कुंडलियां
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1
माताएँ नौ मिल करें , हर बल का निर्माण ।
जीवन इनके बल चले , मान इन्हें ही त्राण ।
मान इन्हें ही त्राण , सभी की छवि निराली ।
ब्रह्मचारिणी श्रेष्ठ , करे जग की रखवाली ।
सतत करें सम्मान , सदा हम शीश झुकाएँ ।
रक्षा में तल्लीन , रहेंगी सब माताएँ ।
2
माता हे कात्यायनी , लाज तुम्हारे हाथ ।
दुष्ट बुरा अब कर रहे , भक्त जनों के साथ ।
भक्त जनों के साथ , भिड़े हैं अत्याचारी ।
उन पर अपनी तेग , चलाओ हे महतारी ।
सज्जन करता सहन,नहीं मुख से कह पाता ।
उनकी सारी पीर , मिटाओ आकर माता ।।
3
माता तेरा आसरा , तुम से ही है आस ।
रहूँ तुम्हारी ही शरण , छ: ऋतु बारह मास ।
छह ऋतु बारह मास , मात दो मुझे सहारा ।
बस तू देना साथ , भले जग करे किनारा ।
मान लिए श्रंगार , न दुख सुख से घबराता ।
केवल अपना हाथ , रखो सिर मेरे माता ।।
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सचल भाष/मोबाइल/स्वरदूतविधा-दोहा
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सचल भाष जन कह रहे, करता मीठी बात।
शोभा देता जेब में, दिन हो या हो रात।।
मोबाइल लो जेब में, घूमो फिरो विदेश।
ज्ञान भरा है जगत का, पढ़ों बात स्वदेश।।
अजब स्वरदूत यंत्र है, कर लो बैठे बात।
थोड़ा समय निकाल लो, सुबह मिले या रात।
मोबाइल में सुन रहे, मधुर मिलन के गीत।
आता जब बाजार में, होती जन की प्रीत।।
मन को भर दे ज्ञान से, मुखड़े से पहचान।
हर जन को मिलती खुशी, मोबाइल जन शान।।
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मौत/मृत्यु
विधा-कविता
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चलते चलते मौत मिले,
चलते चलते होती शाम,
नहीं पता किस मोड़ पर,
हो जाए जन काम तमाम।
सुनहरी होती है मौत तो,
कह गये कितने ही संत,
मौत जब आती पास में,
मुंह से बोल होती बंद।
एक दिन आएगी जरूर,
कर लो कितने ही यत्न,
जब मौत आ जाए तो,
खत्म हो जाए तन धन।।
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लक्ष्मण परशुराम संवाद
विधा-कविता
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तोड़ा धनुष श्रीराम ने,
हुआ बड़ा एक शोर,
चौक उठी जनकपुरी,
पिहू पिहू करते मोर।
शोर सुना परशुराम ने,
महेंद्र पर्वत से वो दौड़,
लक्ष्मण आगे मिल गये,
कर दिया सारा निचोड़।
त्रेता युग का वीर बता,
परशुराम बहुत गर्जाय,
उनकी बातें सुन सुनके,
लक्ष्मण बहुत ही हर्षाय।
लक्ष्मण बोला ब्राह्मण,
पुराना धनुष गया टूट,
तोड़ दिया एक वीर ने,
इतनी तो होती है छूट।
गरज गरजकर परशु,
करता कत्ल की बात,
लक्ष्मण बार बार हंसे,
हो चली थी अब रात।
लक्ष्मण कहा ब्राह्मण,
कहो तो इसे जुड़वाय,
अभी कत्ल कर दूंगा
सुनके लक्ष्मण हंसाय।
आखिर विष्णु रूप में,
श्रीराम ने समझाया था,
क्रोध शांत हुआ ब्राह्मण,
परशुराम पछताया था।।


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