दोहा
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चोरी डाका लूटना ,शर्मनाक हैं काम।
पाप पुण्य की सोच से, होता जन का नाम।।
देख भावना जगत की, पड़ा सोच में आज।
मूर्ख लोग ही कर रहे, इंसानों पर राज।।
भरी भावना दिल बड़ी, ईश्वर से हो प्यार।
उनके रास्ते पर चले, कभी नहीं हो हार।।
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नमन शब्द-शर्मनाक
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चोरी डाका लूटना ,शर्मनाक हैं काम।
पाप पुण्य की सोच से, देव बने इंसान।।
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भावना
विधा-दोहे
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दिल में हो जब भावना,बनते सारे काम।
नहीं काम की सोच तो, जग में हो बदनाम।।
देख भावना जगत की, पड़ा सोच में आज।
मूर्ख लोग ही कर रहे, इंसानों पर राज।।
भरी भावना दिल बड़ी, ईश्वर से हो प्यार।
उनके रास्ते पर चले, कभी नहीं हो हार।।
जैसी जिसकी भावना, वैसा करता काम।
नीम के पेड़ पर कभी, नहीं लगेंगे आम।।
कहां गुम हो
कविता
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जिनके राज्य में हुआ,नहीं सूरज अस्त,
किये थे महाराजा,राजा,महावीर परास्त। 2।
दुनियां गाती है गीत वो सिकंदर तुम हो,
चर्चाएं सभी छेड़ते जिनकी,कहां गुम हो। 4।
मौत का तांडव रचाकर,भरी थी तिजोरी,
पृथ्वीराज हाथों हारे, तुम मोहम्मद गौरी। 6।
सोमनाथ मंदिर लूट के, तुम कहां गुम हो,
गजनवी बने तो मानो,तुम कुत्ते की दुम हो। 8।
कविता
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लव और कुश सीख रहे,
सीता माता से धनुष ज्ञान,
श्रीराम के पुत्र कहलाते हैं,
पूरे जगत में बनी पहचान।
मां से बड़ा गुरु नहीं जगत,
मां दे सकती है निज प्राण,
मां ममता की मूर्त होती है,
पूर जग में मां होती महान।
वाल्मीकि ने दी, शिक्षा तो,
लव कुश बने जगत महान,
लक्ष्मण जब मूर्छित किया,
लव कुश कहलाते विद्वान।
मात पिता गुरु देव जगत में,
जन का बना सकते विद्वान,
इनका अपमान जब करे वो,
नीच,निशाचर,पापी ले मान।
मां को नमन करते हैं बच्चे,
पाते हैं निस दिन आशीर्वाद,
मां जग में नहीं होती कभी,
आती है जीवन भर वो याद।
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इजहार-ए-खामोशी
विधा-कविता
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लफ्जों से कहा है, फकत,
बेरुखी इजहार.ए-खामोशी
कभी खुलकर भी हंस लो,
क्यों बनाई है यह खामोशी।
मयस्सर हुआ अलम अब,
सताती इजाहर.ए-खामोशी,
तिजारत बन चुकी खुशियां,
जियारत हुई जन खामोशी।
इजहार -ए-खामोशी होता,
जीने का एक सुंदर बहाना,
दूर रहे निजयार दोस्तों से,
नहीं पड़ता घर भी सजाना।
शाम-ए-उल्फत खूब सताया,
सोचा है इजहार-ए-खामोशी,
आपस में तकरार बढ़ी यूं,
पल में ही तोड़ दे खामोशी।
सलामत रहे हुस्न ए जिंदगी,
मय्यत में दफन-ए-खाक हो,
क्यों बनी इजहार-ए-खामोशी ,
उठा दो जनाजा जो खामोशी।।
इजहार-ए-मुहब्बत बात,
जब मुंह से निकली पति ,
इजहार-ए-खामोशी पत्नी,
बढ़ाई निज काम की गति।
इजहार-ए-खामोशी कहते,
तन-मन को आराम देना,
तान किसी के नहीं सहना,
निज मन में मस्त रहना।
अपनों के आगे चुप्पी साधे,
समझ नहीं पाये जन आधे,
ठहरा न सकता कोई दोषी,
कहते इजहार-ए-खामोशी।
पत्नी ने कहा जोर से-सुनो,
चुप रहो मन के तराने बुनो,
दिखाओ ना अब गर्मजोशी,
कर दो इजहार-ए-खामोशी।
बताते लोग, हजारों फायदे,
कहते इजहार-ए-खामोशी,
शांत रहना लाभकारी होता,
नहीं रखा कुछ हो गर्मजोशी।
मरहम का काम कर जाती,
कहते हैं इजहार-ए-खामोशी,
प्रेम अनुभूति मन पैदा होता,
जन का प्यार मिले गर्मजोशी।
डांट डपट से आहत हुआ,
किया इजहार-ए-खामोशी,
बोलने की सजा-ए-दर्द है,
निज को ही कहता हूं दोषी।






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