मुअम्मा
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मान मुअम्मा जिंदगी, दिखलाती है रंग।
कोई दुख में जी रहा, कोई पीता भंग।।......। 2।
भंग पी रहा साधु जन, मिलता उसको चैन।
जप तप में वो लीन हो, सुबह शाम दिन रैन।। 4
रैन गई दिन हो चुका, जाग मुसाफिर आज।
खोज मुअम्मा हल अभी,होगा जन जन नाज।।6
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मुअ अम्मा
विधा-कविता
शब्द सीमा-छह पंक्तियां
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मान मुअम्मा जिंदगी, दिखाती कई रंग।
कोई दुख में जी रहा, कोई पीता भंग।।......। 2।
मौत मुअम्मा मान ले, झटपट ले आगोश।
हँसता मानव गिर पड़े, पल में खो दे होश।।। 4।
खोज मुअम्मा हल अभी, वरना होगी देर।
हाँड मांस का जन बना, हो जाएगा ढेर।। ...। 6।
आनंद
विधा-कविता
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आनंद का वो क्षण,
जब मिलता है यार,
पुरानी यादें उभरती,
बढ़ जाता है प्यार।
जब बिछुड़ा पुत्र भी,
मिलता निज परिवार,
आनंद के क्षण मिले,
बढ़ जाता बड़ा प्यार।
जब महबूबा मिलती,
बढ़ जाएगा जन प्यार,
आनंद का क्या कहें,
प्रसन्न मन हो हजार।
आनंद मन को हर्षाये,
दे जाता है भरी उमंग,
दुख दर्द, सारे मिटते,
छिड़ जाए मन में जग।
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चित्रलेखन
विधा-कविता
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मां बच्चे की प्यारी हो,
करती सेवा, दिन रात,
मां बच्चे का, जगत में,
मिलता है हरदम साथ।
छोटे बच्चे को खाना दे,
समय पर करवाये स्नान,
देती आशीर्वाद उसको,
जीवन में बनना महान।
अलौकिक प्यार देती है,
दुख भरा वो जीवन सोय,
मां ममता की ,मूर्त होती,
वो नहीं पराई कभी होय।
मां का आंचल स्वर्ग हो,
उसकी ममता जहां प्यार,
उसका साथ अगर मिले,
होगी जग में कभी न हार।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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बेटी जब बन जाये माता
विधा-कविता
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बेटी के कई रूप है,
उनमें एक हो माता,
मां बाप की सेवा से,
उसका बड़ा है नाता।
मां बाप उसे पालते,
गोदी लेकर खिलाते,
बड़ी होने पर उसकी,
सेवा बहुत ही लुभाते।
सास- ससुर की सेवा,
कभी मात पिता प्यार,
दो कुनबों की सेवा में,
लगता जीवन है उधार।
कभी कभी बेटी बने,
पिता के लिए भी मां,
सेवा दिन रात करती,
मुख निकसत कभी ना।
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