Monday, October 26, 2020

दशहरा/दोहे
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सत्य की सदा जीत हो,कहते कितने संत।
असत्य पर जो जन चले, होगा उसका अंत।।

अनीति पर जो चल रहे, उनकी होगी हार।
सत्य मार्ग अपनाइये, मिले जहां का प्यार।।

रावण हारा सत्य से, राम की हुई जीत।
सत्य से लोग आज भी, करते मन से प्रीत।।

पर्व दशहरा कह रहा, करो जगत से प्रीत।
अच्छे जन को चाहते, जग की है यह रीत।।



इजहार-ए-खामोशी
विधा-कविता
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लफ्जों से कहा है, फकत,
बेरुखी इजहार.ए-खामोशी
कभी खुलकर भी हंस लो,
क्यों बनाई है यह खामोशी।

मयस्सर हुआ अलम अब,
सताती इजाहर.ए-खामोशी,
तिजारत बन चुकी खुशियां,
जियारत हुई जन खामोशी।

इजहार -ए-खामोशी होता,
जीने का एक सुंदर बहाना,
दूर रहे निजयार दोस्तों से,
नहीं पड़ता घर भी सजाना।

शाम-ए-उल्फत खूब सताया,
सोचा है इजहार-ए-खामोशी,
आपस में  तकरार बढ़ी यूं,
पल में ही तोड़ दे खामोशी।

सलामत रहे हुस्न ए जिंदगी,
मय्यत में दफन-ए-खाक हो,
क्यों बनी इजहार-ए-खामोशी ,
उठा दो जनाजा जो खामोशी।।

इजहार-ए-मुहब्बत बात,
जब मुंह से निकली पति ,
इजहार-ए-खामोशी पत्नी,
बढ़ाई निज काम की गति।

इजहार-ए-खामोशी कहते,
तन-मन को आराम देना,
तान किसी के नहीं सहना,
निज मन में मस्त रहना।

अपनों के आगे चुप्पी साधे,
समझ नहीं पाये जन आधे,
ठहरा न सकता कोई दोषी,
कहते इजहार-ए-खामोशी।

पत्नी ने कहा जोर से-सुनो,
चुप रहो मन के तराने बुनो,
दिखाओ ना अब गर्मजोशी,
कर दो इजहार-ए-खामोशी।

बताते लोग, हजारों फायदे,
कहते  इजहार-ए-खामोशी,
शांत रहना लाभकारी होता,
नहीं रखा कुछ हो गर्मजोशी।

मरहम का काम कर जाती,
कहते हैं इजहार-ए-खामोशी,
प्रेम अनुभूति मन पैदा होता,
जन का प्यार मिले गर्मजोशी।

डांट डपट से आहत हुआ,
किया इजहार-ए-खामोशी,
बोलने की सजा-ए-दर्द है,
निज को ही कहता हूं दोषी।
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