Saturday, October 17, 2020


 दोहे/मां दुर्गे
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मां दुर्गे की अर्चना, होती जग आधार।
माता से बढ़कर नहीं, देता कोई प्यार।।

माता   दुर्गा   दे   मुझे , बस   इतना   वरदान ।
पाखंडी  का  मैं  करूँ , पल  भर में अवसान ।।

माता   गौरी    दीजिए  , मुझको   आशीर्वाद ।
कृपा  आपकी  से  रहूँ , मैं   हरदम   आबाद ।।

इस जग में इंसान का, माता रखती ख्याल।
नवरात्रि पर्व मन हरे, पूछती मात हाल।।







आज फिर घूमना है
विधा-कविता
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स्वतंत्रता मिल चुकी है,
आजादी से सबको प्यार,
आसमान अब चूमना है,
लो आज फिर घूमना है।

आजादी के रूप अनेक,
कोई काम से है आजाद,
किसी को बचपन याद,
कोई करता है फरियाद।

कोरोना के बंधन में थे,
अनलॉक के दिन आये,
बीते के दिन भूलना है,
लो आज फिर घूमना है।

कैदी काट रहा था जेल,
कैदियों से था बस मेल,
छूट गया फिर, कैद से,
कैद से खत्म हुआ खेल।

कैदी हुआ कैद से रिहा,
कैदखाना दिन भूलना है,
प्रसन्न बहुत नजर आया,
आजाद फिर, घूमना है।

पढ़ते पढ़ते हुआ बोर,
नींद हैं आंखों में घोर,
परीक्षा संपन्न हो गई,
आज फिर, घूमना है।

दौड़ रहा मंजिल ओर,
मंजिल अभी दूर ना है,
एक दिन मिले मंजिल,
तब तक यंू घूमना है।

दुश्मन बचकर निकले,
आंसू आंखों से, बहते,
अब दुष्ट को, घूरना है,
ले आज फिर घूमना है।

गर्मी की छुट्टियां, शुरू,
स्कूल अब, भूलना है,
दौड़ चले, सैर सपाटा,
लो आज फिर घूमना है।

पकड़ चलता हाथ मां,
बच्चा करता बहुत शोर,
पिता के सहारे आंगन,
बच्चे को अब घूमना है।

इंकलाब की करे पुकार,
कैद में भी नहीं माने हार,
फांसी का फंदा चूमना है,
लो स्वतंत्र फिर घूमना है।

आत्मा कह रही जन से,
अब शरीर को भूलना है,
लंबे समय तन कैद में थी,
लो अब स्वतंत्र घूमना है।

आये माता के नवरात्रे तो,
माता मंदिरों में घूमना है,
छवि मां की बसा मन में,
मां की दहलीज चूमना है।

दर्द बहुत दे गये वो दिन,
रो रोकर गुजारे दिन रात,
उन दिनों को, भूलना है,
लो आज फिर घूमना है।
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ममता/स्नेह/ममत्व
विधा-कविता
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मां की ममता जग में
होती बहुत ही प्रसिद्ध,
हर जगह उतरती खरी,
हो चुका है यह सिद्ध।

ममता के कारण मां,
दे सकती निज जान,
ममता के कारण मां,
होती जगत पहचान।

ममता के आगे लगे,
लगे सब कुछ बेकार,
पूरे जग में प्रसिद्ध है,
मां का अनोखा प्यार।

ममता पर कुर्बान रहे,
माता की अंतिम संा






स,
ममता बिना फीका हैं,
सब कुछ होता नाश।

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