाक्रोश,
यादों का सफर है,नहीं कोई रोष।
यादें छोटी हो नहीं, जगत में नाम,
हर दिल को धड़काना,होता काम,
यादों के चलते, होता जन बदनाम,
यादों को दूर रखे,वो जन है महान,
यादों के सफर की, सुंदर हो शान।
कह दो यादों से, इधर नहीं आये,
यादों ने हमको, बहुत बुरे सताये,
यादों के सहारे, काट रहा जिंदगी,
कह दो जाकर, कभी उन्हें हंसाये,
यादों के सफर को दिल से लगाए।
दर्द से दिल भरे, या लाये सौगात,
अपने पराये कभी, करते इमदाद,
नाम मिट्टी मिले,या जगत में नाम,
खुशियों से घर भरे,नहीं रहा डर,
दिल से निकलता,यादों की सफर।
यादों की बारात ,राम गये थेेेेेेेे वन,
वन वन घूमते फिरे, देखे उपवन,
दुष्टों का संहार किया, मिले संत,
पापी,दुष्ट,निशाचर,मिटे थे घर घर,
कहलाया था यह, यादों का सफर।
श्रीकृष्ण जब चले,अपने ननिहाल,
राधा,गोपी पूछे, श्रीकृष्ण का हाल,
पापी कंस मिटाकर, किया उद्धार,
संत, देव का जीवन, हो गया अमर
द्वारिका से निकला,यादों का सफर।
कभी तो मिले खुशी,बने बिगड़े काम,
मन प्रफुल्लित हो उठे, जग में हो नाम,
खुशियों में बीतती, सुबह हो या शाम,
स्वर्ग से बन जाते, नहीं रहे को बेघर,
ऐसे में मन से बहता, यादों का सफर।
कभी कभी गम घेरे, मन होता उदास,
अपना कोई बिछुड़े,मुश्किल हो सॉँस,
जिंदगी नहीं आती, जन को भी रास,
जग में कोई मिले नहीं,हो जाए अमर,
तब आंखों से निकले, यादों का सफर।
सुनो
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दूसरों पर दोषारोपण से पहले अपने अंदर झांक लेना चाहिए। दोष लगाना सरल है किंतु सहन करना कठिन।
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दोहा
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पहाड़ सम हो जिंदगी, मिले नहीं जब प्यार।
रोटी के लाले पड़े, जीवन कारागार।।
काँटों से दामन भरो, करो फूल से प्यार।
खुशी गम में सम रहो, यह जीवन आधार।।
गर्मी सर्दी को भूलकर, करे काम से प्रीत।
जीवन में आगे बढ़े, सदा मिलेगी जीत।।
र्वों के इस देश में, जब आते त्योहार।
गम दुख सारे भूलते, दिल में भरते प्यार।।
कहते थे हम मारते, मरे पड़े खुद आज।
दो दिन की है जिंदगी, कब समझेगा राज।।





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