गहात्मा गांधी
दोहे
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बिना हथियार कर गये, भारत को आजाद।
दो अक्टूबर को करे, गांधी जी को याद।।
कहे अहिंसा आज सुन, क्यों करते हो युद्ध।
आपस में जब प्रेम हो, जन भी लगते बुद्ध।।
गांधी जी की याद में, नतमस्तक हैं लोग।
अहिंसा आज कह रही, हिंसा बड़ा है रोग।।
बापू को जग मानता, जन्मदिन रहे याद।
मार्ग चलो प्यार के, करो नहीं फरियाद।।
विषय-क्रोध जरूरी है
विधा-कविता
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इंसान की जो चिता बना दे,
हँसते जन को खूब रुला दे,
बिना अग्रि के जो जला दे,
क्रोध जग को स्वाह करा दे।
लाख पापों की एक बुराई,
जगत में करना होता क्रेाध,
खून जले ज्यों घी की अग्रि,
हो चुके बहुत से पर शोध।
जब क्रोध इंसान का बढ़ता,
एड्रीनलीन हार्मोन खून मिले,
धक धक खून जले जन का,
क्रोध रूपी एक फूल खिले।
कितने ही देव, दानव हुये हैं,
क्रोध के बल पर घास जले,
आशीर्वाद दिया जब उन्होंने,
वो जीव जगत में महान बने।
क्रोध सदा करना हानिकारक,
कभी कभी होता यह जरूरी,
जब कोई बात नहीं बनती है,
क्रोध दिखाना होता मजबूरी।
दुर्वासा ऋषि माने जाते क्रोधी,
शकुतंला ने नहीं किया आदर,
दे दिया था, उनको बुरा श्राप,
देख क्रोध शकुंतला गई भांप।
दुष्यंत ने ना, पहचाना उसको
जब तक नहीं दिखाई अंगूठी,
पहचान हुई तब शकुंतला की,
तब ही श्राप से शकुंतला छूटी।
कुंती ने की जब, दुर्वासा सेवा,
मिला उसको था बड़ा वरदान,
वरदान अकेले कुंती अजमाया,
कुंवारी को हुई थी कर्ण संतान।
शिवभोले जग में होते हैं भोले,
बेवजह नहीं करते कभी क्रोध,
जब क्रोध में तीसरा नेत्र खुले,
जग प्रलय का तब होता बोध।
देवी देवता शांत सदा रहते हैं,
जब तक उन्हें, कोई न सताए,
जब वे क्रोध में देवी देवता हो,
उनके क्रोध से कैसे बच पाए।
गंगा को लाये भागीरथ धरा पर,
बहुत मन में वो इठलाती आई
जाहनम ऋषि तप कर रहे जब ,
गंगा ने आश्रम में तबाही मचाई।
क्रोध जरूरी बन गया जाहनम,
पेट में समा गये, गंगा ही सारी,
भागीरथ ने देखा जाहनम क्रोध,
पड़े गये पैर ऋषि छुड़वाई वारि।
कई ही उदाहरण भरे इतिहास,
जब हो जाता क्रोध भी जरूरी,
क्रोध जब तक नहीं दिखलाते,
मनोकामाना नहीं होती है पूरी।
श्रीराम जब रामेश्वरम पहुंचे थे,
अनुनय विनय से ना बनी बात,
प्रार्थना कर कर थक गये सभी,
बीत गये थे कई दिन और रात।
आखिर श्रीराम ने क्रोध जताया,
समुद्र ने खुद आकर राह बताया,
नल और नील से रामसेतु बनाया
लंका में पहुंचकर क्रोध दिखाया।
ऐसे में क्रोध कई बार जरूरी हो,
बिना क्रोध नहीं बनती कोई बात,
क्रोध के बल पर बने बिगड़े काम,
फिर हो जाता है जग में बड़ा नाम।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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सुमन की व्यथा
विधा-गीत
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पड़ा धरा पर रो रहा,
बहुत किया अत्याचार,
चाहत होती जब कभी,
लोग करते मिले प्यार।
पड़ा धरा पर..........
बागों बहुत इठलाया,
जन मानस को लुभाया,
पापी ऐसे जन मिले,
बना लिया मेरा हार। 1।
भंवरे जब आते थे,
रस खूब पी जाते थे,
स्वार्थी बनकर वो सदा,
दर्द देते हैं हजार।2।
आज पड़ा में सोचता,
स्वार्थ वश जन नोचता,
निर्दयी मन जन देखो,
जीवन करते बेकार।3।
पड़ा धरा पर रो रहा,
बहुत किया अत्याचार,
चाहत होती जब कभी,
लोग करते मिले प्यार।
पड़ा धरा पर..........



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