Saturday, October 31, 2020

 


दोहा *****************

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1. प्रदत्त शब्द- सौहार्द
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बने सौहार्द देश में, मिलकर हो जब काम।
भाईचारा तब बढ़े, होगा जग में नाम।।
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2. प्रदत्त शब्द-सहोदर
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आपस में जब प्यार हो, मन उपजे मुस्कान।
रक्त एक सा तन बहे, उन्हें सहोदर मान।।
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3. प्रदत्त शब्द-रमणीक
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लगे रमणीक बाग भी, खिले अनेकों फूल।
फिजा जहां पर खेलती,लगे जगत की भूल।।
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4. प्रदत्त शब्द-अदृश्य
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अदृश्य दुश्मन से बचो, करता घातक वार।
चिकनी चुपड़ी बात में, नहीं मिलेगा प्यार।।
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कुंडलियां

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रजवाड़े  करदो  खत्म , है बस यही अपील ।
है  बस  यही  अपील , देश  को एक बनाना ।
मुद्रा झण्डा एक , एक  विधि  को अपनाना ।
असरदार   सरदार  , नीति   ऐसी   अपनाई ।
जो  थे  दबी  जुबान , अन्त  में  मानें  भाई ।।

सभी रियासत थी जुदा , जुदा जुदा  थे राज ।
कुछ खुश थे मिल देश में , मगर कई नाराज ।
मगर  कई  नाराज , खाँमखाँ  आँख दिखाई ।
कहते   रहे   पटेल , मान   जाओ   रे   भाई ।
जब  पहुँचे  सरदार  , सामने  देख  कयामत ।
मानी  सबने बात , मिल गई सभी रियासत ।।





माटी का घर
विधा-कविता
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माटी के घर से, होता जन को प्यार,
इच्छा हो घर लौटूं,चाहे मील हजार,
पक्के दिल के लोग, मिलते कच्चे घर,
अपने वचन के सच्चे,नहीं मिले डर।

माटी के घर तो, करे एसी का काम,
सर्दी में गर्म रहता, गर्मी में दे आराम,
धन दौलत कम हो, भजते रहना राम,
कच्चा घर मंदिर, लगता है एक धाम।

माटी के घर तो, जन को देते हैं चैन,
आराम मिले इतना, नींद खुले न रैन,
बुजुर्गों ने बीताया,जीवन अपना सोच,
भंडार भरे अन्न के,सदा रही थी मौज।

माटी के घर में, पूजा अर्चना मिलती,
रहते वहां देव, देख कलियां खिलती,
जहां नहीं चिंता किसी,ऐश व आराम,
बस खुशी से बीतेगी,ले प्रभु का नाम।

आओ बनाए,माटी का एक सुंदर घर,
जहां सुबह और शाम, बने रहे निडर,
हर हर करते कटे जिंदगी,रहेंगे अमर,
सबसे प्यारा,सबसे सुुंदर,मेरा माटी घर।।



संयम

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संयम बरते जीवन में,
होंगे सफल तब काम,
संयम टूटे मानव कभी,
होगा जग में बदनाम।

संयम पर चलकर ही,
ऊंचाइयां छू जाये जन,
स्थिर रहे जब मन तो,
बाग बाग हो जा तन।

श्रीराम चले संयम पर,
मर्यादापुरुषोत्तम कहाये,
इस धरती पर, नाम है,
माता पिता धर्म निभाये।

संयम हो हर इंसान में,
करे मुहब्बत जग सारा,
अपने पराये जब सामने,
लगता मन से वो प्यारा।

संयम जगत में बरतना,
करना कभी नहीं भूल,
जीवन में आगे बढऩा,
यही हो मानव वसूल।

मरती बेटियां लाचार सरकार
विधा-कविता
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लाचार हो गई सरकार,
मर रही हैं अब बेटियां,
बेरोजगारी बढ़ती जाये,
घट रही हैं अब रोटियां।

बलात्कार का तांडव तो,
हो रहा है दिन रात अब,
सरेआम अस्मिता लुटती,
आगे क्या होगा जाने रब।

यौन शोषण बढ़ रहे हैं,
भ्रूण हत्या का पा करते,
नारी पर अत्याचार करे,
अत्याचारी जरा ना डरे।

जला रहे,काट रहे कई,
मार रहे हैं कितनी बेटी,
दुर्भाग्य सरकार का बना,
सरकार अब तक न चेती।








आएगा और बुरा  वक्त,
देखा नहीं जाएगा नजारा,
देख देखकर हालात वक्त,
जी भर चुका है हमारा।।

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